धरती के अंदर जमा भयंकर ऊर्जा निकल सकती है बाहर
उत्तराखंड और हिमालयी क्षेत्र में पिछले लगभग 100 वर्षों से अधिक समय से कोई बड़ा भूकंप (8.0़ तीव्रता का) नहीं आया है। हिमालय क्षेत्र में आखिरी बार 8.0़ तीव्रता का बड़ा भूकंप 1934 (नेपाल-बिहार भूकंप) और 1950 (असम भूकंप) में आया था। यह स्थिति ‘‘सेस्मिक गैप’’ कहलाती है।
भूविज्ञानियों के अनुसार इस गैप के कारण बड़ी मात्रा में भूगर्भीय ऊर्जा संचित हो रही है। इस ऊर्जा के लंबे समय तक रिलीज न होने से भविष्य में बड़े भूकंप की संभावना बढ़ गयी है।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाय तो 1803 में गढ़वाल भूकंप आया था जिसकी तीव्रता 7.5 से अधिक थी और इसने व्यापक तबाही मचाई थी। उसके बाद गढ़वाल में भयंकर अकाल पड़ा। इसके बाद 1905 में कांगड़ा भूकंप आया जिसकी तीव्रता 7.8, थी उसने भी हिमालय क्षेत्र में बड़ी तबाही मचाई। सन् 1950 के असम-तिब्बत भूकंप की तीव्रता 8.6, थी। यह हिमालय में दर्ज सबसे बड़ा भूकंप था, लेकिन उत्तराखंड इससे बचा रहा।
उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्र लगभग 100 वर्षों से बड़े भूकंप से अछूते हैं, जिससे वैज्ञानिक मानते हैं कि इस ‘‘सेस्मिक गैप‘‘ के कारण इतनी भूगर्वीय उर्जा संचित हो चुकी है कि जो एक साथ बाहर किल गयी तो कई परमाणु बमों से अधिक विध्वंशकारी हो सकती है। इसलिये भविष्य के खतरों को देखते हुए, भूकंप-रोधी तकनीकों का उपयोग और आपदा प्रबंधन की तैयारियां अत्यंत आवश्यक हैं।
सावधानी और सतर्कता ही सबसे बड़ा बचाव
हालांकि भूकंप एक प्राकृतिक घटना है जिसे रोका नहीं जा सकता। यही नहीं भूकंप का पूर्वानुमान करना फिलहाल संभव नहीं है। इससे बचने का सबसे बड़ा उपाय प्रकृति के साथ जीना सीखना ही है। भूकंप किसी को नहीं मारता है। मारने वाला हमारा घर या भवन होता है जिसे हम अपनी सुरक्षा और सुविधा के लिये बनाते हैं। अगर भवन का ढांचा भूकंप रोधी बने तो जानमाल का नुकसान कम किया जा सकता है। इसके लिये हमें जापान से सबक सीखना चाहिए।
भारत सरकार ने ‘‘भारतीय मानक 1893’’ जैसे निर्माण मानकों को लागू किया है, जो भूकंप-रोधी संरचनाओं के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इसके अलावा विभिन्न वैज्ञानिक शोधों के माध्यम से कुछ भूकंपीय गतिविधियों का पूर्वानुमान किया जा सकता है। इसके लिए उपग्रहों और अन्य आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है।
भारत में भूकंपीय नेटवर्क को मजबूत करना और इससे जुड़ी चेतावनी प्रणालियों को विकसित करना महत्वपूर्ण है। भूकंप की स्थिति में नागरिकों को किस तरह से प्रतिक्रिया करनी चाहिए, यह जानना अत्यधिक आवश्यक है।
स्कूलों, कार्यालयों और समुदायों में भूकंप सुरक्षा को लेकर नियमित प्रशिक्षण और अभ्यास आयोजित करना चाहिए। इसके अलावा, भूकंप-रोधी किट्स जैसे पानी, भोजन, प्राथमिक चिकित्सा सामग्री और अन्य जरूरी सामान को तैयार रखना चाहिए।
हिमालयी क्षेत्रों में सड़कों, पुलों और अन्य महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की मजबूती को बढ़ाना चाहिए, ताकि भूकंप के दौरान इनका गिरना या क्षतिग्रस्त होना कम हो। साथ ही, पुराने ढाँचों की मरम्मत और पुनर्निर्माण पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।
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