सहायक और अनुवादक के रूप में भी किया काम
वे सीधे सिनेमाटोग्राफर नहीं बनीं, उन्होंने इस कला-कुशलता का विधिवत प्रशिक्षण नहीं लिया है। पहले उन्होंने सिनेमाटोग्राफर अशोक कुमार की शागिर्दी की, उनकी सहायक बनीं। असल में उनकी बचपन की सहेली सुहासिनी ने सिनेमाटोग्राफी का प्रशिक्षण लिया था और वे अशोक कुमार की सहायक थीं। इसके साथ सुहासिनी अभिनय कर रही थीं। अत: उस समय खाली बैठी होने के कारण विजयलक्ष्मी उस समय शूट हो रही फिल्म ‘नेन्जताई किल्लावे’ (डोन्ट पिंच द हार्ट) के क्रू से जुड़ गईं।
विजयलक्ष्मी पांच साल तक करीब 30 फिल्मों में अशोक कुमार की सहायक रहीं। चूंकि अशोक कुमार उत्तर प्रदेश से थे और उन्हें तमिल भाषा नहीं आती थी अत: विजयलक्ष्मी उनके लिए अनुवादक का काम भी कर रही थीं।
फिर 1985 में तमिल फिल्म ‘चिन्ना वीड’ केलिए उन्होंने कैमरा पूरी तरह संभाल लिया, शुरू में वे बहुत घबराई हुई थीं। मगर वे अभिनेता रजनीकांत की एहसानमंद हैं कि उन्होंने उन्हें बहुत प्रोत्साहित किया, उनकी हिचक दूर की। अभी तक उन्होंने 22 फीचर फिल्मों का फिल्मांकन किया है। साथ ही उन्होंने कई टीव सिरीज पर भी काम किया है। जब 2015 में इंडियन वीमेन सिनेमाटोग्राफर्स कलेक्टिव की स्थापना हुई तो संगठन ने विजयलक्ष्मी को सम्मानित किया। आजकल वे सारेगामा इंडिया की उच्च पदाधिकारी हैं।
पुरुषों के साथ दिन-रात काम करते हुए उन्हें कभी कमतरी का बोध नहीं हुआ। कभी किसी ने दुर्व्यवहार नहीं किया। हां, कभी-कभी अकेलापन अनुभव होता था।
1958 में जन्मी विजयलक्ष्मी ने ‘चिन्ना वीड’ के अलावा ‘पाट पाडवा’ (शैल आई सिंग ए सॉन्ग), ‘अरुवदई नाल’, ‘तेर्क तेरु मचान’, ‘पोरुतथु पोतम’ (इनफ सफरिंग), ‘डैडी’, ‘दिसम्बर 31’, ‘रावणन’ आदि फिल्मों की सिनेमाटोग्राफी के अलावा टीवी फिल्म ‘वेलन’ एवं ‘माया मच्छंदर’ का फिल्मांकन किया। साथ ही ‘डैडी’ का लेखन और ‘पाट पडवा’, ‘अभी एंड अनु’ तमिल फिल्मों तथा मलयालम फिल्म ‘अभियुते कथा अनुविन्टेयुम’ का निर्देशन किया। उन्होंने मेलोड्रामा, एक्शन सब तरह की फिल्मों का फिल्मांकन किया है।
वे कहती हैं, अस्सी का दशक बड़ा अच्छा और फलदाई समय था। उस समय रजनीकांत, कमल हासन, प्रभु, चिरंजीवी, सत्यराज, सुहासिनी, रेवती, रोहिणी आदि जैसे कई कलाकार फिल्म जगत में सक्रिय थे। पर यह ऐसा समय था जब सिनेमा सेल्युलाइड पर बनता था, रिवाइंड करके शॉट की गुणवत्ता देखने का कोई उपाय न था। सिनेमाटोग्राफर का कहा अंतिम होता था। आपको स्क्रीन इमेज के लिए कैमरे के पीछे खड़े आदमी पर विश्वास करना होता था। अब सिनेमा के सब आयामों से परिचित होने के कारण वे नए निर्देशकों का मार्गदर्शन कर पाती हैं।
अगर आप भारतीय सिने-तकनीशियन के बारे में जानना चाहते हैं, तो विरल सामग्री उपलब्ध है। अत: विजयलक्ष्मी भले ही इतिहास में शामिल हों, पर उनके विषय में खास नहीं मिलेगा। इस आलेख केलिए उनके तमिल साक्षात्कार का सहारा लिया गया है। विजयलक्ष्मी के अनुसार क्षेत्रीय फिल्मों केलिए बजट की बहुत कमी होती है, अत: इन भाषाओं में फिल्म बनाने में दिक्कत आती है।
नेटफ्लिक्स के पास जैसा बड़ा बजट मिलता है, वैसा मिले तो अलग तरह की फिल्में बनाई जा सकती हैं। आजकल वे हिन्दी और तमिल में फिल्म बनाने की प्रक्रिया से जुड़ी हुई हैं। अब तो कई स्त्री सिनेमाटोग्राफर हैं। उनके विषय में अवश्य लिखा जाना चाहिए ताकि दर्शकों/जनता को पता चले।
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