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पेट्रोल-डीजल के भाव और भाव खाती क्रांति: हे बांके बिहारी..! कब होगी तुम्हारे नाम की "कृष्ण क्रांति"

सार

पेट्रोल और डीजल के दामों में आग लग गई है। आग इतनी भीषण है कि 100 का नोट भी बुझा नहीं पा रहा। 100 रुपये देने के बाद भी ऊपर की चिल्लर से चिंगारियां बुझानी होती है।

देश में एथेनॉल के माध्यम से पेट्रोल बनाने की बात को पेट्रोल के विकल्प के रूप में केंद्र में रखा गया है और इस पूरी कवायद को कृष्ण क्रांंति का नाम दिया गया है। यह क्रांति सालों से उठ रही है, लेकिन अब तक घटी नहीं है-

इस व्यंग्य लेख में समझिए सारा हाल..!
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पेट्रोल-डीजल क्रूड ऑयल, इनकी कीमतें रिकॉर्ड बना रही हैं, यह रिकॉर्ड भी सरकारी उपलब्धि से कम नहीं। - फोटो : iStock
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विस्तार
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देश का इतिहास लाल, पीली, हरी नीली, गुलाबी, सुनहरी सारी क्रांतियों से भरा पड़ा है। कई क्रांतियां चल रही हैं, कई घट रही हैं तो कई अपने में ही गोते लगा रही हैं, कई तो सालों से आ ही नहीं पा रही।

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इधर डिजिटल और सूचना क्रांतियों की तो कांति ही देखने लायक हैं। ऐसी परवान चढ़ी हैं कि ब्याह-शादी तक की क्रांति, इसकी कांति के बूते निपट गई। उधर, कई क्रांतियां ढलान पर हैं तो कई क्रांतियों के बारे में सोचा जा रहा है कि ये हो क्यों गई?

प्रतिफल के दुष्परिणामों का गुणा-भाग चल रहा है।

  • चिड़िया बेलगाम उड़ी जा रही है,
  • वॉट्सएप्प् कंट्रोल नहीं हो रहा

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और जो बचा है उसमें महान लेखक एल्गोरिदम के तिलिस्म में गोते लगा रहे हैं, वे सोच रहे हैं कि उनका लेखन इतना क्रांतिकारी हो गया है कि उसकी पहुंच ही नियंत्रित की जा रही है, अन्यथा वह पचास एक शहरों के दस बीस मोहल्ले में आग ही लगा देते।

 

फिलहाल मैं सोच रहा हूं वासुदेव,

क्रांतियों से अटे पड़े इस देश में कृष्ण क्रांति कब होगी? तुझे पता है तेरे नाम के नाम से गूंजती इस क्रांति की विरह वेदना से सबके चित् में समभाव सध गया है. सब "समत्वं योग उच्यते" गा रहे हैं।

इधर, कोरोना काल की तो कृपा ही निराली हुई है. अमीर-गरीब मृत्यु के आधार पर समान हुए हैं। दोनों घर में बैठे हैं और दोनों अस्पताल में भी रहे हैं। गरीब तो इतने बड़े दिल का हो गया है कि उसे अस्पताल की भी जरूरत नहीं रही। वह सड़क पर ही मर गया है..! फिर आर्थिक समानता तो ऐसी बढ़ी है कि सारी खाइयां खुद ही ऊपर आकर बोल रही है अब तो हमें पाट लो, हमारी कम ज्यादा को छांट लो..!

पर प्रभु..!

आप तो इस ब्लैक रिवोल्यूशन के बारे में तनिक सोचिए कृपासिंधु। देखिए ना पेट्रोल के भाव आसमान नहीं लोगों के दिलो-दिमाग को छू रहे हैं। शहर-शहर लोगों के माथे पर इस ज्वलनशील पदार्थ का ऐसा असर है कि हर सिर गर्म हो रहा है। डर है कि जरा ठनका कि माथा फट ना जाए। वो तो कोराना काल में लोगों का दिमाग काम नहीं कर रहा माधव, वरना पेट्रोल के दाम और ज्यादा आसमान छूने से पहले लोग आसमान ही सिर पर उठा लेते।


तारणहार..!
तेरी लख..लख बलैया जाएं..!

इस मॉनसूनी महंगाई की आग को ठंडी कर दे, अपने करुणा सागर से कुछ बूंदें छलका कर इसे ठंडा कर दे। हे.. गोविंद, जैसे शुक्राचार्य ने संजीवन हासिल कर शिव के अति प्रिय नंदी को तारकासुर की ताड़ना से बचाकर पुर्नजीवित कर दिया था।

हे श्रीवत्स कौस्तुभधराय- तू किसी जड़ी बूटी से पेट्रोल बनवा दे।

इधर एथेनॉल की चर्चा बहुत है कमलनाथ। इस संजीवनी की चर्चा सालों से सुन रहे हैं। तुम्हें तो पता है ये संजीवनी कब तुम्हारे नाम की क्रांति को जन-जन के हदय को विश्रांति देकर सभी के जेब का सदमा कम करेगी। नाथ सालों से सुन रहा हूं कृष्ण क्रांति, लेकिन गन्ना, चुकंदर, मकई, जौ, आलू, सूरजमुखी और गंध सफेदा से तैयार यह महाऔषधि कब हम गरीबों पर कृपा करेगी आत्मदेव।

कलिकाल में ज्ञानीजन जटरोपा के पौधे की नाना प्रकार से चर्चा करते आए हैं परमात्मन्। कहते हैं सागर पार के दूरस्थ देशों में इसके बूते पेट्रोल बना डाला है प्रभो..! चर्चा तो यह भी है कि- बंजर जमीन पर ही उग जाता है और हमारे यहां तो बंजर जमीन दिलो-दिमाग से लेकर यत्र-तत्र और सर्वत्र फैली हुई है।
 

आधुनिक काल के ऋषिजन बताते हैं- साढ़े तीन किलो जटरोपा बीज से एक लीटर जैव ईंधन बन जाता है। तैयारी सब है आत्मदेव- राजन् की सरकार ने देश में 3.3 करोड़ हेक्टेयर बंजर धरती बैलेंस में टिका रखी है, बस आप तो ये बता दो ये शुरू कब होगा?



तुम्हारी कृपा हो तो हरि ये कृष्ण क्रांति आ ही जाए नाथ- बहुत दे चुका हूं पेट्रोल के पैसे..!

मेरे नाथ..!

जैसे एक प्राप्ति होती है और एक प्रतीति होती है प्रभु, वैसे ही कब तुम्हारे नाम की क्रांति प्रतीति से हटकर प्राप्ति में बदलेगी हमें पता ही ना चलेगा..! बस कृपा का क्लिक दबाने की जरूरत है नंदलाल और मेरी पीड़ा तो एडभांस में हर लो यशोदावत्सल-

मेरी छोटी सी मोटरसाइकिल झूम-झूमकर पेट्रोल पी रही है। मैं बार-बार पंप पर जाकर हार्ट की पंपिंग बढ़ा रहा हूं। पेट्रोल पंप पर मीटर घूमता है तो मन मष्तिष्क में उच्चाटन होता है। हृदय कंपित होता है। वह जो पेट्रोल के पाइप के मुंह पर टेटुआ लगा रहता है ना प्रभु, वह जब मेरी मोटरसाइकिल की नाभि में अपना मुंह घुसाकर पेट्रोल उंडेलता तो लगता है और उसका मुंह वहीं फंस जाए और दिनों की प्यासी मेरी मोटरसाइकिल वह पूरा का पूरा भीतर खींच ले, लेकिन एक खट के बाद जब वह टेटुआ बाहर निकलता है और पेट्रोल बंद हो जाता है, तब हे मुरारी मेरी हिस्से की धरती कांप जाती है। रही-सही कसर मेरे रोम-रोम में बसने वाला वह पेट्रोल पंप का “राम” पूरी कर देता है, जब वह हाथ बढ़ाकर 105 रुपए पेट्रोल के मांगता है तो मेरा समत्व भाव भंग हो जाता है प्रभु।

कुछ करो बद्रीनाथ, हम तो जमीन पर रहते हैं..! कलियुग के पूरा होने में समय है. कलि अवतार में भोत दिन भी हैं..!

मैं राम का नहीं प्रभु तुम्हारा यानी की कृष्ण का उपासक हूं। क्रांति तो भगवन् आप यानी कृष्ण ही कर सकते हैं, तो फिर भला सत्ता के भीतर ऐसी प्रेरणा क्यों नहीं देते कि एलन मस्क नाम के उस अति प्रज्ञावान् मानुष की कृपा से इस आर्यावर्त् में एक क्रांति हो जाए और पेट्रोल के भाव सम्मानजनक हो जाएं।

हे..! दीनानाथ, कृपा निधान, आपसे निवेदन है कि राष्ट्र के राजन् का ध्यान वाहनों के शरीर को संचालित करने वाले ईंधन की आवश्यकता पर केंद्रित हो जिससे कोटि कोटि जनता की आत्मा को आराम मिल जाए।

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हे कृपानाथ..!
कृष्ण क्रांति आप ही ला दो, हमारे बस की तो बस बातें ही नजर आ रही हैं।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 

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