चन्द्रसिंह के वंशज आज भी भुगत रहे हैं देशप्रेम की सजा
चन्द्रसिंह गढ़वाली के वंशज आज भी देश प्रेम की सजा भुगत रहे हैं। 1 अक्तूबर, 1979 को वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की मौत के बाद उनके दोनों बेटों आनंद गढ़वाली और कुशलचंद्र गढ़वाली का भी असामयिक निधन हो गया। 21 जनवरी, 1975 को अविभाजित यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा ने कोटद्वार भाबर के हल्दूखाता गांव से सटी बिजनौर जिले के साहनपुर रेंज में दस एकड़ जमीन 90 साल की लीज पर उन्हें दी है, जिसमें गढ़वाली के बड़े बेटे स्व. आनंद गढ़वाली के परिवार में उनकी विधवा कपोत्री देवी और दो बेटे आलोक और रुपेश गढ़वाली का परिवार रहता है।
लीज का नवीनीकरण न होने के कारण उत्तर प्रदेश वन विभाग पूर्व में उन्हें अतिक्रमणकारी घोषित करते हुए जमीन खाली करने का नोटिस थमा चुका है। उत्तराखंड के जनप्रतिनिधियों के हस्तक्षेप और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के संज्ञान में आने के बाद मामला रुक गया, लेकिन परिजन अब उक्त जमीन को अपने नाम पर कराने या उत्तराखंड में जमीन दिलाने की मांग कर रहे हैं।
उनकी मांग जायज इसलिए है कि देशप्रेम की मिसाल पेश करने और अदम्य साहस दिखाने पर अंग्रेज सरकार ने चन्द्रसिंह की जमीन जायदाद जब्त कर ली थी। आजादी के बाद तो उनकी जायदाद वापस मिलनी ही चाहिए थी। लेकिन यह सोचने की फुरसत किसको है?
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हवलदार मेजर चन्द्र सिंह के अलावा हवलदार नारायण सिंह गुसाईं, नायक जीत सिंह रावत, नायक भोला सिंह बुटोला, नायक केशर सिंह रावत, नायक हरक सिंह धपोला, लांस नायक महेन्द्र सिंह, लांस नायक भीमसिंह बिष्ट, लांस नायक रतन सिंह नेगी, लांस नायक आनन्द सिंह रावत, लांस नायक आलम सिंह फरस्वाण, लांस नायक भवान सिंह रावत, लांस नायक उमराव सिंह रावत, लांस नायक हुकम सिंह कठैत, और लांस नायक जीतसिंह बिष्ट को लम्बी सजाएं हुईं।
इनके अलावा पाती राम भण्डारी, पान सिंह दानू, रामसिंह दानू, हरक सिंह रावत, लछमसिंह रावत, माधोसिंह गुसाईं चन्द्र सिंह रावत, जगत सिंह नेगी, ज्ञानसिंह भण्डारी, शेरसिंह भण्डारी, मानसिंह कुंवर, बचन सिंह नेगी, रूपचन्द सिंह रावत, श्रीचन्द सिंह सुनार, गुमान सिंह नेगी, माधोसिंह नेगी, शेरसिंह महर, बुद्धिसिंह असवाल, जूरासंध सिंह रमोला, रायसिंह नेगी, किशन सिंह रावत, दौलत सिंह रावत, करम सिंह रौतेला, डबल सिंह रावत, हरकसिंह नेगी, रतन सिंह नेगी, हुक्म सिंह सुनार, श्यामसिंह सुनार, सरोप सिंह नेगी, मदनसिंह नेगी, प्रताप सिंह रावत, खेमसिंह गुसाईं एवं रामचन्द्र सिंह चौधरी को कोटमार्शल द्वारा सेना की नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया।
त्रिलोक सिंह रावत, जैसिंह बिष्ट, गोरिया सिंह रावत, गोविन्द सिंह बिष्ट, दौलत सिंह नेगी, प्रताप सिंह नेगी और रामशरण बडोला को सेना से डिस्चार्ज किया गया।
चन्द्र सिंह गढ़वाली के गढ़वाल प्रवेश पर रोक थी
1930 में चन्द्रसिंह गढ़वाली को 14 साल के कारावास के लिए ऐबटाबाद की जेल में भेज दिया गया। जिसके बाद उन्हें अलग-अलग जेलों में स्थानान्तरित किया जाता रहा। पर उनकी सजा कम हो गई और 11 साल के कारावास के बाद इन्हें 26 सितम्बर 1941 को आजाद कर दिया। परन्तु कम्युनिस्ट होने के कारण उनका गढ़वाल में प्रवेश प्रतिबंधित रहा।जिस कारण इन्हें यहां-वहां भटकते रहना पड़ा और अन्त में ये गांधी जी के पास चले गए।
गांधी जी इनसे बेहद प्रभावित रहे। 8 अगस्त 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में इन्होंने इलाहाबाद में रह कर इस आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई और फिर से 3 तीन साल के लिए गिरफ्तार हुए। 1945 में इन्हें आजाद कर दिया गया। जिस गढ़वाली ने हिन्दू मुस्लिम एकता की मिसाल पेश की थी उसी के गढ़वाल में साम्प्रदायिक तत्व राजनीतिक लाभ के लिए कभी लव जिहाद तो कभी भूमि जिहाद के नाम पर वैमनस्यता फैला रहे हैं।
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