पंचायती राज व्यवस्था के 30 वर्ष
देश की पंचायती राज व्यवस्था जब 30वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है, तब सच्चाई ये है कि महिला के आरक्षित पद पर जीते महिला जनप्रतिनिधि के पति, परिवार के दबंग पुरुष उस पद पर डी फैक्टो आसीन हो कर राज कर रहे हैं। किसी भी महिला के जीतने पर लोग उस महिला को कम बल्कि उसके पति, पुत्र, पिता, ससुर को अधिक बधाई देते हैं।
चौक चौराहों पर दिनचर्या में यह चर्चा आप ने भी सुनी होगी कि फलां की घरवाली या वाइफ जीत गई। महिला जन प्रतिनधियों की हालत ये है कि पंचायतराज अधिनियम के विपरीत सरकारी बैठकों में भी महिला जन प्रतिनधि की जग़ह उनके पति या परिवार के पुरुष बैठक में आते हैं और कामकाज में दखलंदाजी भी करते हैं।
उत्तर प्रदेश, बिहार सहित कई राज्य में पंचायती राज विभाग या पदाधिकारी को ऑफिस आर्डर निकालना पड़ा कि ग्राम पंचायतों और सभी सरकारी बैठकों में महिला जन प्रतिनधि स्वयं आएंगी एवं मीटिंग पंचायतघरों अथवा पंचायतघर नहीं होने पर प्राथमिक स्कूल में होंगी। केवल क़ानून बनाने से कुछ फ़र्क नहीं होगा बल्कि महिला वर्ग की सहभागिता बढ़ानी होगी ।
महिला जन प्रतिनिधि को आत्मनिर्भर बनना चाहिए, पहले घर के निर्णय में भागीदारी की लड़ाई लड़े। चुनौतियों को स्वीकार करना चाहिए, तभी सही अर्थ में महिला सशक्तीकरण एवं ग्रामीण लोकतंत्र मजबूत व सुदृढ़ होगा। साथ साथ समाज व व्यवस्था को महिला के प्रति अपना दृष्टिकोण बदलना होगा।
वर्तमान समय में प्रत्येक क्षेत्र में महिलाएं अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाती चली आ रही हैं। इक्कीसवीं शताब्दी एवं वैश्वीकरण की इस दौड़ में महिलाएं, पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। हमें सामाजिक परिवर्तन करना होगा। महिला जन प्रतिनिधयों को अपनी पहचान एवं धमक का एहसास कराना होगा। इसके लिए पति या ससुर के नाम की कोई जरूरत नहीं होनी चाहिए।
महिलाओं का सराहनीय प्रदर्शन
कई पंचायतों में महिला मुखिया ने बहुत अच्छा कार्य किया है। हिमाचल के काजा पूर्व पंचायत की प्रधान सोनम डोलमा ने बेहतरीन मिसाल पेश की हैं, जैसे जुआ व ताश पर प्रतिबंध लगाया, ये देश के अन्य पंचायतों के लिए एक अच्छा मॉडल हो सकता है। बिहार के सीतामढ़ी जिले के सोनबरसा प्रखंड में सिंहवाहिनी पंचायत की पूर्व मुखिया ऋतु जायसवाल ने भी ने अच्छी पहचान बनाई है।
छवि राजावत, सुषमा भादु, मीना बहन, वंदना बहादुर, आरती देवी, अतराम पद्म बाई, भक्ति शर्मा और राधा देवी आदि जैसे महिला पंचायत प्रधान हर राज्य में मिल जाएंगी केवल जरूरत है कि महिला स्वयं फैसले लें, तभी महिला-पुरुष का फासला मिटेगा। गरीबमुक्त, भ्रष्टाचारमुक्त व प्रधानपतिमुक्त पंचायतों से ही महिला सशक्तीकरण का संवैधानिक प्रयास सफल हो पायेगा।
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