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सड़क पर विपक्ष: कितने असल मुद्दे हैं कांग्रेस के पास? आखिर क्यों निशाने पर है चुनाव आयोग?

सार

SIR को लेकर विपक्ष की मूल आपत्तियां सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचीं। सवाल चुनाव आयोग के अधिकार, मतदाता सूची के पुनरीक्षण, दस्तावेजों और नागरिकता संबंधी जांच को लेकर उठाए गए, लेकिन अदालत ने SIR पर रोक लगाने का आदेश नहीं दिया।
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राहुल-प्रियंका को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया। - फोटो : ANI
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विस्तार
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लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका सरकार से सवाल पूछने, उसकी नीतियों की कमियों को सामने लाने और जनता से जुड़े मुद्दों को मजबूती से उठाने की होती है। लेकिन  स्पेशल  इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर विपक्ष जिस तरह लगातार चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निशाने पर ले रहा है, उससे यह सवाल जरूर उठता है कि क्या सरकार को घेरने के लिए विपक्ष के पास इससे अधिक महत्वपूर्ण जनसरोकार के मुद्दे नहीं हैं? कहावत है- ''खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे।'' लगातार राजनीतिक पराजयों के बाद विपक्ष की रणनीति को इसी मुहावरे के चश्मे से देखने वाले लोगों की संख्या भी कम नहीं है। हालांकि, लोकतंत्र में किसी राजनीतिक दल की नीयत का फैसला जनता करती है, लेकिन मुद्दों का चयन जरूर यह बताता है कि कोई दल सरकार को किन प्रश्नों पर जवाबदेह बनाना चाहता है।

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SIR को लेकर विपक्ष की मूल आपत्तियां सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचीं। सवाल चुनाव आयोग के अधिकार, मतदाता सूची के पुनरीक्षण, दस्तावेजों और नागरिकता संबंधी जांच को लेकर उठाए गए, लेकिन अदालत ने SIR पर रोक लगाने का आदेश नहीं दिया। 10 जुलाई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में SIR पर रोक नहीं लगाई। इसके बजाय उसने प्रक्रिया में अधिक समावेशिता के लिए आधार कार्ड, वाटर कार्ड और राशन कार्ड जैसे दस्तावेजों पर भी विचार करने को कहा। 28 जुलाई 2025 को भी अदालत ने ड्राफ्ट मतदाता सूची के प्रकाशन पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। यानी जिस प्रक्रिया को लेकर इतना बड़ा राजनीतिक शोर खड़ा किया गया, उस पर अदालत ने तत्काल रोक लगाने के बजाय उसे कानून और मतदाता-अधिकारों की सुरक्षा के साथ आगे बढ़ने दिया।

इसके बाद 22 अगस्त 2025 को अदालत ने करीब 65 लाख ऐसे मतदाताओं से संबंधित जानकारी सार्वजनिक करने और उन्हें दावा दाखिल करने का अवसर देने के निर्देश दिए, जिनके नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं थे। राजनीतिक दलों के बूथ लेवल एजेंट्स को भी लोगों की सहायता करने को कहा गया। साफ था कि अदालत का उद्देश्य SIR को रोकना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना था कि कोई पात्र मतदाता अपनी बात रखने के अवसर से वंचित न हो। फिर आया 27 मई 2026 का ऐतिहासिक फैसला। 
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सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में चुनाव आयोग द्वारा कराए गए SIR की वैधता को बरकरार रखा और चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया। अदालत ने माना कि संविधान के अनुच्छेद 324 और रिप्रेजेंटेशन  ऑफ द पीपुल एक्ट की धारा 21(3) के तहत चुनाव आयोग को स्पेशल इंटेंसिव रिविजन कराने की शक्ति प्राप्त है। अदालत ने यह भी माना कि मतदाता सूची की शुद्धता स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए आवश्यक है तथा मतदाता पात्रता निर्धारित करने के लिए चुनाव आयोग सीमित स्तर पर नागरिकता संबंधी जांच कर सकता है। अर्थात जिस प्रक्रिया के अधिकार पर ही सवाल खड़ा किया जा रहा था, उसके मूल अधिकार को सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकार कर लिया।

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है- ''खोदा पहाड़, निकली चुहिया'' वाली स्थिति तो नहीं बन गई? पहले SIR को असंवैधानिक बताने की कोशिश, फिर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई और अंततः अदालत द्वारा उसकी मूल वैधानिकता को बरकरार रखा जाना राजनीतिक विमर्श में इसे विपक्ष के लिए असहज स्थिति मानने वाले लोग इसी तरह के मुहावरों का इस्तेमाल कर रहे हैं।
 

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सरकार को घेरने के लिए महंगाई, रोजगार, किसान, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार और विकास जैसे असंख्य वास्तविक मुद्दे हैं। - फोटो : पीटीआई
अवैध प्रवास का सवाल और तुष्टिकरण की राजनीति
SIR की पूरी बहस का एक महत्वपूर्ण पहलू अवैध प्रवास और अपात्र लोगों के मतदाता सूची में शामिल होने की आशंका है। बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में सीमा-पार अवैध प्रवास का मुद्दा लंबे समय से न सिर्फ राजनीतिक बहस का विषय बना हुआ है, बल्कि भारतीय डेमोग्राफी के लिए चिंता भी बना हुआ है। देश होने वाले तमाम दंगों में, हिंसा में आतंकी गतिविधियों में इन घुसपैठियों का हाथ मिलता रहा है। यदि किसी राज्य में विदेशी नागरिकों के अवैध रूप से मतदाता सूची में शामिल होने की आशंका है, तो उसकी जांच करना चुनावी व्यवस्था की स्वाभाविक जिम्मेदारी होनी चाहिए।

यहां एक बात बिल्कुल स्पष्ट रहनी चाहिए- किसी व्यक्ति के मुस्लिम होने मात्र से उसे घुसपैठिया कहना गलत है। नागरिकता धर्म के आधार पर तय नहीं होती। लेकिन यदि दस्तावेजों और कानूनी जांच के आधार पर कोई व्यक्ति विदेशी नागरिक पाया जाता है, तो उसका नाम मतदाता सूची में नहीं होना चाहिए, चाहे वह किसी भी धर्म का क्यों न हो। यही वह बिंदु है जहां विपक्ष पर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लगाए जाते हैं। आलोचकों का सवाल है कि यदि SIR से अपात्र मतदाताओं की पहचान होती है और उसका असर किसी राजनीतिक दल के संभावित वोट-बैंक पर पड़ता है, तो क्या केवल राजनीतिक नुकसान की आशंका के कारण मतदाता सूची के पुनरीक्षण का विरोध उचित है?

भारतीय लोकतंत्र में मूल सिद्धांत बहुत सरल है- एक पात्र नागरिक, एक वोट। न किसी विदेशी नागरिक को वोट का अधिकार मिलना चाहिए और न किसी भारतीय नागरिक का वोट केवल उसकी जाति या धर्म के आधार पर छीना जाना चाहिए। लोकतांत्रिक राजनीति में भी कसौटी यही होनी चाहिए कि राजनीति जनता के हित के लिए हो, किसी विशेष वोट-बैंक को खुश करने के लिए नहीं। यदि SIR में कोई गलती है तो विपक्ष को तथ्य और प्रमाण के साथ उसे सामने रखना चाहिए। लेकिन यदि उद्देश्य केवल यह है कि संभावित अपात्र मतदाताओं की पहचान न हो, क्योंकि उससे किसी दल का चुनावी गणित प्रभावित हो सकता है, तो जनता को इस राजनीति पर सवाल पूछने का पूरा अधिकार है। 

नकारात्मक राजनीति और संस्थाओं पर अविश्वास का अभियान
विपक्ष के पास सरकार को घेरने के लिए महंगाई, रोजगार, किसान, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार और विकास जैसे असंख्य वास्तविक मुद्दे हैं। ये ऐसे विषय हैं जिनसे आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होती है। लेकिन इन मुद्दों को छोड़कर यदि राजनीतिक विमर्श लगातार चुनाव आयोग और SIR के इर्द-गिर्द घूमता रहे तो इसे नकारात्मक राजनीति कहने वालों की दलील को आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता। यहां एक और मुहावरा याद आता है- ''आ बैल मुझे मार।'' यदि विपक्ष स्वयं ऐसे मुद्दे को अपनी राजनीति का केंद्र बनाता है, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय पहले ही SIR की मूल वैधानिकता को स्वीकार कर चुका है, तो इससे जनता के बीच उसके मुद्दों की प्राथमिकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

विपक्ष को चुनाव आयोग से सवाल पूछने का पूरा अधिकार है। यदि किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया है, किसी प्रक्रिया में कानून का उल्लंघन हुआ है या आयोग ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कोई कदम उठाया है तो उसे अदालत और जनता के सामने प्रमाण सहित रखना चाहिए। लेकिन चुनाव आयोग की किसी कार्रवाई पर सवाल उठाना और पूरी चुनावी व्यवस्था पर अविश्वास पैदा करना दो अलग-अलग बातें हैं।

5 अक्तूबर 2026 की सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही भी यह बताती है कि अदालत ने चुनाव आयोग को आलोचना से ऊपर नहीं रखा है। Modified Form 6 के संबंध में अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने ऐसे संशोधन को मंजूरी नहीं दी थी और आयोग से स्पष्टीकरण मांगा। इसका मतलब साफ है, SIR की मूल वैधानिकता बरकरार है, लेकिन चुनाव आयोग की हर कार्रवाई न्यायिक समीक्षा से परे नहीं है। यही संवैधानिक संतुलन है।
 
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राजनीति में भी सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए तथ्य बोलना आवश्यक है। - फोटो : पीटीआई
जनता के सामने अब असली सवाल
SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में आपत्तियां पहुंचीं, अदालत ने उन्हें सुना, प्रक्रिया में आवश्यक सुधार के निर्देश दिए, मतदाताओं के दावे और आपत्तियों का रास्ता सुनिश्चित किया और अंततः 27 मई 2026 को बिहार SIR की वैधता तथा चुनाव आयोग की SIR कराने की शक्ति को बरकरार रखा। इसके बावजूद यदि विपक्ष लगातार SIR को ही अपनी राजनीति का केंद्रीय मुद्दा बनाए रखता है तो जनता के सामने सवाल खड़ा होता  है। क्या यह सरकार को जवाबदेह बनाने की राजनीति है या अपनी राजनीतिक 

असफलता से ध्यान हटाने का प्रयास?
संस्थाओं की आलोचना लोकतंत्र की खूबसूरती है, लेकिन संस्थाओं के प्रति बिना ठोस प्रमाण अविश्वास पैदा करना लोकतंत्र को मजबूत नहीं करता।
रामचरितमानस की एक प्रसिद्ध पंक्ति है—

'सचिव बैद गुरु तीनि जौं, प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तनु तीनि कर, होइ बेगिहीं नास॥'

राजनीति में भी सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए तथ्य बोलना आवश्यक है। सरकार को सच सुनने की जरूरत है और विपक्ष को भी जनता के सामने तथ्य रखने की। SIR पर सुप्रीम कोर्ट का रुख अब सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा है। इसलिए यदि विपक्ष को SIR की किसी विशेष कार्रवाई पर आपत्ति है, तो उसे उस विशेष कार्रवाई को चुनौती देनी चाहिए, लेकिन पूरी चुनावी व्यवस्था को ही कटघरे में खड़ा करने से पहले यह भी बताना होगा कि उसके पास इसके समर्थन में क्या ठोस प्रमाण हैं। क्योंकि चुनाव आयोग पर आरोप लगाने से बेरोजगारी खत्म नहीं होगी, महंगाई कम नहीं होगी, भ्रष्टाचार , अपराध, थानों, तहसीलों कि स्थिति नहीं सुधरेगी और सरकारी स्कूल-अस्पताल अपने आप बेहतर नहीं हो जाएंगे।

जनता को सरकार से जवाब चाहिए, लेकिन जनता को एक ऐसा विपक्ष भी चाहिए जो सरकार से वास्तविक सवाल पूछे। आज आवश्यकता यह है कि चुनावी राजनीति को केवल आरोप-प्रत्यारोप का अखाड़ा न बनाया जाए। चुनाव आयोग की गलतियों पर सवाल हों, सरकार की गलत नीतियों पर सवाल हों है और विपक्ष की गलत रणनीतियों पर भी जनता सवाल करे।

आखिर लोकतंत्र में अंतिम निर्णायक कोई राजनीतिक दल नहीं, जनता होती है लेकिन विपक्ष पूरी चुनावी प्रक्रिया, चुनाव आयोग और संविधानिक संस्थाओं को इस प्रकार से कटघरे में ना खड़ा करे कि भविष्य में हर हारा हुआ राजनीतिक दल ये बोलने लगे कि चुनाव आयोग जीते हुए दल से मिला हुआ है।


अस्वीकरण: यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें। 
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