राजनीति में परिवारवाद हावी
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भाजपा में भी परिवारवाद
इसका अर्थ यह नहीं कि भाजपा में परिवारवाद नहीं है। भाई-भतीजावाद की विष बेल वहां भी फल फूल रही है। इसे जायज ठहराने भाजपा नेताओ ने अजब तर्क देना शुरू किया था कि उनके जो परिजन बरसों से राजनीति कर रहे हैं तो उसे परिवारवाद नहीं माना जाना चाहिए।
लेकिन लगता है कि पीएम मोदी और भाजपा आलाकमान ने अपनी पार्टी के भीतर भी परिवारवाद को हतोत्साहित करने का साहसिक फैसला कर लिया है। पिछले चुनावों में हमने देखा कि परिवार के किसी एक व्यक्ति को ही चुनाव का टिकट दिया गया।
भाजपा अब इस परिवारवाद विरोध को दक्षिणी राज्यों में अपना राजनीतिक हथियार बनाने की तैयारी में है। इससे तेलंगाना, आंध्र और तमिलनाडु के सत्तारूढ़ दलों में चिंता है। लिहाजा जवाबी अस्त्र के रूप में उन्होंने क्षेत्रीय अस्मिता और सामाजिक न्याय के अपने पुराने औजारों पर धार तेज करनी शुरू कर दी है।
कुछ दिन पहले ही स्टालिन ने ‘सामाजिक न्याय मोर्चा’ बनाने की घोषणा की थी। इस मोर्चे में शामिल होने के लिए उन्होंने बीजेपी को छोड़कर कांग्रेस समेत 65 राजनीतिक दलों को पत्र लिखा था। माना जा रहा है कि जब हिंदी बेल्ट की राजनीति हिंदुत्व विचार की ओर कदम बढ़ा चुकी है तो स्टालिन उसके मुकाबले मंडल राजनीति को धार देना चाहते हैं।
दक्षिणी राज्यों पर मोदी का नजर
वैसे सामाजिक न्याय का मुद्दा इस देश में तीन दशकों से अहम रहा है। लेकिन 2014 में मोदी के पीएम बनने के बाद इसकी चमक फीकी पड़ने लगी है। लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, कांशीराम, मायावती, राम विलास पासवान जैसे नेता इसकी उपज थे। लेकिन अब परिदृश्य बदल रहा है।
दक्षिणी राज्यों में सामाजिक न्याय का मुद्दा भाजपा के आक्रामक हिंदुत्व और विकास के मुद्दों के आगे वो कितने दिन टिक पाएगी, कहना मुश्किल है। वास्तव में उत्तर, पूर्वोत्तर, मध्य भारत के अधिकांश राज्यों में भगवा परचम फहराने के बाद भाजपा का अगला लक्ष्य दक्षिण विजय ही है। लेकिन इसके लिए उसे अपनी ‘हिंदू, हिंदी, हिंदुस्तान’ वाली छवि से बाहर निकलना होगा।
शायद इसीलिए भाजपा इन राज्यो में परिवारवाद पर ज्यादा से ज्यादा चोट करेगी। उसे उम्मीद है कि पहले हल्ले में उसे लोकसभा चुनाव में कुछ फायदा हो सकता है। वैसे भी इन राज्यों में सशक्त विपक्ष का स्पेस अभी खाली है।
तमिलनाडु में जयललिता के निधन के बाद उनकी पार्टी एआईएडीएमके लगभग नेतृत्व विहीन है तो आंध्र प्रदेश में बरसों सत्ता में रही तेलुगू देशम और कांग्रेस भी निस्तेज पड़ी है। तेलंगाना में भी स्थिति बहुत अलग नहीं है और कर्नाटक में तो खुद भाजपा ही सत्ता में है।
परिवारवाद के बहाने भाजपा राजनीतिक नेताओं द्वारा अपने ही लोगों को रेवडि़यां बांटने की नीति को बेनकाब करेगी। दक्षिणी प्रदेशों की जनता इसे कितनी तवज्जो देगी, यह तो चुनाव नतीजे ही बताएंगे। लेकिन जो दांव खेला जा रहा है, वह दूरगामी है, इसमें शक नहीं।
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