तीन पवित्र नदियों गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम पर बसा है तीर्थराज प्रयाग। इसी प्रयागराज के निवासी थे डीपीटी के नाम से मशहूर दिवंगत देवी प्रसाद त्रिपाठी। उनका व्यक्तित्व भी एक तरह से संगम ही था। विभिन्न रानजीतिक धाराओं के लोग उनके ड्राइंगरूम से लेकर बैठकी तक के दोस्त थे। 1999 से सोनिया गांधी के विदेशी मूल के सवाल पर नरसिंह राव की कांग्रेस से अलग होकर वे राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में सक्रिय थे, लेकिन उनके निजी रिश्ते में राजनीतिक धाराओं की कोई सीमा नहीं थी।
लंबे समय तक उनके नजदीकी रहे नेपाल के कांग्रेसी सांसद और नेपाल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रदीप गिरि कहते हैं कि ऑन द रिकॉर्ड भले ही सियासी गलियारे की कई शख्सियतें उनकी विरोधी थीं, लेकिन वैचारिकता की जब भी बात आती थी, उनके सामने पसोपेश जैसी स्थिति आती थी, तब वे शख्सियतें अपनी पार्टी लाइन भूल जाती थीं और डीपीटी के फोन की घंटी बजने लगती थी।
दरअसल, मौजूदा राजनीति परिदृश्य में संस्कृति की बात करना तकरीबन बेमानी सा हो गया है। ऐसे परिदृश्य में डीपीटी अपवाद ही कहे जा सकते हैं।
हर शख्सियत में अच्छाइयों के साथ ही कुछ कमियां भी होती हैं। डीपीटी के व्यक्तित्व में भी एकाध ऐसे छींटे थे, लेकिन उनसे इतर उनका व्यक्तित्व विराट था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के विद्यार्थी और अध्यापक रहे डीपीटी को राजनीति की दुनिया में संस्कृति का दूत कहा जा सकता है। मौजूदा परिदृश्य में भारतीय जनता पार्टी के पूर्व अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी भी ऐसी शख्सियत हैं, जिनकी गति वेद, विज्ञान, संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी और राजनीति की दुनिया हर जगह एक समान हैं। मौजूदा राजनीति में ऐसी दूसरी शख्सियत डीपीटी ही थे।
हिंदी और अंग्रेजी साहित्य और ज्ञान-विज्ञान की अधुनातन किताबों का अध्ययन उनका जैसे शगल था। उनकी एक आंख खराब हो चुकी थी, इसके बावजूद पढ़ने की उनकी गति बेहद तेज थी। किसी किताब को ना सिर्फ वे तेजी से पढ़ लेते थे, बल्कि उसकी मीमांसा कर पाने में भी सक्षम थे।
अगर आप रिपोर्टर हैं तो आपकी पहुंच समकालीन राजनीतिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक शख्सियतों तक आसान हो जाती है। अगर आपके पास प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्थान का आधार होता है तो आपके लिए यह सोने पर सुहागा जैसा हो जाता है। इसके बावजूद शीर्ष की राजनीतिक शख्सियतें रिपोर्टरों से कतराती हैं, बात करने से बचती हैं और अगर उनकी राजनीतिक पूछ उस समकालीन परिदृश्य में ज्यादा हो तो नखरे भी दिखाती हैं।
2000 के आसपास सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा भारतीय राजनीति को मथ रहा था। जाहिर है कि ऐसे वक्त में यह मुद्दा उठाने वाले राजनीतिक दल की पहली पांत के नेताओं की पूछ-परख बढ़ गई थी। उन दिनों इन पंक्तियों के लेखक को उसके संस्थान की ओर से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के किसी अहम नेता से बात करने का निर्देश मिला।
सप्ताह के साक्षात्कार स्तंभ के लिए दिल्ली में उन दिनों राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के दो ही नेता उपलब्ध थे। जब डीपीटी से संपर्क किया गया तो उन्होंने खुद ही दफ्तर आकर इंटरव्यू देने का प्रस्ताव रख दिया। क्योंकि तब वे फरीदाबाद में कहीं थे और इन पंक्तियों के लेखक को उसी दिन वह इंटरव्यू तैयार करके देना था।
अहमियत बढ़ने के बाद रिपोर्टर की मजबूरी समझने से राजनीतिक हस्तियां कतराने लगती हैं। लेकिन डीपीटी ने अलग अनुभव कराया। डीपीटी जितने पढ़ाकू थे, रिश्ते निभाने में उतने ही पक्के थे। अराजक जीवन शैली अपनाने के बावजूद उनमें जबरदस्त जीवट था। उनके निधन से चार-पांच दिन पहले ही उनसे कांग्रेस के पूर्व महासचिव मोहन प्रकाश और प्रदीप गिरि ने भेंट की थी।
मोहन प्रकाश का कहना है कि मिलते ही गुरु उठ बैठा और ऐसे बात किया, मानों उसे कुछ हुआ ही नहीं हो। डीपीटी की जयंती छह जनवरी को है। इस बार मोहन प्रकाश, प्रदीप गिरि और दूसरे दोस्तों ने उनका जन्मदिन अपने तईं मनाने का फैसला किया था। लेकिन जन्मदिन से पहले ही डीपीटी दुनिया से ही कूच कर गए।