किसानों के लिए ऐसी व्यवस्था हो की उन्हें कर्ज लेना ही न पड़े।
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चुनावी मौसम में विभिन्न राजनीतिक दलों की जुबान से किसानों के लिए हितकारी बातें अन्य मुद्दों के समक्ष ओझल हो जाती हैं। जिस तरह से तमाम राजनीतिक दलों से लेकर मीडिया मंचों पर किसानों की दुर्दशा का व्याख्यान होता है, उसमें समाधान की शायद ही कोई चर्चा होती है। इससे यही लगता है कि यह समस्या वर्तमान समय में सबसे अधिक बिकाऊ विषय बनकर रह गई है।
आंकड़ों के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष 15,168 किसानों की मौत का कारण फसल संबंधित बैंकों का कर्ज न चुकता कर पाने के दबाव में आत्महत्या करना है। यही नहीं, हमारे देश के लाखों किसान बढ़ती महंगाई को लेकर भी परेशान हैं, क्योंकि इसका सीधा नुकसान किसानों की स्थिति पर पड़ता है।
वर्तमान में कृषि में आधारभूत ढांचे में निवेश की मेरे हिसाब से कोई आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता है सिर्फ प्रोसेसिंग फूड प्रोडक्शन और उनके मार्केटिंग प्रबंधन की जिससे किसान के आर्थिक हालात को काफी हद तक सुधारा जा सकता है। क्योंकि जब तक किसानों को रबी और खरीफ के मॉडल से बाहर नहीं निकाला जाएगा, तब तक किसान का बच पाना असंभव है।
किसानों के जो लघु ऋण दिए गए हैं इनको दीर्घकालीन में परिवर्तित किए जाने की आवश्यकता है तथा मार्केटिंग और फूड प्रोडक्शन पर स्वीकृत किए जाने की अनुशंसा वर्तमान समय में की जानी चाहिए।
लघु सीमांत कृषकों को और अधिक आर्थिक सहायता की आवश्यकता है जिससे खेती को मैकेनाइजेशन किया जा सके, ताकि गुणवत्ता में सुधार हो। वर्तमान उत्पादन गुणवत्ता योग्य नहीं है तथा अंतरराष्ट्रीय मार्केट में हम कहीं भी नहीं दिखते। जो कृषि संज्ञा संस्थाएं बनी हुई है उन सब को तुरंत प्रभाव से बंद कर उनकी जगह एक सार्वभौमिक संस्थान का निर्माण किया जाना चाहिए, ताकि उनका नियंत्रण किया जा सके।
बहुत सारे कृषि संस्थाओं का कृषि विकास में कोई योगदान नहीं है जबकि उनका बजट सालाना स्वीकृत होता है और उस बजट से कृषि अधिकारी उत्तर के विदेशों में सर्च पार्टी में व्यस्त हैं, इस पर अंकुश लगाए जाने की आवश्यकता है।
हमें समझना होगा कि किसानों की कर्ज माफी से उनकी यह समस्या हल नहीं होगी। क्योंकि कर्ज माफी तो सिर्फ एक राजनैतिक चाल है। कर्ज माफी का प्रलोभन देकर राजनैतिक दल सिर्फ अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं। अगर सच में किसानों की समस्या हल करनी है तो उनके लिए सिंचाई की व्यवस्था और उनकी फसल का सही मूल्य मिलना चाहिए।
किसानों के लिए ऐसी व्यवस्था हो की उन्हें कर्ज लेना ही न पड़े। किसानों के आर्थिक पक्ष को मजबूत करने के लिए उन्हें जागरूक करना चाहिए कि वे अपनी हैसियत से ज्यादा सरकारों के भरोसे कर्ज न लें। इसके साथ ही जिन फसलों, फलों या सब्जियों की बाजार में ज्यादा मांग है, उनकी खेती को ही अपनाएं। अंत में यह भी कहना उचित है कि किसानों की खराब हालत के लिए कहीं न कहीं व्यवस्था में पसरा भ्रष्टाचार भी जिम्मेदार है।
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