मुंशी प्रेमचंद जयंती विशेष: सन् 1935 में 'हंस' को भारतीय साहित्य का मुख्य पत्र बना दिया गया।
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एक युगद्रष्टा पत्रकार भी
प्रेमचंद एक युगद्रष्टा साहित्यकार ही नहीं, एक युगद्रष्टा पत्रकार भी थे। अपने पत्रों लेखों और टिप्पणीयां वे मानो आज की सच्चाई बयां करते लगते है। सन् 1905 में 'जमाना' में स्वदेशी चीजों का प्रचार कैसे बढ़ सकता है- विषय पर एक गंभीर टिप्पणी लिखते हुए मुंशी प्रेमचंद कहते है कि- स्वदेशी का अलख जगाने वाले और समाजवाद को ओढ़ने-बिछाने वाले बराबर दूरी पर खड़े हैं।
इस लिए खुली अर्थव्यवस्था और विनिवेश का अश्वमेध जारी है। प्रेमचंद की पत्रकारिता इस अश्वमेध के खिलाफ ललकार है। उनकी संपादकीय तटस्थता को साहित्यकार जैनेंद्र कुमार 'ममताहीन स द् भाव' कहा है।
भारत के स्वाधीनता संग्राम में भले ही प्रेमचंद ने खुलेआम भाग न लिया हो। पर अपने उपन्यासों-कहानियों, पत्र पत्रिकाओं में लेखों के जरिये वे आजादी के सवाल को और उस बहाने आजादी के संघर्ष के लिए लड़ने वाले नायकों में विद्रोह की चेतना जगाने में कभी पीछे नहीं रहे।अपने इस दृष्टिकोण का इजहार 3जून 1932 को बनारसी दास चतुर्वेदी को लिखे एक पत्र में भी किया है- मेरी आकांक्षा बहुत ज्यादा नहीं है।
खाने भर का मिल जाता है। मुझे दौलत-शोहरत नहीं चाहिए। पर मेरे भीतर 'मोटर बम' है। मैं तीन-चार अच्छी पुस्तकें लिख सकूं जो आजादी के काम आ सके। मेरे मानस का हंस अपनी चोंच में आजादी की मिट्टी लेकर अपना योगदान कर रहा है।
मुख्य पृष्ठ पर कन्हैयालाल मुंशी का नाम
सन् 1935 में 'हंस' को भारतीय साहित्य का मुख्य पत्र बना दिया गया। इसके मुख्य पृष्ठ पर कन्हैयालाल मुंशी का नाम भी जाने लगा। इस पत्रिका के सलाहकार मंडल में हिंदी, उर्दू, आसामी, उड़िया, गुजराती, मराठी, कन्नड़, तमिल, तेलगू और मलयालम के प्रतिष्ठित विद्वानों को शामिल किया गया। हिंदी में महात्मा गांधी, पुरुषोत्तम दास टंडन, रामनरेश त्रिपाठी काका साहेब कालेलकर सरदार नर्मदा प्रसाद सिंह जैसे नामचीन हस्तियां शामिल थी। अप्रैल सन् 1932 के अंक में संपादकीय टिप्पणी दमन की सीमा प्रकाशित हुई।
इस टिप्पणी के छपने के बाद हर्जाने के रूप में एक हजार जमानत मांगी गयी। प्रेमचंद ने जमानत जमा नहीं किया और हंस पत्रिका बंद करने का निर्णय किया। हंस की हंसवाणी कालम में अपनी भाषा सम्बधी अवधारणा को स्पष्ट करते हुए मुंशी प्रेमचंद जी लिखते है कि- अंग्रेजी भाषा का जादू कब तक हमारे सिर रहेगा? कब तक हम अंग्रेजों के गुलाम बने रहेंगे। इससे यहीं टपकता है कि हमारी राष्ट्रीयता अभी हृदय की गहराई तक नहीं पहुंची है।
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