ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए तत्काल कदम उठाए जाने चाहिए
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नॉर्वे और ग्रीनलैंड में रिकॉर्ड पारा
नॉर्वे और ग्रीनलैंड में भी गर्मी के नए प्रतिमान स्थापति हो रहे हैं। जलवायु परिवर्तन बहुत तेज गति से देश और पूरी दुनिया को प्रभावित कर रहा है। ग्लोबल वार्मिंग की वजह से बड़े पैमाने पर ग्लेशियर्स पिघल रहें हैं। ऑस्ट्रेलिया की एक जलवायु वैज्ञानिक और न्यू साउथ वेल्स विश्वविद्यालय में रिसर्च फेलो जोई थॉमस के अनुसार हाल में हुई मानवीय गतिविधियों ने ग्लोबल वार्मिंग को तेज कर दिया है और इसकी वजह से अंटार्कटिका में बड़े पैमाने पर बर्फ पिघल सकती है।
वास्तव में दोनों जगहों (अंटार्कटिक और आर्कटिक) पर एक साथ एक जैसी घटना अकल्पनीय लगती हैं, क्योकि इन दोनों जगहों की प्रकृति एकदम भिन्न प्रकार की है। ऐसे समय में अंटार्कटिक पर दिन लगातार छोटे होते हैं और सर्दी बहुत अधिक होनी चाहिए। ठीक उसी वक्त आर्कटिक सर्दी से बाहर निकल रहा होता है।
यहां एकदम उलटे मौसम हैं, उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव को एक साथ, एक समय पर पिघलते नहीं देखते। लेकिन इस बार ऐसा हुआ है तो यह पूरी दुनिया के लिए एक खतरें की घंटी है जिस पर तत्काल सब का ध्यान जाना चाहिए और ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए तत्काल कदम उठाए जाने चाहिए।
10 गुना तेजी से पिघल रहे हिमालय के ग्लेशियर
ग्लोबल वार्मिंग की वजह से 'तीसरा ध्रुव' कहे जानें वाले हिमालय के ग्लेशियर 10 गुना तेजी से पिघल रहे हैं। 'तीसरा ध्रुव' नाम से जाना जाने वाला हिमालय अंटार्कटिका और आर्कटिक के बाद ग्लेतशियर बर्फ का तीसरा सबसे बड़ा सोर्स है।
वैज्ञानिकों के अनुसार-
400 से 700 साल पहले के मुकाबले पिछले कुछ दशकों में हिमालय के ग्लेशियर 10 गुना तेजी से पिघले हैं। यह गतिविधि साल 2000 के बाद ज्यादा बढ़ी है। साइन्स जर्नल साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित हुए एक शोध के अनुसार इससे एशिया में गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु नदी के किनारे रहने वाले करोड़ों भारतियों पर पानी का संकट आ सकता है।
ब्रिटेन की लीड्स यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के अनुसार, आज हिमालय से बर्फ के पिघलने की गति 'लिटल आइस एज' के वक्त से औसतन 10 गुना ज्यादा है। लिटल आइस एज का काल 16वी से 19वी सदी के बीच का था। इस दौरान बड़े पहाड़ी ग्लेशियर का विस्तार हुआ था। वैज्ञानिकों की मानें, तो हिमालय के ग्लेशियर दूसरे ग्लेशियर के मुकाबले ज्यादा तेजी से पिघल रहे हैं।
बर्फ के पिघलने से वे कोरोना से भी ज्यादा भयंकर महामारी देश दुनिया में ला सकते हैं।
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पृथ्वी पर नुकसान भारी
विशेषज्ञों के एक अनुमान के अनुसार अंटार्कटिका के ग्लेशियर के पूरी तरह से पिघलने पर पृथ्वी की ग्रेविटेशनल पावर शिफ्ट हो जाएगी। इससे पूरी दुनिया में भारी उथल पुथल देखने को मिलेगी। पृथ्वी के सभी महाद्वीप आंशिक रूप से पानी के भीतर समा जाएंगे।
लंदन, मुंबई, मियामी, सिडनी जैसे शहर पूरी तरह से महासागरों के अंदर आ जाएंगे। इन ग्लेशियर के भीतर बड़ी मात्रा में खतरनाक वायरस पिछले हजारों सालों से दफन हैं। बर्फ के पिघलने से वे कोरोना से भी ज्यादा भयंकर महामारी देश दुनिया में ला सकते हैं।
भारी मात्रा में जैव-विविधता को हानि पहुंचेगी। पृथ्वी पर रहने वाली हजारों प्राजितायां भी खत्म हो जाएंगी। पृथ्वी पर एक विनाशकारी स्थिति का उद्भव होगा। इसके साथ ही दुनियां भर में करोड़ों की संख्या में लोगों को एक जगह से दूसरी जगह पर माइग्रेट करना पड़ेगा। अर्थव्यवस्था और रहने लायक जगह पूरी तरह से तहस नहस हो जाएगी।
करोड़ों लोग बेघर होंगे, उनके पास रहने और खाने के लिए कुछ भी नहीं बचेगा। ऐसी स्थिति में बड़े स्तर पर आपसी मारकाट की स्थिति भी पनप सकती है। कई हाइपोथेसिस का ये तक कहना है कि ग्लेशियर पिघलने का प्रभाव पृथ्वी की घूर्णन गति पर भी पड़ेगा।
इससे पृथ्वी के दिन का समय थोड़ा ज्यादा बढ़ जाएगा। पीने लायक 69 प्रतिशत पानी ग्लेशियर के भीतर जमा हुआ है। उसके पिघलने पर ये शुद्ध पानी भी साल्ट वाटर में मिलकर पूरी तरह बर्बाद हो जाएगा।
ऐसे में अगर देखा जाए तो अभी स्थिति बदली नहीं है। अभी भी हमारे पास बहुत वक्त है। हमें प्रकृति और विकास के साथ संतुलन बनाना होगा। अन्यथा एक दिन ऐसा भी आ सकता है, जब स्थिति काबू से बाहर हो जाएगी और हमें विनाशकारी दौर से गुजरना पडेगा।
इतिहास में पहली बार यूरोप में भीषण गर्मी , हीट वेव का होना और धरती के दोनों सिरों (अंटार्कटिक और आर्कटिक) पर एकसाथ तापमान में असंतुलन सामान्य घटना नहीं है । ये सब धरती के तापमान में असंतुलन और जलवायु परिवर्तन की वजह से हो रहा है, जिसका दायरा अब वैश्विक हो गया है।
भले ही कोई इस विनाशकारी स्तिथि को तात्कालिक घटना कहकर ख़ारिज कर दे लेकिन जमीनी सच्चाई यह है की बड़े पैमाने पर ग्लेशियर्स का पिघलना और यूरोप में हीट वेव बहुत बड़े वैश्विक खतरें की आहट है, जिसको अनदेखा नहीं किया जा सकता है। कथित विकास की बेहोशी से दुनियां को जागना पड़ेगा।
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