मप्र की राजनीति में यह अभूतपूर्व संयोग है कि अब राज्य का मुख्यमंत्री, एक उप मुख्यमंत्री, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष भी मालवा अंचल से ही है।
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दोनों पार्टियों में इस पीढ़ीगत बदलाव का युवाओं ने आम तौर पर स्वागत किया है। लेकिन इसी के साथ कुछ गंभीर सवाल भी फिजा में तैर रहे हैं। वो कांग्रेस में इस जवाबी सोशल इंजीनियरिंग और नई पीढ़ी पर दांव लगाने को लेकर हैं।
जहां तक भाजपा का सवाल है तो वह पहले भी दूसरे राज्यों में ऐसा करती रही है और अपने मजबूत संगठनात्मक ढांचे के दम पर इस प्रयोग को (कुछ अपवादों को छोड़ दें तो) सफलतापूर्वक अंजाम तक पहुंचाती रही है। वहां बगावत की गुंजाइश ज्यादा नहीं होती। कार्यकर्ता आलाकमान के फैसले को सिर आंखों पर रखकर चलता है। इसलिए ऐसे जोखिम ज्यादातर सफल दांव में बदल जाते हैं।
मप्र में नए सीएम डॉ. मोहन यादव आला कमान की अपेक्षाओं पर कितना खरा उतरेंगे, यह अभी देखने की बात है। पर उन्होंने पद संभालते ही टी 20 की तर्ज पर बैटिंग करने का संकेत दे दिया है। जानकारों का मानना है कि भाजपा ने मोहन यादव पर दांव मप्र की ओबीसी राजनीति कम आगामी लोकसभा चुनाव में यूपी और बिहार में यादव वोट बैंक में सेंध लगाने के उद्देश्य से किया है। मोहन यादव यह काम कितना कर पाएंगे, इसी से उनका राजनीतिक भविष्य तय होने की संभावना ज्यादा है।
अगर वो नाकाम रहे तो भाजपा के पास रिजर्व में दूसरे अनुभवी खिलाड़ी हैं ही। वैसे मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने पद संभालते ही दो अहम संदेश देने की कोशिश की है, एक तो वो कट्टर हिंदुत्व की राह चलेंगे, दूसरा विज्ञान का विद्यार्थी होने के नाते वो अंधविश्वासी नहीं हैं।
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उम्मीद की जा सकती है कि मोहन राज में अंध श्रद्धा की बजाए तार्किक और प्रगतिशील हिंदुत्व को ज्यादा महत्व मिलेगा। जहां तक मप्र में जातीय समीकरण साधने की बात है तो मोहन यादव का चेहरा इसलिए भी चौंकाने वाला था, क्योंकि राज्य में यादवों की संख्या अन्य दूसरी ओबीसी जातियां जैसे कि लोधी, कुर्मी, गूजर आदि की तुलना में कम है और यादव किसी एक पॉकेट में केन्द्रित होने के बजाए पूरे राज्य में फैले हैं। कुल मिलाकर भाजपा ने मोहन यादव के बहाने पड़ोसी राज्यों का जातीय समीकरण साधने का राजनीतिक योगासन किया है।
जहां तक पीढ़ी परिवर्तन की बात है तो मप्र कांग्रेस में भी वह आलाकमान के निर्देश पर ही हुआ है। माना जा रहा है कि अब पार्टी की कमान परोक्ष रूप से राहुल गांधी पूरी तरह अपने हाथ में ले रहे हैं और राज्य में नए चेहरे उन्हीं की पसंद हैं।
इसका सीधा मतलब यह है कि पार्टी के पुराने दिग्गजों को अब रिटायरमेंट का सिग्नल दे दिया गया है और संगठन में टीम राहुल अब अपने ढंग से आकार लेने लगी है। लेकिन कांग्रेस में अहम सवाल यह है कि अगर इन नए चेहरों को पुराने दिग्गजों का साथ न मिला या भीतरघात की सियासत जारी रही तो ये टीम कैसे परफॉर्म कर पाएगी?
पहले से ही गुटबाजी और अंतर्कलह से जूझ रही कांग्रेस में मनभेदों के खाने ज्यादा कुलबुलाने नहीं लगेंगे? वैसे भी कांग्रेस में इस बदलाव का खास असर लोकसभा चुनाव में दिखने की संभावना बहुत कम है। अलबत्ता इसका प्रभाव अगले विधानसभा चुनाव में जरूर दिख सकता है क्योंकि तब तक कांग्रेस में युवा चेहरों की नई टीम तैयार हो सकने की उम्मीद है।
बहरहाल अब मालवांचल मप्र की राजनीति का नया कुरुक्षेत्र है, जहां से सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनो की रणनीतियों का संचालन होना है। यहां हो रहे राजनीतिक प्रयोगों की गूंज राष्ट्रीय स्तर भी सुनाई देने की संभावना है। मालवा को ये महत्व अर्से बाद मिला है। फर्क यह है कि कभी कांग्रेस का गढ़ रहा मालवा बीते पांच दशकों से भगवा किले में तब्दील हो चुका है।
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