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दूसरा पहलू: दवाएं भी बढ़ा रहीं धरती का तापमान... 27 देशों के समूह यूरोपीय संघ ने डेसफ्लुरेन पर लगाई पाबंदी

Thu, 14 Aug 2025 06:18 AM IST
शुभम कुमार सुधीर कुमार, अमर उजाला।

सार

एक बोतल (240 एमएल) डेसफ्लुरेन के इस्तेमाल से ग्लोबल वार्मिंग पर उतना ही असर पड़ता है, जितना 440 किलोग्राम कोयला जलाने से होता है। स्कॉटलैंड से प्रेरित होकर 27 देशों के समूह यूरोपीय संघ ने एक जनवरी, 2026 से डेसफ्लुरेन के उपयोग पर पाबंदी लगाने का निर्णय लिया है, ताकि पर्यावरण व ऊर्जा संरक्षण में उल्लेखनीय योगदान दिया जा सके।
 
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दवाएं भी बढ़ा रहीं धरती का तापमान... कई देशों में डेसफ्लुरेन पर पाबंदी (सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
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स्कॉटलैंड मौजूदा समय में ‘डेसफ्लुरेन’ नामक एनेस्थेटिक के उपयोग और विक्रय पर प्रतिबंध लगाने वाला दुनिया का इकलौता देश है। मरीजों की सर्जरी के दौरान बेहोशी के लिए प्रयुक्त की जाने वाली यह दवा पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा बन चुकी है। स्कॉटलैंड के इस साहसिक कदम से प्रेरित होकर 27 देशों के समूह यूरोपीय संघ ने एक जनवरी, 2026 से इसके उपयोग पर पाबंदी लगाने का निर्णय लिया है।
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डेसफ्लुरेन का उपयोग ‘सर्जिकल एनेस्थेसिया’ के रूप में पिछली सदी के अंतिम दशक से किया जा रहा है। सर्जरी के दौरान सांस के माध्यम से दी जाने वाली यह गैस वायुमंडल में उत्सर्जित होने पर शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस के रूप में व्यवहार करती है। इससे होने वाले पर्यावरणीय नुकसान का आकलन इस बात से किया जा सकता है कि एक बोतल (240 मिलीलीटर) डेसफ्लुरेन के इस्तेमाल से ग्लोबल वार्मिंग पर उतना ही असर पड़ता है, जितना 440 किलोग्राम कोयला जलाने से होता है। जाहिर है, यह दवा पर्यावरण को जीवाश्म ईंधनों के दहन के मुकाबले कहीं अधिक नुकसान पहुंचाती है।

ब्रिटेन की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा के अनुसार, डेसफ्लुरेन की ग्लोबल वार्मिंग क्षमता (ऊष्मा को रोकने के गुण) कार्बन डाइऑक्साइड से 2,590 गुना अधिक है। दूसरी तरफ, वातावरण में पहुंचने के बाद यह गैस लगभग डेढ़ दशक तक वहां विद्यमान रहती है, जो सेवोफ्लुरेन (1.4 वर्ष) और आइसोफ्लुरेन (3.5 वर्ष) जैसी एनेस्थेटिक गैसों के मुकाबले कई गुना अधिक है। व्यापक ‘कार्बन फुटप्रिंट’ होने के कारण ही इसके उपयोग को प्रतिबंधित करने और वैकल्पिक उपायों को अपनाने की मांग उठने लगी है। स्कॉटलैंड में डेसफ्लुरेन पर लगाए गए प्रतिबंध के नतीजे आशाजनक रहे हैं।
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वहां की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा की ओर से कहा गया है कि इस प्रतिबंध से प्रतिवर्ष लगभग 6.17 किलोटन कार्बन उत्सर्जन में कमी आई है, जो प्रतिवर्ष 1,700 घरों को बिजली देने के बराबर है। इस तरह डेसफ्लुरेन से दूरी न सिर्फ ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी लाती है, बल्कि ऊर्जा संरक्षण के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान देती है।

डेसफ्लुरेन पर प्रतिबंध स्वास्थ्य क्षेत्र में पर्यावरणीय जवाबदेही और सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। कम कार्बन उत्सर्जक सर्जिकल एनेस्थेटिक उपायों को अपनाना वैश्विक खुशहाली के लिए जरूरी है। यह पहल चिकित्सा क्षेत्र को पर्यावरण अनुकूल बनाने में मील का पत्थर साबित हो सकती है।
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