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दूसरा पहलू: डायनासोर युग के जीवाश्म कभी पेड़ थे... कभी आज के यूपी का सोनभद्र समुद्र में था

Tue, 12 Aug 2025 06:53 AM IST
ज्योति भास्कर उपमिता वाजपेयी, अमर उजाला।

सार

सोनभद्र के सलखन में है दुनिया के सबसे पुराने जीवाश्म वाला फॉसिल्स पार्क। यह इलाका उस समय समंदर के मीलों नीचे था। तब सोनभद्र में समुद्र था और वहां लहरों के बीच से निकले पत्थर करोड़ों साल पहले समुद्र के मीलों नीचे पनपे शैवाल थे। यहां मौजूद सबसे बड़ा जीवाश्म 40 मीटर मोटा है, जो चूना पत्थर से बना है। इसमें सायनोबैक्टीरिया पाया जाता है। वह बैक्टीरिया, जो धरती का सबसे पुराना ऑक्सीजन उत्पादक जीव है।
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कभी समुद्र के नीचे था आज के उत्तर प्रदेश का सोनभद्र - फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
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काशी से 100 किलोमीटर दूर सोनभद्र के सलखन में है दुनिया के सबसे पुराने जीवाश्म वाला फॉसिल्स पार्क। यहां मौजूद फॉसिल्स की उम्र 14 करोड़ साल है। यानी कई पीढ़ियों पहले के पुरखों की उम्र जितने पुराने। यहां मौजूद जीवाश्म, जो पत्थर बन चुके हैं, कभी पेड़ हुआ करते थे। वे पेड़, जिन्हें डायनासोर की सोहबत हासिल हुई है। इनके समय में धरती पर डायनासोर का राज था।

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इन पर जो गोल-गोल चक्कर दिखाई देते हैं, ये उन्हीं पेड़ के तने हैं। पेड़ से पत्थर बन चुके इन जीवाश्म को पैट्रीफाइड वुड कहते हैं। यह इलाका उस समय समंदर के मीलों नीचे था। वैज्ञानिकों ने भी यह बात कुबूल की है। यह पार्क अमेरिका के एलोस्टोन नेशनल पार्क से भी तीन गुना बूढ़ा है। यहां पर मौजूद सबसे बड़ा जीवाश्म 40 मीटर मोटा है, जो चूना पत्थर से बना है।

 इसमें सायनोबैक्टीरिया पाया जाता है। वह बैक्टीरिया, जो धरती का सबसे पुराना ऑक्सीजन उत्पादक जीव है।  घोरावर गांव के लोग इन पत्थरों को पवित्र मानकर पूजते हैं। घोरावर में रहने वाले विजय अग्रहरी का बचपन इसी इलाके में गुजरा है। उनकी उम्र 65 के करीब है। वह कहते हैं-इहां हम लोग गोरू तरावत रहली जाए।
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धीरे-धीरे जौनबा तौन वैज्ञानिक लोग आते गए। शोध करते गए, तो पता चला, यहां तो बहुत बड़ा खजाना है। यह डायनासोर के युग का एक ओपन म्यूजियम है, जिसे बचाने, सहेजने के लिए बाड़बंदी की गई है। वैसे सलखन फॉसिल्स पार्क को वर्ल्ड हेरिटेज साइट में शामिल करने की जद्दोजहद जारी है। इसी साल जून में इसे यूनेस्को की टेंटेटिव लिस्ट में शामिल किया गया है।

इसे खोजने का श्रेय भूवैज्ञानिक जॉन बी. ऑडेन को है। 1933 में उन्होंने ही इसकी पहली खबर दी थी। 2002 में जिले के डीएम भगवान शंकर ने इसे फॉसिल्स पार्क के रूप में तैयार करवाया था। आमतौर पर फॉसिल जमीन के नीचे दब जाता है। यह तब मिलता है, जब लोग जमीन की खोदाई करते हैं। लेकिन इस पार्क की खासियत है कि यह जमीन के ऊपर है। ऊबड़-खाबड़ तो है, लेकिन इसके लिए खोदाई नहीं करनी पड़ी।

बीएचयू की वैज्ञानिक चंदना बसु कहती हैं, इसके ऊपर जो कुछ था, वह समय के साथ हट गया और एक खूबसूरत फॉसिल स्ट्रक्चर दिखाई देने लगा। इसीलिए यह शायद दुनिया का इकलौता ऐसा पार्क है। इस दौरान धरती में टेक्टॉनिक मूवमेंट हो रहा था और पूरी दुनिया के देश यहां-वहां खिसककर अपनी जगह पर आ रहे थे। तभी यहां समुद्र की लहरों के बीच फॉसिल्स बन गए। ये पेड़-पौधे-शैवाल के रूप में ऑक्सीजन ले और छोड़ रहे थे।

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