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नृत्य यात्रा: औरंगजेब के आतंक से विस्थापित हुए कलाकार, सिद्धेंद्र योगी की साधना ने दिया कुचीपुड़ी को नवजीवन

सार

अंतरराष्ट्रीय नृत्य दिवस पर बीते रविवार से हमने भारतीय नृत्यों पर आधारित यह श्रृंखला शुरू की है। हर रविवार हम इसके जरिए आपको भारतीय नृत्यों के कल, आज और कल के बारे में जानकारी देने की कोशिश करेंगे। बीते हफ्ते आपने पढ़ा कथक के बारे में, आज जानिए दक्षिण भारत की मशहूर नृत्य शैली कुचीपुड़ी का आकर्षण, आलंबन और अलंकार..!
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kuchipudi - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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कुचीपुड़ी भारतीय नृत्य की एक पारंपरिक शैली है। बीती शताब्दी के तीसरे व चौथे दशक के आसपास यह नृत्य-शैली इस नाम के नृत्य-नाटक की लंबी तथा समृद्ध परंपरा से उद्भूत हुई। जैसा कि नाम से निहित है, 'कुची' अर्थात नृत्य और 'पुड़ी' अर्थात क्षेत्र। कुछ विद्वानों का कहना है कि इसके कलाकार पहले सरस्वती नदी के किनारे समूह में रहा करते थे, फिर जब भारत में आक्रांताओं के हमले शुरू हुए, तो वे वहां से आंध्र प्रदेश की तरफ आ गए। यहीं से शुरू होती है इस नृत्य की स्वत: यात्रा।

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कुचीपुड़ी की गंगोत्री
आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले में कुचीपुड़ी नाम का एक गांव है। विजयवाड़ा से 35 किमी. की दूरी पर स्थित इस गांव से निकली इस नृत्य-नाटक शैली की एक लंबी परंपरा चली आ रही है, जिसे यक्षगान के जातिगत नाम से जाना जाता था। पर जिस तरह से भारत की भूमि ने बहते हुए रक्त और पल्लवित पुष्प देखे हैं, उसी तरह से भारतीय कलाओं ने भी मुश्किलें देखी है, पर साथ ही साथ उस साधना के तप को निखरता भी देखा है।

kuchipudi - फोटो : Amar Ujala
ईश्वर भक्ति का साधन
कुचीपुड़ी नृत्य ईश्वर भक्ति का साधन रहा समय के साथ कई बदलाव आए और साथ ही साथ कलाकारों ने इसकी आत्मा की शुद्धता ध्यान रखते हुए ही बदलाव किए, जो बहुत ही सुंदर और इस कला को उन बदलावों के माध्यम से अद्भुत रूप दिया। जब कुचिपुड़ी नृत्य आंध्र में आया तब वह भक्ति मूवमेंट का हिस्सा रहा। भारत में जब मुगलों का शासन रहा तब औरंगजेब ने 16वीं शताब्दी में भारतीय कला और संगीत को बंद कराया। उसी समय यह 500 परिवार आंध्र की तरफ आए पर रोजगार का कोई अवसर नहीं था और वहां के शासकों ने कलाकारों का प्रदर्शन देखकर वहां उन्हें कुचिपुड़ी ग्राम दिया जिससे इस नृत्य कला का नाम कुचिपुड़ी हुआ। यह नृत्य कला शाम को मंदिर के बाहर के प्रांगण में दीयों की रोशनी में प्रदर्शित की जाती रही है।

सिद्धेंद्र योगी ने जलाई मशाल
18वीं शताब्दी के मध्य में मद्रास का अधिकरण ईस्ट इंडिया कंपनी के पास पहुंचा। प्रदर्शन करने वाली कलाओं पर रोक लगाई गई, शायद उनको यह डर था कि यहां मौजूद लोग एक संगठन बनाकर उनके खिलाफ न हो जाए। फिर कलाकारों ने क्रांति की और उनको यह प्रतिबंध हटाना पड़ा। 1886 से 1956 कुचीपुड़ी के लिए ऐतिहासिक समय रहा और इसकी आध्यात्मिकता की जड़ें और पक्की हुई। उनको पल्लवित किया प्रतिभाशाली वैष्णव कवि तथा द्रष्टा सिद्धेंद्र योगी ने यक्षगान के रुप में कुचीपुड़ी शैली की कल्पना करके। अपनी कल्पनाओं को मूर्त एवं साकार रूप प्रदान करने की अद्भुत क्षमता थी उनमें। संस्कृत में कृष्णलीला तरंगिणी नामक काव्य के रचयिता, अपने गुरु तीर्थनारायण योगी द्वारा मार्गदर्शन प्राप्त कर सिद्धेन्द्र योगी यक्षगान की साहित्यिक परंपरा में तल्लीन हो गए।

kuchipudi - फोटो : Amar Ujala
भामाकलापम् ने किया काया कल्प
ऐसा कहा जाता है कि सिद्धेंद्र योगी ने एक स्वप्न देखा कि भगवान कृष्ण उनसे अपनी सर्वाधिक प्रिय रानी सत्यभामा हेतु पारिजात लाने की पुराणकथा पर आधारित एक नृत्य नाटक की रचना करने का अनुरोध कर रहे हैं। इस अनुरोध का अनुपालन करते हुए सिद्धेंद्र योगी ने उत्साहित होकर भामाकलापम् की रचना की, जिसे आज भी कुचीपुड़ी रंगपटल का पीस-डी-रेसिसटेन्स माना जाता है। सिद्धेंद्र योगी ने कुचीपुड़ी गांव के ब्राह्मण युवकों को अपनी रचनाओं, विशेषकर भामाकलापम् को प्रस्तुत करने हेतु प्रोत्साहित किया। भामाकलापम् की प्रस्तुति एक आश्चर्यजनक सफलता रही। इसका सौंदर्यपरक आकर्षण व्यापक था। उस समय सभी कलाकार पुरुष ही थे और उनके द्वारा प्रस्तुत स्त्री पात्र प्रतिरूपेण श्रेष्ठ होता थे।। स्त्रीपात्र प्रतिरूपण या अवतार धारण के उच्च स्तर को सत्यभामा की भूमिका निभाने वाले वेदांतम् सत्यनारायण शर्मा के उदाहरण में देखा जा सकता है ।

एकल प्रस्तुति का प्रसार
सिद्धेंद्र योगी के अनुयायियों अथवा शिष्यों ने कई नाटकों की रचना की और आज भी कुचीपुड़ी नृत्य-नाटक की परंपरा विद्यमान है । इस शैली में एकल नृत्य प्रस्तुति व स्त्री नर्तकियों के प्रशिक्षण सहित अनेक नए तत्वों का समावेश (1886-1956) लक्ष्मी नारायण शास्त्री ने किया। पहले भी एकल नृत्य-प्रस्तुति विद्यमान थी, पर वह केवल समुचित क्रमों में नृत्य-नाटकों के एक भाग के रूप में थी। कभी-कभी तो नाटक की प्रस्तुति में आवश्यकता न होने पर भी, अनुरोध अथवा आग्रह में वृद्धि करने तथा प्रस्तुति को बीच में रोकने हेतु एकल नृत्य प्रस्तुति किए गए। तीर्थनारायण योगी की कृष्ण-लीला-तरंगिणी से प्रेरित तरंगम् ऐसी ही प्रस्तुति है।

indian dances - फोटो : Amar Ujala
संतुलन व पादकौशल
शरीर संतुलन व पादकौशल तथा उसके नियंत्रण में नर्तक कलाकारों की दक्षता प्रदर्शित करने हेतु पीतल की थाली की किनारी पर नृत्य करना तथा सिर पर पानी से भरा घड़ा लेकर नृत्य करने जैसी कुशलताओं को भी कुचीपुड़ी में समय के साथ जोड़ा गया। बीती शताब्दी के मध्य तक कुचीपुड़ी नृत्य शैली एक सर्वथा स्वतंत्र शास्त्रीय एकल नृत्य शैली के रूप में पूर्णत: स्थापित हो गई। इस प्रकार अब कुचीपुड़ी नृत्य की दो शैलियां हैं: नृत्य-नाटक तथा एकल नृत्य-प्रस्तुति। शताब्दी के चौथे दशक के उत्तरार्द्ध से एकल प्रस्तुति के क्रम का तेजी से विस्तार हुआ। 
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कुचीपुड़ी कलाकारों की यात्रा
सतेंद्र योगी, वेमपत्ति चेन्नई सत्यम जैसे कलाकारों का कुचीपुड़ी को मार्गदर्शन मिला। वर्तमान समय में जो विद्वान कलाकार इसको दिशा दे रहे हैं उनमें राधा रेड्डी एवं उनका परिवार, प्रोफेसर पी रमा देवी, मलिका साराभाई इत्यादि इसको पल्लवित कर रहे है। प्रोफेसर पी रमा देवी हैदरबाद की सिलिकॉन यूनिवर्सिटी में कुचिपुड़ी की गुरु है। उन्होंने 7 पुस्तको की रचना की है जो कि नाट्यशास्त्र और कुचीपुड़ी पर लिखी गई है। उनका कहना है कुचीपुड़ी नृत्य को युवाओं में सीखने की ललक है। उनका कहना है उनके 40 वर्षों से अधिक समय का अनुभव के आधार पर कहती है कि कुचीपुड़ी नृत्य में परांगत होने के लिए लक्ष्य को केंद्रित करना आवश्यक है। दक्षिण भारतीय फिल्मों में कुचीपुड़ी नृत्य का एक महत्वपूर्ण स्थान है जो कि इसको लोकप्रिय बनाता है।
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