सुलेमानी की बेटियों ने खमेनी से पूछा कि कौन बदला लेगा, इस पर उनका जबाव था- हम सब यानी पूरा ईरान।
- फोटो : Social media
अब ईरान, यमन, लेबनान और अफ़ग़ानिस्तान में सुलेमानी की मौत पर हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं। ईरान के सुप्रीम लीडर आयातुल्ला खमेनी ने बदले की कार्रवाई के साफ संकेत दिए हैं। सुलेमानी की बेटियों ने खमेनी से पूछा कि कौन बदला लेगा, इस पर उनका जबाव था- हम सब यानी पूरा ईरान।
पूरी दुनिया ने सुलेमानी के जनाजे में खमेनी और हसन रोहानी के आंसू देखे हैं। इराक में अमेरिकी दूतावास पर हमले की जिम्मेदारी हालांकि ईरान ने नहीं ली है, लेकिन अमेरिकी ने इसे ईरानी हमले की ही तरह लिया है।
अमेरिका के खिलाफ अन्य देशों में भी छिटपुट हमले हुए हैं। इराकी संसद ने अमेरिकी सेना को अपने यहां से चले जाने को कहा है। उधर, अमेरिकी में भी ट्रम्प विरोधी ट्रम्प की कार्रवाई के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं।
जाहिर है ट्रम्प यानी अमेरिकी फौजें पीछे हटनी वाली नहीं हैं और न ही ईरानी सुलेमानी की मौत को आसानी से भुला सकेगा न ही वह अमेरिकी को माफ ही करने वाला है। साफ है कि यह लड़ाई लंबी चलती है तो 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' खाड़ी से भारत पहुंचने वाली कच्चे तेल और गैस की कुल खपत की 84 फीसदी आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।
यह 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' मात्र 21 मील चौड़ा समुद्री मार्ग है, जहां स्ट्रेट ऑफ मलचा शिपिंग लेन हैं, जिनपर ईरान की पहरेदारी है। भले ही भारत अब ईरान से कच्चा तेल नहीं लेता, लेकिन आपूर्ति करने वाले देश इसी मार्ग का उपयोग करते हैं। इस मार्ग से 22.5 मिलियन बैरल कच्चा तेल प्रतिदिन तेल जाता है, जो वैश्विक उत्पादन का 24 प्रतिशत है। हालांकि सऊदी अरब और युनाइटेड अरब अमीरात ने पाइप लाइन की अतिरिक्त व्यवस्था की है।
कच्चे तेल पर निर्भर ईरान बेरोजगारी से त्रस्त है और आणविक प्रतिबंधों से उसकी आर्थिक व्यवस्था पहले से बेहाल है। ऐसे में वह इस लड़ाई को कितना आगे खींच पाएगा, कहना मुश्किल है। फिलहाल ईरान सुलेमानी की मौत के शोक और अमेरिका के खिलाफ गुस्से के उबाल में मुब्तिला है।
रूस का रुख तय नहीं लेकिन?
इधर, नाटो देशों के बीच भी इस मसले पर वार्ताओं का सिलसिला शुरू हो गया है। रूस का रुख अभी साफ नहीं है लेकिन वह मध्य पूर्व में तनातनियों के बीच में अपने दबदबे और दोस्तियों को लेकर अमेरिका से भिड़ता रहा है।
मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य शक्ति पर नज़र दौड़ाएं तो लगेगा कि ईरान के लिए लंबी लड़ाई लड़ पाना संभव नहीं। बहरीन में फिफ्थ फ़्लीट समुद्री बेड़ा है तो कतर अल उदेद वायुसेना का अड्डा है, जहां उसके 13 हज़ार जवान हैं। अमेरिका ने हाल में वहां बी-52 बम्बर लड़ाकू विमान तैनात किए हैं। इसी तरह युनाइटेड अरब अमीरात में दुबई स्थित जेबेल अली पोर्ट में अमेरिका के पांच हज़ार नौसैनिक हैं तो अबूधाबी के अलदाफ़रा वायुसेना अड्डे पर एफ-35 और सशस्त्र ड्रोन हैं। ओमान की खाड़ी-फूज़ैरह में भी एक अमेरिकी टुकड़ी मौजूद है।
अमेरिकी मीडिया में कहा जा रहा है कि ईरान साइबर हमले में खासा सक्षम है। इसे अमेरिकी मिलिट्री रिपोर्ट-2019 ने स्वीकार किया है।
- फोटो : Social media
हाल में रियाद में प्रिंस सुल्तान एयरबेस पर अमेरिकी सेनाएं तैनात हैं। यही नहीं, अफ़ग़ानिस्तान में चौदह हज़ार सैन्य बल के अलावा बहरीन में अमेरिकी नौसेना की फ़िफ़्थ फ़्लिट है, जहां उसके सात हजार जवान हैं। इसके अलावा शेख इशा वायुसेना अड्डे पर हमेशा लड़ाकू विमान तैयार रहते हैं, इनके अलावा वहां आठ हजार नाटो सेनाएं हैं। कुवैत में अमेरिकी वायुसेना के तेरह हजार सैन्यबल के साथ 2200 अमेरिकी हैं। पेंटागन ने एहतियात के तौर पर खाड़ी में साढ़े तीन हजार सैन्यकर्मी कुवैत भेजे हैं।
इधर, विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने दुनिया भर में अपने मित्र देशों को वस्तु स्थिति से अवगत कराने के लिए विचार-विमर्श शुरू कर दिया है। अमेरिकी कांग्रेस में डेमोक्रेट बहुल प्रतिनिधि सभा में स्पीकर नैंसी पेलोसी ने शुक्रवार सुबह ट्रम्प की कार्रवाई पर हैरानी जताते हुए कहा कि राष्ट्रपति को इस कार्रवाई से पूर्व 'लॉ मेकर्स' को भरोसे में लेना चाहिए था।
अमेरिका के लिए बगदादी, लादेन से ज्यादा खतरनाक था सुलेमानी
अमेरिका के लिहाज से देखा जाए तो उसके लिए ईरानी जनरल सुलेमानी इस्लामिक स्टेट ख़लीफ़ा अकबर अल बगदादी और ओसामा बिन लादेन से भी ज़्यादा ख़तरनाक था। सुलेमानी ईरान का पिछले दो दशक से ईरानी मिलिट्री ऑपरेशन हो अथवा ख़ुफ़िया तंत्र, उसकी तूती बोलती थी।
सुलेमानी को लेकर पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और बराक ओबामा प्रशासन चाहकर भी कुछ नहीं कर सके थे। उन्हें लगता था कि सुलेमानी को छेड़ना मध्यपूर्व में युद्ध को न्यौता देना होगा।
हालांकि बुश और ओबामा कार्यकाल में सुलेमानी को इराक युद्ध के समय सैकड़ों अमेरिकी सैन्यकर्मियों की मौत के लिए दोषी ठहराया जा रहा था। सुलेमानी अमेरिका को खुली चुनौती के बयान दे रहे थे।
यकीनन सुलेमानी के खात्मे को लेकर अमेरिकी की आतंरिक राजनीति भी गर्माई हुई है और इसका असर आने वाले चुनाव में तो पड़ेगा ही वर्तमान की सियासत भी इससे प्रभावित होगी। पूर्व उपराष्ट्रपति और 2020 में राष्ट्रपति पद के संभावित उम्मीदवार जोई बिडेन ने टिप्पणी की है कि ट्रम्प ने बारूद के जखीरे में जलती हुई तीली दिखाई है।
सुलेमानी की हत्या का पूरी दुनिया में खासकर मुस्लिम वर्ल्ड में जमकर विरोध हो रहा है।
- फोटो : Social media
क्या होगा युद्ध का असर?
अमेरिका के करीबी इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बयान के मुताबिक हत्या से पांच दिन पूर्व सुलेमानी बगदाद में अपने विश्वस्त लोगों को फोन पर बगदाद स्थित अमेरिकी दूतावास में राजनयिकों को खत्म किए जाने का संदेश दे रहा था।
ट्रम्प ने अपने संबोधन में इसका इशारा भर किया था कि अमेरिकी इंटेलिजेंस और फौज दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है। इसके बाद क्या हुआ, सहज अनुमान लगाया जा सकता है। बगदाद स्थित अमेरिकी दूतावास को घेरे जाने, वहां सुरक्षा पोस्ट को आग के हवाले किए जाने के बावजूद अमेरिकी खुफिया एजेंसी सुलेमानी का पीछा कर रही थीं।
कासिम सुलेमानी का काफिला गुरुवार को बगदाद एयरपोर्ट की ओर बढ़ रहा था। उस काफिले में दो कारों में सवार सुलेमानी के अलावा अबू महदी मुहांडिस भी थे, जो पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्स के डिप्टी कमांडर थे। सुलेमानी की लाश की शिनाख्त हाथों में पहनी अंगूठी से की गई। सुलेमानी के काफिले से हमले और सुलेमानी की शिनाख्त वाली अंगूठी के वीडियो दुनिया भर में अमेरिकी बहादुरी की तरह प्रचारित करने की मुहिम भी चल रही है। दूसरी तरफ पूरी दुनिया में खासकर मुस्लिम वर्ल्ड में इसका जमकर विरोध हो रहा है।
गहराएगा विवाद, दुनिया चौकन्नी
अमेरिकी मीडिया में कहा जा रहा है कि ईरान साइबर हमले में खासा सक्षम है। इसे अमेरिकी मिलिट्री रिपोर्ट-2019 ने स्वीकार किया है। ईरान के पास एयरोस्पेस कंपनियां, रक्षा कंट्रक्टर, ऊर्जा और दूरसंचार की ऐसी-ऐसी फर्में हैं, जिन्हें विश्व में साइबर जासूसी कार्यों के लिए याद किया जाता रहा है। माइक्रोसॉफ्ट ने ईरान के पास एक हैकर ग्रुप होने का रहस्योद्घाटन किया था।
ईरान के पास मध्य पूर्व में सर्वाधिक मिसाइल फोर्स है। इनमें छोटी और मध्य रेंज की मिसाइलें हैं। उसके पास सऊदी अरब और इजराइल तक मार करने वाली मिसाइलें, क्रूज और लड़ाकू विमान हैं। सशस्त्र ड्रोन और टोही विमानों को मार गिराने की क्षमता है।
पिछले साल सऊदी अरब के दो तेल ठिकानों पर ईरान ने हमले किए थे, जबकि एक अमेरिकी टोही ड्रोन को मार गिराने में सफलता पाई थी। उसके पांच लाख तेइस हज़ार सैनिक हैं, जिसमें डेढ़ लाख इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर के सदस्य हैं।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बड़े तेल टैंकरों के आवागमन में चौकसी के इरादे से ईरान के पास नौसनिक बोट के लिए बीस हज़ार चालक दल के सदस्य हैं। हालांकि ईरान के पास सऊदी अरब की तुलना में साढ़े तीन प्रतिशत मिलिट्री साजो- सामान भी नहीं है। लेकिन अमेरिका के सामने नहीं झुकने और उसे वापस लौटने पर मजबूर करने वाले वियतनाम का भी उदाहरण दुनिया के सामने है।
ईरान के पास तेल की ताकत तो है ही आण्विक हथियार भी हैं। ऐसे में देखना यह है कि अमेरिका का अगला कदम क्या होगा और क्या ईरान के मसले पर बाकी मुस्लिम मुल्कों की परस्पर रंजिशें और दोस्तियां क्या करवट लेती हैं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।