एम यानी ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर में दो अन्य एम यानी महिला और मुसलमान का काफी महत्व रहा है। अब इन दोनों को मजबूत करने के अलावा ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में बिखर कर भाजपा के पाले में गए वोटरों को अपनी ओर खींचने और प्रतिष्ठान विरोधी लहर की काट के लिए ममता ने जिस 'आमार पाड़ा, आमार समाधान' यानी 'हमारा मोहल्ला हमारा समाधान' नामक जिस महत्वाकांक्षी योजना का एलान किया था उस पर तेजी से काम शुरू हो गया है।
इसके तहत सरकार हर बूथ तक पहुंचेगी और मौके पर ही समस्या का समाधान किया जाएगा। हम मोहल्ले में तीन बूथ हैं और हर बूथ के लिए दस लाख रुपए आवंटित किए गए हैं।
ममता ने बीती 21 जुलाई को शहीद रैली के मंच से ही विधानसभा चुनाव का अनौपचारिक एलान कर दिया था। अब खासकर ग्रामीण इलाकों में लोगों की नाराजगी और समस्याओं को दूर करने के लिए दो अगस्त से सरकार की महत्वाकांक्षी योजना हमारा मोहल्ला, हमारा समाधान शुरू होगा। सरकार के साथ ही तृणमूल कांग्रेस के लोग भी इस दौरान हर बूथ तक पहुंचेंगे।
ममता की रैली में महिलाओं औऱ अल्पसंख्यकों की मौजदूगी उल्लेखनीय थी। यही उनका सबसे बड़ा वोट बैंक बन रहा है। इसी वजह से ममता ने साफ कर दिया है कि अगला विधानसभा चुनाव जीतने के लिए अब वो सरकार के साथ ही संगठन को भी मैदान में उतार रही हैं।
ममता की अपील पर शुरू होने वाले भाषा आंदोलन को भी उनकी चुनावी रणनीति से जोड़ कर देखा जा रहा है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों का विश्लेषण करने पर यह बात साफ हो जाती है कि कुछ शहरी इलाकों में भाजपा का प्रदर्शन भले बेहतर रहा हो, ग्रामीण इलाके के वोटरों ने खुल कर तृणमूल का समर्थन किया था। उससे यह भी साफ हो गया कि महिला औऱ मुस्लिम वोटर भी ममता के साथ हैं।
तृणमूल कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि अगले साल के विधानसभा चुनाव में भी इस समीकरण में खास बदलाव नहीं आएगा। उनकी दलील है कि राज्य की 294 विधानसभा सीटों में से 174 ग्रामीण इलाकों में हैं।
कुछ सीटें मिली-जुली है यानी वहां कुछ इलाके ग्रामीण हैं और कुछ कस्बाई। कुल सीटों में से कम से कम सौ ऐसी हैं जहां अल्पसंख्यकों के वोट ही निर्णायक हैं। इससे साफ है कि भाजपा चाहे जितनी कोशिश कर ले, ध्रुवीकरण में कामयाब नहीं होगी।
अब सरकार चुनाव से पहले राज्य के तमाम 80 हजार बूथों में पीने के पानी, कम दूरी के रास्तों, छोटे पुलों और स्कूलों की मरम्मत जैसी छोटी-बड़ी समस्याओं को दूर कर लेना चाहती है। सरकारी सूत्रों का कहना है कि प्रति बूथ दस लाख के हिसाब से इस योजना पर करीब आठ हजार करोड़ रुपए खर्च होंगे।
पार्टी के एक नेता बताते हैं कि इस योजना की शुरुआत का फैसला पार्टी के स्तर पर किया गया। इसके पीछे आईपैक की भी भूमिका है। इसे लागू राज्य सरकार की ओर से किया जाएगा।
एक सरकारी अधिकारी बताते हैं कि दूर-दराज ग्रामीण इलाकों से लोग रोजमर्रा की छोटी-मोटी समस्याओं के लिए प्रशासन के पास दौड़ते रहते हैं। लेकिन नई योजना के तहत घर बैठे उनकी समस्याओं का समाधान हो जाएगा।
इस दौरान पार्टी ऐसे बूथों पर खास ध्यान देगी जहां वो भाजपा के मुकाबले पिछड़ी है। यहां इस बात का जिक्र प्रासंगिक है कि वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले भी सरकार ने 'दीदी को बोलो' नामक ऐसी ही योजना शुरू की थी जिसके तहत कोई भी किसी समस्या के लिए सीधे एक हेल्पलाइन पर फोन कर सकता था।
उसके अलावा पार्टी के नेताओं और मंत्रियों ने कई गांवों में रात गुजार कर स्थानीय समस्याओं को समझ कर उसे दूर करने की पहल की थी। उस साल ममता की जीत में इसने भी अहम भूमिका निभाई थी।
सरकार की ओर से जारी अधिसूचना में कहा गया है कि 'हमारा मोहल्ला, हमारा समाधान' योजना दो अगस्त से तीन नवंबर तक जारी रहेगी। इसके तहत हर तीन बूथों को मिला कर एक शिविर लगाया जाएगा और समस्याएं सुनी जाएंगी।
उसके बाद 15 नवंबर तक प्राथमिकता के आधार पर कार्यों की सूची तैयार की जाएगी और अगले साल 15 जनवरी से उनका काम शुरू हो जाएगा। चुनाव से पहले इन कार्यों को पूरा करने के लिए एक विशेष निगरानी समिति का भी गठन किया जाएगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगले साल के विधानसभा चुनाव से पहले सरकार इस योजना का इस्तेमाल प्रशासनिक कार्यकुशलता औऱ जनसंपर्क बढ़ाने के लिए करना चाहती है। इसका सबसे बड़ा मकसद अपने पारंपरिक वोट बैंक को साधना और छिटके और हाशिए पर रहने पर वोटरों को अपने पाले में खींचना है।
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