सबसे पहले भारत को इब्राहिम मोहम्मद सोलिह की ताजपोशी सुनिश्चित करनी होगी। जो तानाशाह अपने को सुरक्षित रखने के लिए पूर्व राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, चीफ जस्टिस, देश के पुलिस प्रमुख, विपक्षी दलों के प्रमुख, सांसद आदि सबको जेल में डाल सकता है वो आसानी से सत्ता छोड़ देगा, यह कहा नहीं जा सकता। इसके बाद पूर्व राष्ट्रपति नशीद की सुरक्षित मालदीव वापसी सुनिश्चित करनी होगी। जेलों में बंद विपक्षी राजनेता, अधिकारी, न्यायाधीश, फौजी अफसरों और तमाम यामीन विरोधियों की रिहाई जरूरी है। यह कदम वहां की अवाम के दिलों में भारत की प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित करने का काम करेगा।
भारत को अपने नौसेना और वायुसेना बेस की भूमिका व्यापक बनानी होगी और भारतीय मूल के मालदीव निवासियों के समर्थन में खुलकर सामने आना होगा। इसके लिए शांति-सुरक्षा संधि को एक व्यापक और नया रूप देना होगा। मालदीव के संकट में भारत ने हमेशा ही साथ दिया है। चाहे पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल गयूम का तख्ता पलट करने की साजिश विफल करना हो या फिर उसके समुद्री तटों की हिफाजत करना हो, जल संकट के समय पीने का पानी पूरे देश को मुहैया कराना हो या फिर चुनाव आयोग को निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव के लिए सक्षम बनाना हो- प्रत्येक अवसर पर भारतीय सुरक्षा कवच मालदीव के काम आया है। भारत की यह भूमिका स्थाई बनाने की आवश्यकता है।
दूसरी ओर ध्यान देने की बात है कि यामीन की पराजय को चीन यूं ही स्वीकार नहीं कर लेगा। मालदीव को चीन ने कर्ज के जाल में बुरी तरह उलझा दिया है। देश के कुल कर्ज का आधा तो चीन का ही है। इसके अलावा वहां के कानून को बदलवाने के बाद चीन के साथ मुक्त व्यापार संधि हुई। इस वजह से मालदीव की आर्थिक नब्ज चीन के हाथ में है। वहां का एक द्वीप पचास साल के लिए चीन ने पहले ही लीज पर हड़प लिया है। इस प्रभुत्व को कम करना भारत के लिए आसान नहीं है। अब भारत की जिम्मेदारी मालदीव को चीन के कर्ज से जल्द से जल्द मुक्ति दिलाने की भी हो गई है। मालदीव की चीन पर निर्भरता जैसे ही समाप्त होगी, हिंदुस्तान के लिए स्थितियां अनुकूल हो जाएंगी।
भारत को निरंतर ध्यान देना होगा कि चीन भारत के पास पड़ोस में विस्तारवादी रूप न दिखा सके। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय जनमत को भी चीन का असली चेहरा दिखाने का समय भी अब आ गया है। मगर इसके लिए कूटनीतिक उपायों की आवश्यकता है। अगर थलसेनाध्यक्ष या सुब्रमण्यन स्वामी जैसे नेताओं के बड़बोले बयान आते रहे तो भारत के रास्ते कठिन होते जाएंगे।
मालदीव के चुनाव दरअसल हिंदुस्तान के लिए एक सबक भी हैं। आत्ममंथन करने की जरूरत है कि श्रीलंका, नेपाल, म्यांमार और मालदीव जैसे देश भारत से प्राणवायु पाते हैं, मुसीबत में मदद पाते हैं, चरित्र और संस्कृति के मान से समान हैं फिर भी वे चीन के चक्कर में क्यों आते हैं। जाहिर है हमारे अंदर कोई दोष है। जब तक यह ठीक नहीं होगा, तब तक हमारे लिए अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर परेशानियां कम नहीं होंगी।