'महात्मा गांधी ने आम आदमी को अभय कर दिया।'
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घबराए लोगों में गांधी ने फूंकी ऊर्जा
सन् 1915 में पूरे भारत का दौरा करते हुए गांधी जी को यह मालूम भी हो गया कि भारत में दो-पांच प्रतिशत लोग ही हैं, जो बिगड़े हैं और जिनके चलते देश गिरा हुआ है।
एक बार गांधी जी पूछा गया कि यहां तो लोग बहुत घबराए हुए थे। आपने ऐसा क्या कर दिया कि लोग उठ खड़े हुए? महात्मा गांधी ने कहा कि मैंने केवल इतना ही कहा कि उनके मन में जो था और जिसे वे खुद नहीं कह पाते थे, उसको उनकी तरफ से कह दिया। इससे अधिक कुछ नहीं किया। भारत की आजादी के आंदोलन में महात्मा गांधी के इस महत्वपूर्ण योगदान को रेखांकित करते हुए आचार्य नरेन्द्र देव ने ठीक ही कहा कि-महात्मा गांधी ने आम आदमी को अभय कर दिया।
देश की आजादी के बाद भी कांग्रेस के मंच से पश्चिमी तंत्र से मुक्ति की आवाज उठती रही है। गांधीवादी इतिहासकार धर्मपाल ने हाल में प्रकाशित अपने आलेख संकलन 'इतिहास समाज और परम्परा' में एक जगह जिक्र किया है कि श्रीमती इंदिरा गांधी ने स्वयं कहा था कि उनके पिता जवाहरलाल नेहरू ने बड़ी गलती किया कि अंग्रेजों के बनाए तंत्र को जैसा-का-तैसा रहने दिया।
यही नहीं भारत के प्रधानमंत्री रहे नरसिम्हा राव ने लंदन में यह सवाल उठाया कि हम लोग सोचेंगे और बराबर आग्रह रखेंगे, तो दस-बीस वर्षों में अंग्रेजों के बनाए तंत्र को पूर्ण रूप से बदलने का काम तो कर ही सकते हैं।
महात्मा गांधी की दिली ख्वाहिश भी यहीं थी कि भारत को अपनी आवश्यकताओं के अनुसार नए तंत्र विकसित करने चाहिए। उसे युगानुकूल परिस्थितियों के मुताबिक ढालने की कोशिश करनी चाहिए, ताकि भारत पश्चिम की तमाम अनर्गल प्रलापों का समुचित जवाब दे सके। भारत के अमृत महोत्सव पर कम से कम गांधी के चरणों में तो यही सर्वोत्तम श्रद्धांजलि होगी।
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