आज की 21वीं सदी गांधी को और भी आशा से देखती हुई नजर आ रही है। गांधी ने सर्वधर्म समभाव अर्थात सभी धर्म समान हैं तथा सर्वधर्म सद्भाव अर्थात सभी धर्मों के प्रति सद्भावना बनाए रखने के लिए ’वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना को पुरजोर तरीके से संसार के समक्ष रखा। गांधी के विचारों का प्रभाव था कि दुनिया भर के समाज चिन्तकों को जैसे- मार्टिन लूथर किंग, नेल्सन मंडेला, दलाई लामा आदि को प्रेरित होने का मौका भारत में मिला जिन्होंने दुनिया भर के सामाजिक एवं राजनैतिक आंदोलनों को प्रभावित किया।
गांधी का भारत एक ऐसे राष्ट्र की कल्पना है जो समानता से संपन्नता की ओर अग्रसर हो। समाज तरक्की की डींगे ना हाँके बल्कि वास्तव में तरक्की का पैमाना हर छोटे-बड़े व्यक्ति के हाथ में थमाएं। भारत आत्मनिर्भरता के शिखर पर सबको साथ लेकर आगे बढ़े। आधुनिकता और परम्परा में बेहतर ताल-मेल बैठाये। मशीन और मानव में झड़प न हो बल्कि मानव मशीन का नियंत्रक बने। गांधी का रामराज्य, राम का राज्य है अर्थात सुख, सम्पन्नता और शांति के वास वाला ईश्वर का राज्य और गाँधी के राम मानवता को सर्व प्रमुख रखने वाले। गाँधी के सपनों का भारत एक ऐसा राष्ट्र, जहाँ व्यक्ति हिंसा, द्वेष से परे अहिंसा, प्रेम, त्याग की संस्कृति को विकसित करें। जिसमें सबके लिए बराबर का स्थान हो ताकि सबका विकास, सबके साथ हो सके।
गांधी का रामराज्य सबको समान अधिकार प्राप्त करने का अधिकार देता है। गांधी मानते थे कि राम और रहीम एक ही है। ईश्वर में भेद रखने के वे घोर विरोधी थे। वो कहते थे कि वो केवल एक ही ईश्वर को जानते हैं और वह है सत्य तथा सदाचार का ईश्वर। मानवता की सेवा संसार की सभी सेवाओं में सर्वोत्तम है। मानव कल्याण से भरा पूरा है गांधी का रामराज्य। निःसंदेह रामराज्य की कल्पना मानव सहित संसार के समस्त जीव के कल्याण के लिए ही रची गयी होगी। जिसमें विकास की धारा विश्वास के साथ बहने का संकल्प धारण किए निरन्तर बहती रहती है।
त्याग, सद्भावना, प्रेम, सहयोग, सर्मपण से लबरेज है गांधी का रामराज्य। जहां राजा और रंक में भेद नहीं है। व्यक्ति स्वयं के अधिकारों की वकालत और दूसरे के अधिकारों की हिफाजत स्वयं ही करता है। गांधी जीवनभर एक ऐसी समाज व्यवस्था के निर्माण में लगे रहे। उनके सपनों के भारत के केन्द्र में रहा ’’रामराज्य’’ अर्थात ’’श्रीराम’’ के वास वाला आदर्श राज्य, जिसे वह ईश्वर का राज्य कहकर संबोधित करते थे।
भारत हजारों वर्ष पूर्व विकसित देश के रूप में जाना, पहचाना गया। देवभूमि के रूप में संसार के क्षितिज में आज भी विद्यमान है। दुनिया के मानचित्र में भारत की अलग शान है। भारत को सोने के पंखों वाली चिड़िया का सम्बोधन अपनी व्यवहारिक, वैचारिक, मानविक, कौशल, सांस्कृतिक, सद्भावनात्मक रीति-नीति के फलस्वरूप ही मिला है। जो सदियों से यहां की सांस्कृतिक परम्परा में समाहित है।
गांधी का रामराज्य एक ऐसा आदर्श राज्य है जो किसी विशेष धर्म में बांधकर नहींं रखा जा सकता। वह नैतिकता, सामाजिक न्याय, मानव हितैषी और सच्चाई पर आधारित एक ऐसा राज्य है जहां बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, दरिद्रता और शोषण न हो। संसार का प्रत्येक व्यक्ति अवसर की समानता का बराबरी से अधिकारी है। गांधी इसकी वकालत करते हुए अनेक बार देखे जा सकते हैं। गांधी धर्म की नैतिकता की बात करते हैं। वे सभी सम्प्रदायों के मूल में निहित मानवता के हिमायती हैं। वो जानते थे कि धर्म नैतिकता से आरम्भ होता है। इसीलिए उनके उद्बोधनों में सबसे अंतिम पंक्ति में खड़ा अंतिम व्यक्ति ही प्राथमिक स्थान प्राप्त व्यक्ति रहता था।
समाज में समानता का भाव उत्पन्न करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति के भावों को विचारों को उचित स्थान मिलना अत्यन्त आवश्यक है। जिसका गांधी अपने विचार और व्यवहार में विशेष ध्यान देते थे। गांधी का रामराज्य युवाओं के हाथों में कौशल की कुंजी थमाने वाला है जिससे वे आधुनिक मशीनरीकरण के गुलाम न होकर मशीनों के निर्माणकर्ता बनेगें। मशीन और मानव के युद्ध में मानव ही विजयी हो ऐसी कल्पना गांधी ने की थी। वो भारतीयों की कर्मठता को भलि-भांति जानते थे इसीलिए कौशल शिक्षा के वकालत करते थे, गांधी ने कौशल और तकनीकी की तारतम्य वाली बुनियादी शिक्षा की नींव रखी। ताकि युवाओं को कला-कौशल से पारंगत कर विकसित भारत की आधारशिला रखी जा सके।
जनवरी 1948 में गाँधी ने राम के नाम के साथ संसार त्याग किया। गाँधी के रामराज्य की कल्पना में बसे भारत, के निर्माण के दायित्व का जिम्मा अब सरकार के साथ-साथ हर भारतीय का भी है। जिसमें मानवता का बोलबाला हो । संस्कार से रोजगार तक फले फूले। ना शोषित हो ना शोषण हो, ना भय हो ना हिंसा हो तभी सही मायने में गाँधी के राम आयेंगे और रामराज्य स्थापित होगा।
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