असहायों और बेजुबानों की तो शरणस्थली हैं, उनके पालक हैं, सहयात्री हैं, क्योंकि वे आरोपण के भाव से मुक्त हैं।
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शिव के यहां माया नहीं है, संचय नहीं है फिर भी उनका भरा पूरा परिवार है। शिव बेजुबानों के सखा हैं, कमजोरों, वंचितों और निरीह जीवों को साथ लेकर चलते हैं। शिव समदर्शी हैं, उपेक्षा और वर्चस्व के भाव से परे। शिव समता और साथी भाव के जन्मदाता है। वे इन भावों से इस कदर भरे हुए हैं कि प्रेम में अर्धनारीश्वर हो जाते हैं, यह उनके प्रेम की पराकाष्ठा ही है, ऐसा होना ही उनके वैराग्य की चरम अवस्था है।
शिव हर तरह की कलाओं में दक्ष हैं, भेद मुक्त हैं।
शिव हर तरह की कलाओं में दक्ष हैं, भेदमुक्त हैं, एक तरफ ज्ञानी हैं-ध्यानी हैं, योगी हैं तो दूसरी तरफ तांडव नृत्य में सिद्धस्थ हैं। शिव घोर तिमिर में प्रकाश की किरण हैं। उनके यहां कोई सोपानक्रम नहीं है। वे सखा भाव से भरे हुए हैं, इसीलिए आदि से अनादि हैं, अनंत हैं।
शिव निर्विकार हैं, उनकी बांहें खुली हुई हैं, जिसमें जीव जगत के सभी प्राणियों के लिए जगह है। वे कैलाशपति हैं, प्रकृति में रची- बसी अनुभूति हैं। शिव तमाम तरह के वैभव से मुक्त हैं, नदी-पहाड़-झरना, पेड़-पालव आदि के सहचर हैं।
असहायों और बेजुबानों की तो शरणस्थली हैं, उनके पालक हैं, सहयात्री हैं, क्योंकि वे आरोपण के भाव से मुक्त हैं। आज जब ताकतवर अपनी-अपनी महत्वाकांक्षाओं में लिप्त होकर दुनिया को युद्ध की आग झोंक देना चाहते हैं तो जरूरत इस बात है कि लोगों में शिवत्व का जागरण हो।
महाशिवरात्रि के इस पावन अवसर पर शिव लोगों के हृदय में मित्र भाव का जागरण करें और लोग हथियार छोड़ एक-दूसरे की तरफ हाथ बढ़ाएं। प्रकृति, मनुष्य, स्त्री-पुरुष और समस्त संसार के प्राणियों में प्रेम, भाईचारा और सहोदर भाव जगे।
शिवरात्रि की शुभकामनाएं।
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