अक्सर राज्यपालों के विवेकाधिकारों पर बहस होती रही है। आरोप भी लगे हैं कि केंद्र राज्यपालों का दुरुपयोग करता है।
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लब्बो लुआब यह कि घटनाक्रम का केंद्र बिंदु अब राज्यपाल हैं। दिलचस्प यह है कि संविधान इस मामले में राज्यपाल के विवेक को मान्यता देता है। वह राज्यपाल के विवेक को अधिकार में तब्दील कर देता है। यह बात अलग है कि उसके निर्णय को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है। अगर राज्यपाल को लगता है कि मुख्यमंत्री बहुमत खो चुके हैं तो वे विधानसभा का सत्र बुलाने और मुख्यमंत्री को बहुमत साबित करने का निर्देश दे सकते हैं। अनुच्छेद 163 के अनुसार वे विवेक से ऐसा कर सकते हैं।
इतना ही नहीं, वे संतुष्ट हों तो बहुमत सिद्ध किए बिना भी किसी राजनेता को विवेक से मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला सकते हैं और बाद में सदन में बहुमत साबित करने का निर्देश दे सकते हैं। मान लीजिए, मुख्यमंत्री बहुमत हासिल करने में नाकाम रहते हैं तो राज्यपाल विधानसभा भंग कर सकते हैं।
लेकिन इससे पहले उन्हें उन विकल्पों पर विचार करना होगा, जो प्रदेश को बहुमत वाली सरकार दे सकते हों। यदि राज्यपाल का विवेक कहता है कि प्रदेश में ऐसी स्थिति बन गई है कि प्रशासन संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक नहीं चल रहा है तो वह राष्ट्रपति को रिपोर्ट के जरिए अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर सकता है।
आप कह सकते हैं कि यह एक तरह से अंतिम कार्रवाई है। अनुच्छेद 163 (2 ) कहता है कि यदि किसी मामले में राज्यपाल के पास सिर्फ विवेक से निर्णय लेने का विकल्प बचता है तो फिर उसके विवेकानुसार किया गया फैसला अंतिम होगा। फिर प्रश्न नहीं उठाया जाएगा कि राज्यपाल को विवेक से काम करना चाहिए था या नहीं।
अक्सर राज्यपालों के विवेकाधिकारों पर बहस होती रही है। आरोप भी लगे हैं कि केंद्र राज्यपालों का दुरुपयोग करता है। संसदीय जानकारों के बीच मार्गदर्शी सिद्धांत तैयार करने की वकालत भी होती रही है। कभी-कभी प्रदेशों में एक जैसी स्थितियों में राज्यपालों ने अलग-अलग प्रकृति के निर्णय लिए। उनके मद्देनजर स्वस्थ्य परंपरा और एकरूपता बनाए रखने के लिए इन सिद्धांतों की जरूरत महसूस की जाती रही है। इस मायने से सरकारिया आयोग की रिपोर्ट महत्वपूर्ण है। हालांकि आयोग ने रपट में ऐसे सिद्धांतों को अव्यावहारिक माना है।
आयोग की राय थी कि राज्यपाल के विवेकाधिकारों को बनाए रखा जाना चाहिए। पूर्व राष्ट्रपति और राज्यपाल रहे डॉक्टर शंकरदयाल शर्मा ने कहा था-
बुद्धिमान राज्यपाल सुनिश्चित करते हैं कि कभी भी उनके पद की सीमा का उल्लंघन नहीं हो। उनकी बात को बढ़ाते हुए संसदीय विशेषज्ञ एमएम जैकब ने संसद के दस्तावेज में लिखा था ," गैर समझौतापरक निष्ठा और दृढ विश्वास का साहस राज्यपाल की प्रतिभा का प्रमाण होना चाहिए। उसका ध्येय सार्वजनिक हित और संविधान की रक्षा होना चाहिए। राज्यपाल के निर्णयों पर किन्ही अन्य बातों का प्रभाव नहीं होना चाहिए। यही सार है।
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