संगम का सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व
भारतीय वांग्मय ही नहीं भारत के साहित्यिक रचना संसार और विभिन्न कालखंडों के काव्य गंगा-यमुना के संगम प्रयाग क्षेत्र का सांस्कृतिक, धार्मिक, और प्रतीकात्मक महत्व दर्शाते हैं। कालिदास के काव्य संसार में तो गंगा और यमुना के संगम, दोनों नदी के पानी के बारीक अंतर और संगम स्नान के महात्म उपमा अलंकार के माध्यम से विस्तार से वर्णित है। प्रयाग में स्नान को दार्शनिक तत्वबोध के बिना भी मोक्ष मिलने का रास्ता बताया है।
हजारों सालों से अनेकों ग्रन्थ, साहित्यकार संगम पर दोनों नदियों के पानी के अलग-अलग रंग और प्रकृति का जिक्र करते आये हैं, जो आज भी संगम पर दीखता है जहा गंगा का साफ़ पानी यमुना के गहरे रंग वाले पानी से मिलता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी दोनों नदियों में बह के आ रही अलग-अलग मिटटी की मात्रा और प्रवृति के कारण दोनों नदियों के पानी का रंग अलग-अलग होता है, जिसका जिक्र कालिदास बखूबी करते हैं।
इस बात का भारतीय साहित्य में सबसे पहला जिक्र दूसरी शताब्दी में नाटककार भास की रामकथा पर आधारित प्रतिमानाटकम में है जिसमें अपनी मां कैकई से क्षुब्ध भरत उनकी उपमा गंगा और यमुना के बीच एक प्रदूषित नदी से किया है।
भास के बाद के संस्कृत साहित्यकारों के बीच तो गंगा यमुना के संगम और पानी के वर्णन के लिए साहित्यकारों में होड़ सी लग जाती है। सुबंधु ने ‘वासवदत्ता’ में संगम की तरंगो की तुलना नायक वासवदत्ता के मोतियों के हार से की है, तो बाणभट्ट (हर्षचरित में), दण्डी, दामोदरगुप्त, मुरारी, श्रीहर्ष, केशवदास सहित अनेकों ने अपनी कृति में अनोखे उपमा से संगम के महत्व को दर्शाया है, कहीं संगम के चमक की तुलना मोती के हार से की गई है तो कोई अपने राजा के प्रताप और ओज देख रहा है।
केशवदास जो कि अलंकर सम्प्रदाय के कवि माने गए, का संगम का वर्णन प्रभावी साहित्यिक अभिव्यक्ति की प्रकाष्ठा है। अपनी एक रचना में संगम पर बिखरे रेत के कण मानो छोटे-छोटे देव स्वरुप है जो गंगा-यमुना का सत्कार कर रहे हैं। बाद के काल में जब मानव बसावट पूर्ण रूप से गंगा के मैदान में पसर जाती है, तब प्रयाग को एक पवित्र त्तीर्थ के रूप में प्रसिद्धि मिलती है, अरण्यक से तीर्थ संस्कृति का दौर आता है।
भारत के पवित्र तीर्थ स्थलों, उनकी महिमा और तीर्थ यात्रा के तरीकों पर अनेक ग्रन्थ लिखे गए और सब में प्रयाग को एक बार फिर विशिष्ट स्थान मिला। शुरुवाती लक्ष्मीधर भट्ट लिखित तीर्थ टीका से लेकर, नारायण भट्ट, जिनप्रभु सूरी, वाचस्पति मिश्र, मित्र मिश्र तक सबमें प्रयाग का विशेष वर्णन मिलता है और सब एक सुर में साथ प्रयाग की तीर्थ यात्रा नंगे पैर करने की बाध्यता बताते हैं।
साहित्यिक रचनाओं मे प्रयाग के महत्व का वर्णन
भारतीय धर्म ग्रन्थ वेद-पुराण इतिहास से लेकर तमाम साहित्यिक रचनाएं प्रयाग की ऐतिहासिकता की गवाही देते हैं। शुरुआती दौर में सब इसे गंगा और यमुना नदी के संगम तीर्थराज के रूप में इसकी पवित्रता को प्रतिस्थापित करते हैं। वर्तमान में प्रयाग ना सिर्फ गंगा यमुना बल्कि अदृश्य नदी सरस्वती के संगम के रूप में जन मानस में रचा बसा है, यह गंगा यमुना की वेणी नहीं बल्कि गंगा यमुना और सरस्वती की त्रिवेणी है।
इस बात की पहली निशानदेही महाकवि विद्यापति की रचना भू-परिक्रमण में मिलती है, जहां तीर्थराज प्रयाग में दो नहीं तीन नदियों के समन्वय जिक्र है। विद्यापति के बाद की रचनाओ में सरस्वती नदी गंगा यमुना के साथ-साथ संगम में स्थान पाती है, हालांकि तुलसीदास
प्रयाग के लिए वेणी यानी दो नदियों का संगम बताते हैं पर सरस्वती नदी का स्पष्ट रूप से गंगा-यमुना के साथ उल्लेख भी करते हैं। वही केशवदास की रचनाओं में प्रयाग का संगम त्रिवेणी है जिसमें सरस्वती नदी गंगा यमुना के साथ अदृश्य रूप में शामिल है। यहां तक कुछ पुराण भी प्रयाग के संगम में सरस्वती के अदृश्य अस्तित्व को स्वीकारते हैं जिसमें पद्मपुराण, ब्रह्मपुराण और नारदीयपुराण प्रमुख है।
भारतीय जन-मानस का प्रभाव मुस्लमान लेखको द्वारा उस दौर के पर्सियन में लिखे ग्रंथों में भी झलकता है जिसमें प्रयाग पर गंगा यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम का जिक्र मिलता है।
सरस्वती नदी भारत की सभ्यता की आदि नदी है, जिसके किनारे भारतीय सभ्यता पनपी, जिसके तट पर वेद की ऋचाएं वजूद में आई, भारतीय संस्कृति ने शुरुवाती आकार लिया और जिसका अमिट छाप आज भी दृष्टिगोचर है। बाद में भले बड़े पैमाने पर आये पर्यावरणीय बदलाव के कारण सरस्वती नदी भले सूख गयी पर जनमानस नदी को कभी भूल नहीं पाया।
प्रयाग में सरस्वती एक अंतर्ध्यान मुद्रा में गंगा-यमुना के साथ संगम करती हुई निरुपित होती है जो सरस्वती नदी से सभ्यतागत जुडाव की लोक स्मृति का निरूपण है, जिसे भारतीय समाज ने लोक व्यहार में संजो लिया है।
प्रयाग हमारी समृद्ध जल और नदी संस्कृति का प्राचीनतम आयाम है,भारतीय ज्ञान परम्परा के सतत प्रवाह जैसे हजारो साल से कुंभ स्नान के रूप में अनवरत जारी है। प्रयाग संगम और कुम्भ के ऐतिहासिक, साहित्यिक, सामाजिक, आर्थिक, और सभ्यतागत लोक समृति के सम्बन्ध इसे अजर अमर बनाते है।
गंगा-यमुना और सरस्वती के संगम का तीर्थ स्वरुप आज भी लगभग उसी रूप में है, आज भी गंगा की धवल और यमुना की मटमैली धारा उसी तरह संगम में मिलती है जैसे ऋग्वेद के खिलसुक्त में वर्णित है। तभी तो भारतीय सभ्यता इस धरा की एक मात्र जीवित सभ्यता है यही सतत ज्ञान गंगा का प्रवाह है यही सनातन है।
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