भारत युवा है लेकिन संसद बुजुर्ग है।
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ऐसे हुआ है युवा वर्ग का विभाजन
भारतीय वैदिक परंपरा में मनुष्य जीवन को चार आश्रमों में विभाजित किया गया है। इसके आधार पर 25 वर्ष तक ब्रह्मचर्य, 25-50 तक ग्रहस्थ, 50-75 तक वानप्रस्थ और 75 -100 वर्ष तक संन्यास आश्रम माना गया है। भारत सरकार ने 2003 में ‘राष्ट्रीय युवा नीति’का गठन किया उसमें 13-35 वर्ष के आयु समूह को युवा की श्रेणी में रखा गया । ‘राष्ट्रीय युवा नीति’के अंतर्गत ही राष्ट्रीय स्तर पर युवाओं को दो समूहों के अंतर्गत विभाजित किया गया जिनमें 13-19 वर्ष के लिए किशोर (जिसे टीन एजर्स कहा जाता है) और 20-35 वर्ष के आयु समूह के लिए मध्यम युवा वर्ग कहा गया।
वहीं दुनिया के अलग-अलग मुल्कों में भी 13-19 वर्ष के व्यक्ति को किशोर (टीन एजर्स) माना जाता है और 20-40 वर्ष के व्यक्ति को युवा माना जाता है। उसके बाद 40-60 तक अधेड़ और 60 के बाद बुजुर्ग माना जाता है। सरकारी और सैद्धांतिक बातों का निचोड़ निकाला जाए तो 40 वर्ष तक के आयु समूह को युवा कहा जा सकता है। भारत का यह आयु समूह जिसे युवा कहा जा रहा है वह कुल जनसंख्या का तकरीबन 67% है। ऐसे में अब यह देखना दिलचस्प है कि इस 67% युवा की राजनीति में कितनी भागीदारी रही है ? कितनी मौजूदा समय में है ? राजनीति से मेरा आशय यहां संसदीय राजनीति में चुनकर आने वाले सांसदों से है।
युवा देश की बुजुर्ग संसद
राजनीति में युवाओं की भागीदारी का आह्वान सभी पार्टियां ज़ोर-शोर के साथ करती हैं। सभी पार्टियां चाहती हैं कि उनके पास युवा ब्रिगेड हो जो धरने से लेकर सभाओं तक की व्यवस्था करे और ये युवा अपने सपनों की डोर से हमारी पतंग उड़ाएं। अब सोशल मीडिया की गुत्थम-गुत्था के लिए भी युवा की आवश्यकता है। लेकिन जब इस युवा को पार्टी में पद और टिकट देने की बात आती है तो नेताओं को सिर्फ अपने परिवार में ही युवा नज़र आते हैं।
इस मामले में भारतीय राजनीति में एक तरह से ‘रिले दौड़’चलती आ रही है। आप लोगों ने रिले दौड़ तो देखी होगी न ? इस दौड़ में ‘बैटन’को हाथ में पकड़े, एक साथी दौड़ता है और पूरा चक्कर लगाने के बाद वह उस ‘बैटन’को अपने दूसरे साथी के हाथों में सौंप देता है। इस तरह ‘बैटन’ अपनों के हाथों से अपनों के हाथों में सौंप दिया जाता है ताकि वह रेस को आगे बढ़ाते रहें। राजनीति में ‘बैटन’को आप ‘विरासत’पढ़ सकते हैं। नेता जब ढलान पर होता है, बुजुर्ग होने लगता है या पार्टी में अप्रासंगिक होने लगता है तो वह अपनी राजनीतिक ‘बैटन’किसी कर्मठ और समर्पित युवा कार्यकर्ता के हाथों में न देकर अपने परिवार के युवा के हाथों में देता है। इस तरह भारतीय राजनीति युवा भी होती रहती है और युवाओं पर चर्चा भी चलती रहती है।
पहली लोकसभा से 16वीं लोकसभा तक के सफर में युवाओं का प्रतिनिधित्व घटता रहा।
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क्या कहते हैं आंकड़े
इस बात को आप आंकड़ों से भी समझ सकते हैं। भारत में पहला लोकसभा चुनाव 1952 में हुआ। भारत की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले लगभग सभी नेताओं ने चुनाव में भागीदारी की। पहली लोकसभा के आंकड़ों पर ध्यान दें तो उसमें 40 वर्ष से कम आयु के 26% सांसद चुने गए थे। उस समय भारत आज की तर्ज़ पर इतना युवा भी नहीं था। उसके बावजूद भी संसदीय राजनीति में युवाओं की बड़ी भागीदारी थी। इस भागीदारी में तत्कालीन ‘सीनियर’राजनेताओं की अहम भूमिका रही। उनकी सोच थी कि देश ही नहीं, संसद को भी युवा होना चाहिए। जबकि आज स्थिति ठीक इसके विपरीत है। संसद में युवाओं की संख्या औसतन चुनाव- दर- चुनाव कम होती जा रही है।
पहली लोकसभा से 16वीं लोकसभा तक के सफर में युवाओं का प्रतिनिधित्व घटता रहा। इसका एक बड़ा कारण तो ‘वंशवाद’या विरासत की राजनीति रही है तो वहीं दूसरा कारण राजनीति में धनबल और बाहुबल का बढ़ता प्रभाव है। इसके साथ–साथ ‘राजनीति’की बनती नकारात्मक छवि ने भी युवा की भागीदारी को सीमित किया है। औसत हिंदुस्तानी राजनीति को कैरियर के तौर पर स्वीकार नहीं कर पाता है। उसके लिए राजनीति ‘बेकार की चीज’है। राजनीति की इस ‘बेकार और फालतू’की छवि के पीछे भी राजनेताओं की अहम भूमिका है क्योंकि अब राजनीति परिवर्तन और सेवा का साधन न होकर सत्ता, शक्ति और संसाधनों का केंद्र है। हर राजनेता इसी केंद्र की चाह में आगे बढ़ता है और जब वह थक जाता है तो परिवार के दूसरे सदस्य को विरासत दे देता है।
भारतीय युवा और भारत की राजनीति
कहने का अर्थ यह है कि राजनीति के केंद्र से राजनेता कभी दूर नहीं होता और युवा इस केंद्र की परिधि के चक्कर लगाते हुए खत्म हो जाता है। इस बात की पुष्टि 16वीं लोकसभा के आंकड़े भी करते हैं। इस लोकसभा में 543 में से केवल 70 सांसद ही 40 वर्ष से कम आयु के थे। मतलब केवल 12.89 % और बाकी 87% सांसद 40 वर्ष से अधिक के थे जबकि भारत की 67% आबादी 40 से कम की है यानी 67% युवा जनसंख्या का संसद में 12.89 % लोग प्रतिनिधित्व कर रहे थे वहीं 33% जनसंख्या का संसद में 87% प्रतिनिधित्व था ।
इन आंकड़ों में एक और मजेदार बात है। अगर आप 16वीं लोकसभा के 12.89 % युवा सांसदों पर ठीक से नज़र दौड़ाएं तो पाएंगे की इनमें से 5.09% युवा सांसद वह हैं जो विरासत की ‘बैटन’के बलबूते संसद में विराजमान हैं। मतलब की वह जिन्हें राजनीति विरासत में मिली है। अब आप 16वीं लोकसभा में सामान्य युवा का संसद में प्रतिनिधित्व देखेंगे तो वह केवल 7.8% है। मतलब साफ है कि देश तो युवा हो रहा है, लेकिन संसद बुजुर्ग !
युवा किसी भी देश का आधार होते हैं क्योंकि सबसे ज्यादा ऊर्जा और संभावनाएं युवाओं में ही होती हैं। युवा लोकतन्त्र से लेकर अर्थतन्त्र की रीढ़ हैं। इसलिए संसद में युवाओं की भागीदारी बड़े पैमाने पर होनी चाहिए। ‘जिसकी जितनी हिस्सेदारी / उसकी उतनी भागीदारी’जैसे नारों का लोकतान्त्रिककरण हो और हिस्सेदारी जाति तक सीमित न होकर उसका विस्तार होना चाहिए। संसद में जितनी युवाओं की भागीदारी होगी, लोकतन्त्र उतना ही मजबूत होगा। 16 वीं लोकसभा में 46% प्रश्न युवा सांसदों ने ही उठाए, इसलिए संसदीय राजनीति को मजबूत करना है तो उसे रिले रेस से बाहर निकाल कर, राजनीति की परिधि पर खड़े युवाओं की संसद में भागीदारी को सुनिश्चित करना होगा । तभी सही मायनों में संसदीय राजनीति सफल होगी।
नोट – इस लेख में PRS, YOUTH IN INDIA-2017 और Dynamics of Youth Population – Impact of Education Expenditure से लिए गए आंकड़ों का प्रयोग किया है।
(लेखक दिल्ली विश्व विद्यालय में तदर्थ सहायक प्रोफेसर हैं।)
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