अगर एनडीए की सरकार पांच साल चलनी या चलानी है तो संवाद को प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर तथा पारदर्शिता को दूसरे नंबर पर रखना होगा।
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मतदाता की रणनीति
लगता है कि विवेकशील मतदाता ने देवत्व और दानवत्व की लक्ष्मण रेखा को भांप लिया और लोकसभा चुनाव में मोदी को तीसरी बार सत्ता सौंपकर भी अंकुश अपने हाथ में रख लिया। मतदाता के मन में एक बड़ा भय लोकतंत्र के अनिष्ट का था। जनतांत्रिक व्यवस्था के अधिनायकत्व में बदलने की आशंका का था। इसमें आंशिक सचाई थी तो काल्पनिक आशंकाएं भी थीं।
जैसे कि संविधान बदलकर देश को आजादी के पहले वाले दौर में ठेल देने की कोशिश, आरक्षण समाप्त करने का डर, समूची सत्ता अमीरों के हाथ में दे देने का भय, प्रतिरोध के हर स्वर को खामोश कर देने का डर तथा भौतिक विकास को ही सर्वस्व मान लेने का भ्रम भी शामिल था। अर्थव्यवस्था उड़ रही थी, गरीब का दिल बैठा जा रहा था। हिंदू एकता के नारे में जातीय और क्षेत्रीय अस्मिता और अधिकारों के खो जाने डर भी शामिल था। एक सुदृढ़ और विकसित भारत सभी देखना चाहते हैं, लेकिन किस कीमत पर और किसके लिए, इस पर मतभेद साफ उभर आए।
यह संदेश जाने लगा कि मोदी उस तेज भागते इंजन की तरह हैं, जिसे पीछे चलने वाले डिब्बों की फिकर ही नहीं है। हालांकि मोदी ने ऐसी आशंकाओं को निराधार बताते हुए कई बार इसका खंडन भी किया। लेकिन संदेह के बादल आखिर तक छंट नहीं पाए।
सबसे बड़ा कारण तो संवादहीनता थी। भारतीय लोकतंत्र के 70 साल के इतिहास में ये पहले 10 साल थे, जब सत्ता पक्ष और विपक्ष में संवाद और समन्वय न्यूनतम स्तर पर था। यह धारणा बनी कि मोदी खुद ही फैसले लेकर बाकी लोगों को न्यायाधीश की तरह सुना देते हैं। सारी शक्तियां पीएमओ में सिमट गई थीं।
मंत्री के पास फाइल पर चिडि़या बिठाने से ज्यादा कुछ बचता नहीं था। यह स्थिति भी उस लोकतांत्रिक शासन के अनुरूप नहीं थी, जिसकी कल्पना हमारे पूर्वजों ने की थी। ऐसा नहीं है कि मोदी पर से पूरे देश का विश्वास उठ गया है। क्योंकि जिस संविधान के बदलने और आरक्षण खत्म होने का डर यूपी, बिहार, महाराष्ट्र या और कुछ दूसरे राज्यों के ओबीसी दलितों और आदिवासियों को सता रहा था, वह मप्र सहित चार राज्यों के दलित आदिवासियों को नहीं लगा। उल्टे मप्र सहित चार राज्यों में भाजपा के प्रति इन वर्गों का समर्थन और मजबूत हुआ। वैसे भी संविधान किसी विशेष राज्य या जाति के लिए नहीं बदला जा सकता।
मतदाता की खूबी यह है कि वह सत्ताधीशों के मन और नीयत को भी पढ़ लेता है। लेकिन मतदाता का शक यदि दूर न हो तो वह चुनाव में पुरस्कार या तिरस्कार के रूप में परिणत होता है। शायद इसी संभावित भय ने पूर्ण बहुमतवाली पार्टी की सरकार को अपूर्ण बहुमत वाले दल की गठबंधन सरकार में तब्दील कर दिया। यूं कहने को तो 2014 व 2019 में भी एनडीए गठबंधन की ही सरकारें थीं, लेकिन उसका समूचा नियंत्रण मोदी और भाजपा के हाथ में था। अब वैसा नहीं हो सकेगा।
अगर एनडीए की सरकार पांच साल चलनी या चलानी है तो संवाद को प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर तथा पारदर्शिता को दूसरे नंबर पर रखना होगा। अपने पूर्वाग्रह थोपने की जगह सबकी राय से काम करना होगा। बीते दस सालो में मोदी सरकार के कई निर्णय ऐसे थे, जिन पर फैसले से पहले ही यदि परस्पर संवाद कर आम सहमति बनाने की कोशिश की गई होती तो विवाद ही नहीं होते। तीसरा, विपक्ष का सम्मान किए बगैर सरकार चलाना नामुमकिन होगा।
यह जताना होगा कि विपक्ष के केवल एक संवैधानिक प्रावधान भर नहीं है, लोकतंत्र की एक जीवंत आवश्यकता है। न सिर्फ विपक्ष बल्कि स्वयं भाजपा के अन्य नेताओं और सहयोगी दलो को भी पूरा सम्मान देना होगा, वरना कब कौन समर्थन वापस लेकर सत्ता की जाजम खींच ले, कहा नहीं जा सकता। लेकिन यह सब करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी को ज्यादा उदार, सहिष्णु और विकेन्द्रीकृत सत्ता का हामी होना पड़ेगा।
संक्षेप में कहें तो उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी की शैली में काम करना होगा ( उनकी गलतियों को छोड़कर)। क्या मोदी ऐसा कर पाएंगे, यह लाख टके का सवाल है? और इसी के साथ मोदी 3.0 पर प्रश्नचिहन्ह भी !
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