कहीं से यह सुरसुरी फैलाई गई कि इस बार फिर दिग्विजय सिंह लोकसभा चुनाव लड़ सकते हैं
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कैबिनेट मंत्री बनाकर उनका आदर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे।' चूंकि यह बात भाजपा मीडिया सेंटर में एक गैर भाजपा नेता ने कही, इसका सीधा अर्थ यही है कि शिवराज की संभावित उम्मीदवारी का एलान सोची समझी रणनीति के तहत रामदास आठवले के मुंह से कराया गया। क्योंकि आठवले की बात का न तो किसी भाजपा नेता ने खंडन किया और न ही स्वयं शिवराज की ओर से इस बारे में कोई प्रतिक्रिया आई।
वैसे अगर चुनाव लड़ना ही पड़ा तो शिवराज की पहली पसंद तो उनकी अपनी पुरानी लोकसभा सीट विदिशा होगी, लेकिन पार्टी हाइकमान उन्हें इतनी आसान सीट से लड़ाएगा, इसकी संभावना कम ही है। अगर शिवराज को छिंदवाड़ा से उतारा गया तो मुकाबला वाकई कांटे का होगा और आश्चर्य नहीं कि शिवराज कमलनाथ पर भारी पड़ जाएं। और शिवराज को तगड़ी टक्कर देने के लिए छिंदवाड़ा से अपने बेटे नकुलनाथ को उतारने की जगह खुद को मैदान में उतरना होगा।
दूसरा मामला एक दूसरे पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का है। कहीं से यह सुरसुरी फैलाई गई कि इस बार फिर दिग्विजय सिंह लोकसभा चुनाव लड़ सकते हैं। इसके पीछे कांग्रेस की यह रणनीति बताई जाती है कि मप्र में हाल में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा द्वारा कई सांसदों और बड़े चेहरों को मैदान में उतारने का भाजपा को काफी फायदा हुआ। ऐसे अधिकांश प्रत्याशी खुद तो जीते ही, आसपास की सीटों को भी जितवाया। लिहाजा कांग्रेस इसी फार्मूले को अब लोकसभा चुनाव में अप्लाई करना चाहती है।
ऐसे में कांग्रेस में सबसे बड़ा नाम तो दिग्विजय सिंह का ही है। गौरतलब है कि 2019 में मप्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भोपाल में एक पत्रकार वार्ता में एलान किया था कि दिग्विजय सिंह को किसी मुश्किल सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ना चाहिए। चाहें तो वो भोपाल से लड़ सकते हैं। कमलनाथ के उस बयान में आग्रह के साथ आदेश भी था।
यह ऐलान दिग्विजय सिंह की सहमति से हुआ था या नहीं, यह कभी साफ नहीं हुआ। एलान हो जाने के बाद दिग्विजय सिंह के लिए पीछे हटना संभव नहीं था। यह जानते हुए भी भोपाल लोस सीट पिछले 35 सालों से भाजपा का अभेद्य दुर्ग बनी हुई है। फिर भी दिग्विजय सिंह ने यहां से चुनाव लड़ने का जोखिम उठाया और वो एक एक अल्पज्ञात भाजपा प्रत्याशी प्रज्ञा सिंह ठाकुर से साढ़े तीन लाख वोटों से हार गए।
इस बार चर्चा चली कि दिग्विजय सिंह को अपनी पुरानी लोकसभा सीट राजगढ़ से फिर लड़ना चाहिए। क्योंकि वो पूर्व में दो बार इस सीट से लोकसभा जीत चुके हैं और अभी भी वहां से कांग्रेस प्रत्याशी को जिताने की तैयारी में जुट गए हैं। जहां तक खुद उनके अपने चुनाव लड़ने की बात है तो लगता है कि दिग्विजय जमीनी हालात को समझ गए हैं।
इसलिए उन्होंने चुनाव लड़ने की अटकलों को यह कहकर खारिज कर दिया कि उनका राज्यसभा का सवा दो साल का कार्यकाल अभी बाकी है। वैसे इस बार भाजपा और कांग्रेस दोनो पार्टियां लोकसभा में दिग्गज चेहरे उतारने के मूड में ज्यादा हैं।
इसकी एक वजह तो कोप भवन में बैठे पार्टी प्रत्याशियों को मुख्यधारा में लाना और हैवी वेट कैंडिडेट के रूप में उन्हें चुनाव मैदान में उतारना है ताकि जीत सुनिश्चित की जा सके। इनमें कुछ विस चुनाव में हारे हुए प्रत्याशी भी हो सकते हैं। भाजपा राज्य की सभी 29 लोकसभा सीटें जीतने की फिराक में है तो कांग्रेस अपनी परंपरागत छिंदवाड़ा सीट बचाने के साथ-साथ कुछ दूसरी सीटें जीतने की उम्मीद बांधे हुए है।
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