यदि आप केवल तर्क से जीवन को पढ़ेंगे, तो आपको उसका व्याकरण तो मिल जाएगा, पर उसकी धड़कन नहीं मिल पाएगी। तर्क हमें बताता है कि फूल कैसे खिलता है, लेकिन वह यह नहीं बता सकता कि एक खिला हुआ फूल देखकर हृदय क्यों भर आता है। विज्ञान प्रकाश की तरंग-लंबाई के बारे में तो समझा सकता है, पर सूर्यास्त की सुंदरता का अनुभव नहीं दे सकता। मनुष्य का जीवन तर्क, भावना, कल्पना, स्मृति और मौन का मिलाजुला संगीत है। यदि इनमें से किसी एक को ही सत्य घोषित कर दिया जाए, तो संगीत टूट जाता है।
भारत की यात्रा करते हुए मैंने देखा कि यहां लोग मौन को भी संवाद मानते हैं। एक साधु घंटों बिना कुछ बोले बैठ सकता है और फिर भी उसके आसपास मौजूद लोग अनुभव करते हैं कि उनसे कुछ कहा गया है। तर्क मनुष्य को दिशा देता है, किंतु अनुभव उसे गहराई देता है। दिशा बिना गहराई के मनुष्य को यांत्रिक बना देती है, गहराई बिना दिशा के उसे भटका सकती है। जीवन का सौंदर्य इन दोनों के संतुलन में ही है।
हम नश्वर हैं, फिर भी अमरता का स्वप्न देखते हैं। हम अकेले जन्म लेते हैं, फिर भी संबंधों के बिना जी नहीं सकते। हम जानते हैं कि मृत्यु निश्चित है, फिर भी भविष्य की योजनाएं बनाते हैं। यदि तर्क ही सब कुछ होता, तो शायद यह सब निरर्थक लगता। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं कि हमें तर्क छोड़ देना चाहिए। तर्क हमारे भीतर का प्रकाश है, पर वह सूर्य नहीं है। वह भ्रम से बचाता है, पर विस्मय नहीं दे सकता। विस्मय तब जन्म लेता है, जब हम स्वीकारते हैं कि अस्तित्व हमारी समझ से बड़ा है।
दरअसल, जीवन को समझने का अर्थ उसे नियंत्रित करना नहीं, उसके साथ संवाद करना है। जो मनुष्य हर बात को प्रमाण से पहले स्वीकार नहीं करता, वह विवेकशील है, पर जो हर अनुभव को केवल इसलिए अस्वीकार कर देता है कि उसे पूरी तरह सिद्ध नहीं किया जा सकता, वह जीवन के अनेक द्वार स्वयं बंद कर लेता है। इसलिए, जीवन को तर्क से समझिए, पर केवल तर्क तक सीमित मत रहिए। प्रश्न पूछिए, पर उत्तर मिलने के बाद भी विस्मित होने की क्षमता बचाए रखिए। क्योंकि, मनुष्य केवल इसलिए महान नहीं है कि वह सोच सकता है, वह इसलिए भी महान है कि वह प्रेम कर सकता है, मौन रह सकता है, क्षमा कर सकता है, सौंदर्य का अनुभव कर सकता है और अनंत के सामने विनम्र होकर खड़ा हो सकता है।