लिव इन रिलेशनशिप का सामाजिक प्रभाव
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भारत में बढ़ता चलन
इन तमाम तथ्यों के बाद भी भारत में भी युवाओं में ‘लिव इन रिलेशनशिप’ की स्वीकार्यता बढ़ रही है। शायद इसलिए भी क्योंकि यह धर्म, जाति, वर्ग और नस्ल के परे जाकर सम्बन्धों को मान्य करता है। हालांकि अधिकांश मामलों में शुरू में परस्पर आकर्षण और आपसी सहमति से बनने वाले ये अंतरंग सम्बन्ध बाद में सतत झगड़े और यौन शोषण में तब्दील हो जाते हैं।
हाल में सामने आए पुलिस महिला सुरक्षा शाखा के एक अध्ययन में खुलासा हुआ कि मध्यप्रदेश में वर्ष 2019, 2020 व 2021 के दौरान ‘लिव इन’ में रहने वाली युवतियों ने सबसे ज्यादा रेप के मामले दर्ज कराएं हैं। इस अवधि में कुल 14 हजार 476 मामले बलात्कार के दर्ज हुए, इनमें से 85 फीसदी प्रकरण लिव इन रिलेशनशिप से जुड़े थे। इनमें सभी आरोपी लिव इन पार्टनर थे। केवल 2 फीसदी मामलों में आरोपी अजनबी थे।
ज्यादातर मामलों में यह देखने में आया है कि पुरुष, महिलाओं को कुछ समय बाद शादी करने का झांसा देकर ‘लिव इन रिलेशनशिप’ में रहने के तैयार कर लेते हैं। एक बार यह हो जाने पर शादी करने से पल्ला झाड़ लेते हैं। ऐसे में उनकी महिला लिव इन पार्टनर कहीं की नहीं रहती। बावजूद इसके लड़कियां लिव इन पार्टनर बनने इतनी आसानी से तैयार क्यों हो जाती हैं, इस सवाल का जवाब कठिन है।
इसका एक कारण शहरों में उन्मुक्त जीवन जीने की चाह, सही उम्र में विवाह न हो पाना, आर्थिक संकट, पसंदीदा वर न मिल पाना या परिवार से बगावत भी कारण हो सकता है। कई मामलों में तो यह भी देखने में आता है कि पुरुष पार्टनर पहले से शादीशुदा होता है और केवल यौनेच्छा पूर्ति के लिए किसी महिला को लिव इन पार्टनर बना लेता है।
अदालतों का क्या मानना है?
बावजूद इस हकीकत के देश की अदालतों का नजरिया लिव इन पार्टनरशिप मामले में अलग-अलग है और मुख्यत: व्यक्ति की स्वतंत्रता के आग्रह से प्रेरित है। इंदौर हाई कोर्ट के बरक्स पिछले साल राजस्थान हाई कोर्ट की जोधपुर खंडपीठ ने लिव इन रिलेशनशिप मामले में अपने एक फैसले में कहा कि पति व पत्नी के रहते हुए भी कोई व्यक्ति अपने किसी और साथी के साथ लिव इन रिलेशनशिप में बिना तलाक रह सकता है। कोर्ट ने कहा कि देश में अब भी ऐसे कई प्रदेश हैं, जहां पर रूढ़िवादी सोच वाले लोग इसको स्वीकार नहीं करते हैं।
इससे पहले पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप के पक्ष में फैसला दिया था। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि जो भी व्यक्ति लिव-इन रिलेशनशिप का रास्ता अपनाता है, उसे अन्य नागरिकों की तरह कानून का बराबर संरक्षण प्रदान किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि समाज में लिव-इन रिलेशनशिप की स्वीकार्यता बढ़ रही है। ऐसा करना कोई अपराध नहीं है। ऐसा करने वाले जोड़े को कोर्ट संविधानिक सुरक्षा प्रदान करती है।
कोर्ट का नजरिया जो भी हो, समाज के अपने नियम अभी भी ‘लिव इन रिलेशनशिप’ को मान्य करने के लिए तैयार नहीं हैं। इसका कारण केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता नहीं है, बल्कि उससे जुड़े सामाजिक दायित्व भी हैं।
जब तक ‘लिव इन रिलेशनशिप’ को मान्य करते हुए ऐसे रिश्तों को कानूनी संरक्षण नहीं मिलेगा, तब तक ‘लिव इन पार्टनर’ के साथ यौन अपराधों के मामले बढ़ते ही रहेंगे। लेकिन यहां बुनियादी सवाल यही है कि क्या हमारा मानस इसे पूरी तरह स्वीकार करने के लिए तैयार है?
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