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Lalu Yadav Family Conflict: लालू प्रसाद यादव ही नहीं, इन राजनीतिक परिवारों में भी मनभेद से जुदा हुईं हैं राहें

सार

बिहार के पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में दो प्रमुख राजनीतिक पार्टियां समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी हैं। समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव जब पार्टी को खड़ा कर रहे थे, उस समय उनके छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव ने कंधे से कंधा मिलाया था।
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राजद प्रमुख लालू यादव अपने बेटे तेज प्रताप यादव के साथ। - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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बिहार में इसी साल विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। चुनाव से कुछ महीने पहले बिहार के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार यानी लालू प्रसाद यादव के परिवार में एक तूफान आ गया है। दरअसल, अपने ज्येष्ठ पुत्र तेज प्रताप यादव को निजी जीवन में नैतिक मूल्यों की अवहेलना करने पर लालू प्रसाद यादव ने न केवल पार्टी से बाहर कर दिया है, बल्कि परिवार ने भी नाता तोड़ लिया है।

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कई राजनीतिक परिवारों के मनभेद आए सामने

राजनीतिक रूप से इसे विधानसभा चुनाव से पहले गुणा-भाग के रूप में अधिक देखा जा रहा है, क्योंकि सोशल मीडिया पर वायरल हुए तेज प्रताप यादव के फोटोज से बिहार की राजनीति गर्मा गई है। वैसे तो तेज प्रताप यादव लालू परिवार के बड़े पुत्र हैं, लेकिन लालू प्रसाद यादव की राजनीतिक विरासत को तेजस्वी यादव ही आगे बढ़ा रहे हैं।

हालांकि, भारत में यह पहला ऐसा राजनीतिक परिवार नहीं है, जिसमें आपसी मतभेद इस स्तर पर पहुंच गए हैं। देश में कई राजनीतिक परिवार हैं, जिनके राजनीतिक मनभेद सार्वजनिक रूप से सामने आ चुके हैं। कुछ में सुलह हो चुकी है तो कुछ अभी भी राजनीतिक रूप से दूरी बनाए हुए हैं।
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मुलायम परिवार में मनभेद

बिहार के पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में दो प्रमुख राजनीतिक पार्टियां समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी हैं। समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव जब पार्टी को खड़ा कर रहे थे, उस समय उनके छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव ने कंधे से कंधा मिलाया था। शिवपाल सिंह यादव स्वयं को मुलायम सिंह यादव का राजनीतिक उत्तराधिकारी मान बैठे थे, लेकिन मुलायम सिंह यादव ने भाई से ज्यादा पुत्र अखिलेश यादव को तवज्जो दी।

वर्ष 2018 में मुलायम सिंह यादव के जीवित रहते ही शिवपाल सिंह यादव ने अपनी पार्टी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) का गठन कर लिया। उनकी पार्टी ने चुनाव के उम्मीदवार भी उतारे। हालांकि, वर्ष 2022 में चाचा-भतीजा एक हो गए। दोनों एक भले हो गए हैं, लेकिन अंदर ही अंदर मनभेद की बातें सामने आती रहती हैं।

बहुजन समाज पार्टी में भी हुआ विवाद

बहुजन समाज पार्टी को कॉडर आधारित पार्टी कहा जाता है। कांशीराम के बाद बसपा की विरासत मायावती को मिली। कुछ समय पहले यही माना जाता था कि मायावती की विरासत उन्हीं के किसी कार्यकर्ता या नेता को मिलेगी, लेकिन उन्होंने भतीजे आकाश आनंद को पार्टी में उच्च पद पर नियुक्त कर उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।

हालांकि, भतीजे को मायावती कई बार पार्टी से बाहर कर चुकी हैं। उसका डिमोशन कर चुकी हैं। अब मान मनौव्वल के बाद आकाश आनंद फिर से पार्टी में नंबर दो की पोजीशन पर पहुंच चुके हैं।

गांधी परिवार

देश के प्रथम राजनीतिक परिवार यानी कांग्रेस के गांधी परिवार के विषय में तो सब जानते हैं। जब पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जीवित थीं, तब उनकी राजनीतिक विरासत पर छोटे पुत्र संजय गांधी अपना हक जताते थे, लेकिन एक विमान दुर्घटना में संजय गांधी के निधन और उसके बाद इंदिरा गांधी की हत्या के बाद ज्येष्ठ पुत्र राजीव गांधी ने परिवार की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया।

संजय गांधी की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी मेनका गांधी व पुत्र वरुण गांधी कभी खुद को कांग्रेस से जोड़ नहीं पाए। मेनका गांधी और वरुण गांधी, दोनों भारतीय जनता पार्टी से सांसद बन चुके हैं। अब दोनों ही नेपथ्य में जा चुके हैं। दोनों कभी कांग्रेस में शामिल होंगे या गांधी परिवार कभी एक रूप से राजनीति को आगे बढ़ाएगा, इसकी संभावना भी नजर नहीं आती है।

सिंधिया परिवार

देश में और भी कई बड़े राजनीतिक परिवार हैं, जिनमें राजनीतिक मनभेद रहे हैं। मध्य प्रदेश के सिंधिया परिवार को सब जानते हैं। विजयराजे सिंधिया जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी की सदस्य रहीं, लेकिन उनके पुत्र माधवराव सिंधिया ने कांग्रेस का दामन थामा। माधवराव सिंधिया की बहनें वसुंधरा राजे और यशोदा राजे भाजपा में हैं।

माधवराव सिंधिया के पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी कांग्रेस से राजनीति की शुरुआत की। हालांकि, बाद में वो भी भाजपा में शामिल हो गए और अब केंद्रीय मंत्री हैं। मध्य प्रदेश का ही दिग्विजय सिंह का परिवार एक समय दो दलों में बंटा हुआ था। दिग्विजय सिंह, जो मध्य प्रदेश के दो बार मुख्यमंत्री रहे हैं, के छोटे भाई लक्ष्मण सिंह भारतीय जनता पार्टी के सांसद रहे हैं। वैसे, अब दोनों ही भाई अब एक ही विचारधारा के साथ हो लिए हैं।

खैर, लालू प्रसाद यादव के ज्येष्ठ पुत्र तेज प्रताप यादव कब तक पार्टी और परिवार से बाहर रहेंगे, यह देखना दिलचस्प होगा। उम्मीद यही है कि विधानसभा चुनाव तक परिवार का यह मनभेद जारी रहेगा। चुनाव के बाद तेज प्रताप यादव की धूम धड़ाके से न केवल परिवार, बल्कि पार्टी में भी वापसी हो जाएगी। अमूमन यही देखा गया है कि राजनीतिक नफा-नुकसान देखकर राजनीतिक परिवार कुछ समय के लिए इधर-उधर होते हैं और बाद में वो एक ही नाव पर सवार हो जाते हैं।



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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