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कुरुक्षेत्र: प्रधानमंत्री की अपील यानी राज मर्यादा की लक्ष्मण रेखा, कोरोना प्रोटोकॉल पर भी जारी है सियासी खींचतान

Wed, 21 Apr 2021 02:14 PM IST
विनोद अग्निहोत्री अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

राजनीतिक दलों ने विधानसभा चुनावों में सारे कोरोना रोकथाम नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए अंधाधुंध चुनाव प्रचार किया और चुनाव आयोग अपने ही नियमों और दिशा निर्देशों का भरे दरबार चीर हरण होते देख धृतराष्ट्र की तरह नेत्रविहीन और भीष्म पितामह व गुरु द्रोण की तरह जड़ बना रहा...
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पीएम मोदी की रैली - फोटो : अमर उजाला (फाइल)
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विस्तार
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को देश को संबोधित करते हुए कोरोना संक्रमण के दूसरे हमले के प्रति बेहद चिंता जताते हुए लोगों से कोरोना प्रतिबंधों और नियमों के कड़ाई और ईमानदारी से पालन करने की अपील करते हुए बच्चों को विशेष जिम्मेदारी दी कि वह अपने घरों में बड़ों को ऐसा करने को बाध्य करें। साथ ही, उन्होंने रामनवमी और रमजान का जिक्र करते हुए भगवान श्रीराम की मर्यादा पालन की शिक्षा और रमजान के संयम की भी याद दिलाई। प्रधानमंत्री मोदी देश के सर्वोच्च और सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं और उम्मीद है कि लोग उनकी अपील पर ध्यान देकर अपने व्यवहार को कोरोना संकट काल की जरुरतों के मुताबिक नियमित और मर्यादित रखेंगे। प्रधानमंत्री की यह अपील जन साधारण के साथ-साथ उन तमाम राजनीतिक दलों, उनके नेताओं, धर्माचार्यों और मजहबी नेताओं पर भी लागू होती है, जिन्होंने पिछले कई महीनों से कोरोना प्रोटोकॉल की सारी मर्यादाओं को ताक पर रख हुआ था। प्रधानमंत्री मोदी ने एक तरह से कोरोना संकट काल में राज मर्यादा की रेखा खींची है जिसका अनुपालन देश के सर्वोच्च स्तर से लेकर आम जन तक को करना होगा। लेकिन अगर यह काम पहले हो गया होता तो बहुत लोगों को असमय मरने से या अस्पतालों में गंभीर रूप से बीमार होकर भर्ती होने या घरों में बीमार होकर बंद रहने से बचाया जा सकता था। विपक्ष ने प्रधानमंत्री पर दोहरे रवैये का आरोप लगाते हुए अपने भाषण को सबसे पहले अपने और अपने दल के नेताओं पर उतारने को कहा है। कुल मिलाकर कोरोना प्रोटोकॉल पर भी सियासी खींचतान शुरू हो गई है।

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दोहरे मानदंडों वाले हमारे देश में हाल ही में ओटीटी प्लेटफार्म पर एक फिल्म आई है मैडम चीफ मिनिस्टर। इस फिल्म में उत्तर प्रदेश की राजनीति पर एक बेहद जबर्दस्त संवाद है कि इस प्रदेश में जो मेट्रो बनवाता है वह चुनाव हार जाता है और जो मंदिर बनवाता है वह जीत जाता है। मुझे लगता है कि हाल के वर्षों में किसी फिल्म का यह सर्वाधिक असरकारी यथार्थपरक संवाद है जो सिर्फ उत्तर प्रदेश पर ही नहीं बल्कि देश की राजनीति पर भी लागू होता है, जहां हर चुनाव भावनात्मक मुद्दों पर जीता जाता है और मंदिर-मस्जिद जात-पात पर बंटकर वोट दिए जाते हैं और जब कोरोना महामारी जैसा संकट आता है तो हम अस्पताल डाक्टर दवा ऑक्सीजन एंबुलेंस और चिकित्सा सुविधाओं की किल्लत से परेशान इधर-उधर भटकते हैं। कोरोना संकट ने हमको आईना दिखाया है कि देखो ये तुम हो, ये तुम्हारी राजनीति है, ये तुम्हारे नेता हैं और ये है तुम्हारा धर्म।



करीब एक साल बाद देश एक बार फिर कोविड-19 के भयंकर संक्रमण की चपेट में आ गया। वर्ष 2020 में फरवरी-मार्च में आए कोरोना के संक्रमण के बाद हुए लॉकडाउन के संकट से लोग धीरे-धीरे उबर रहे थे और देश की गाड़ी पटरी पर आने लगी थी, कि अचानक फिर कोविड़ संक्रमण का दूसरा दौर शुरू हो गया। इस बार इस वैश्विक महामारी का संक्रमण इतना तेज है कि जहां पहले सैकड़ों से शुरू होकर कुछ हजार तक के मामले प्रतिदिन आते थे वहीं अब प्रतिदिन यह संख्या लाखों में आने लगी। मुंबई, दिल्ली, लखनऊ, अहमदाबाद, भोपाल, इंदौर जैसे शहरों में चिकित्सा व्यवस्था चरमरा गई। अस्पतालों में लंबी लाइनें और कोविड संक्रमितों के लिए बेड के भारी किल्लत से लोगों को जूझना पड़ा है।

सरकार ने बड़े जोर-शोर से कोरोना टीकाकरण की शुरुआत की थी, लेकिन पर्याप्त मात्रा में टीकों की आपूर्ति न हो पाने से कई शहरों में टीकाकरण केंद्रों में ताले पड़ गए। गंभीर रूप से कोरोना पीड़ितों को दी जाने वाली दवा रेमेडिसविर का पूरे देश में अकाल हो गया और सबसे ज्यादा जरूरी ऑक्सीजन की अस्पतालों में भारी किल्लत हो गई। कोविड संक्रमितों के सही आंकड़ों को लेकर हर राज्य की सरकार सवालों के घेरे में आ गई। कोरोना जांच आरटीपीसीआर टेस्ट के लिए भी लंबी प्रतीक्षा सूची और हफ्तों तक जांच रिपोर्ट नहीं आ पाने की वजह संक्रमितों का सही आंकड़ा मिलना ही नामुमकिन हो गया। हवा में भी इस गंभीर बीमारी के वायरस फैलने की डरावनी खबरें भी आने लगीं।

सबसे भयावह दृश्य श्मशान घाटों, शवदाह गृहों और कब्रिस्तानों में दिखे जहां शवों के अंतिम संस्कार के लिए भी लंबी लाइनें लगी दिखाई दीं। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनाव क्षेत्र वाराणसी की हालत भी इतनी खराब हो गई कि खुद प्रधानमंत्री को वहां की व्यवस्था के लिए समीक्षा बैठक लेनी पड़ी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव समेत कई राजनेता और बॉलीवुड, क्रिकेट, साहित्य जगत की हस्तियां भी कोरोना संक्रमित हो गईं।

लेकिन दूसरी तरफ इसी कोविड के दूसरे संक्रमण काल में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव, उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव और हरिद्वार में कुंभ जैसे आयोजन भी बदस्तूर जारी रहे। इनमें हजारों और लाखों लोगों ने बिना किसी भौतिक सामाजिक दूरी के, बिना मास्क के, बिना सैनिटाइजर के सारे कोरोना प्रतिबंधों को धता बताते हुए हिस्सा लिया। करीब 35 लाख से ज्यादा लोगों ने कुंभ के दो शाही स्नानों में हिस्सा लिया जिनकी भीड़ भरी तस्वीरें सोशल मीडिया और मीडिया में सबने देखी। पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुद्दुचेरी के विधानसभा चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, कांग्रेस नेता राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, तृणमूल नेता ममता बनर्जी समेत सभी दलों के बड़े छोटे नेताओं की भीड़ भरी चुनावी सभाएं, रोड शो भी खूब हुए। कहीं भी कोरोना प्रतिबंधों और चुनाव आयोग के दिशा निर्देशों का कोई पालन नहीं दिखा। उधर कोरोना संक्रमण जैसे-जैसे भयावह रूप लेता रहा, उधर वैसे वैसे नेताओं के चुनावी कार्यक्रम सारे प्रतिबंधों को तोड़कर आगे बढ़ते रहे।

ऐसा लगा कि द्वापर में भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र में अर्जुन को बिना किसी मोह माया के निर्विकार भाव से परिणाम की चिंता किए बिना अपने कर्म पथ पर डटे रहने और आलोचनाओं से विचलित न होने का जो उपदेश दिया था उसे अर्जुन की तरह या उससे भी ज्यादा हमारे राजनेताओं ने किस तरह आत्मसात किया है, यह कोविड संक्रमण के संकटकाल में सामने आ गया है। जिस तरह कोरोना महामारी के दूसरे संक्रमण की परवाह किए बिना राजनीतिक दलों ने प. बंगाल समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में सारे कोरोना रोकथाम नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए अंधाधुंध चुनाव प्रचार किया और चुनाव आयोग अपने ही नियमों और दिशा निर्देशों का भरे दरबार चीर हरण होते देख धृतराष्ट्र की तरह नेत्रविहीन और भीष्म पितामह व गुरु द्रोण की तरह जड़ बना रहा।

सभी दलों के नेताओं ने हजारों की भीड़ भरी चुनावी सभाएं और रोड शो किए और उन्होंने न खुद मास्क लगाया न जनता के मास्क न लगाने की परवाह की गई। यानी नेता अपने राजनीतिक कर्तव्य का पूरी निष्ठा और ईमानदारी से पालन करते रहे और उन्होंने इसकी कोई परवाह नहीं की कि उनके इस कर्मयोग से अगर बीमारी फैलती है और लोगों की जान जाती है तो जाए क्योंकि गीता में श्रीकृष्ण ने यही तो कहा है कि आत्मा तो अजर अमर है। उसे न कोई मार सकता है और न कोई उसका सृजन कर सकता है। आत्मा को किसी शस्त्र से मारा नहीं जा सकता। आग उसे जला नहीं सकती। पानी उसे गला नहीं सकता और वायु उसे सुखा नहीं सकती। जबकि शरीर नश्वर है। इसे तो एक दिन नष्ट होना ही है। इसलिए कोरोना का क्या रोना। शायद भारतीय राजनीति के लिए गीता सार का यह आधुनिक विद्रूप रूप है।

पिछले एक साल से कोरोना का दंश झेल रहे भारत में इस महामारी ने कई बड़े सवाल भी खड़े किए और कई चेहरों को बेनकाब भी किया। कोरोना को लेकर भारतीय राजनीति कितने आडंबर, पाखंड और दोहरे मानदंडों वाली है ये भी शीशे की तरह साफ हो गया। एक वैश्विक महामारी जिसके आने की आहट वर्ष 2019 के आखिरी महीनों में ही होने लगती है और वर्ष 2020 के पहले महीने के आखिर में भारत में कोरोना का पहला मामला केरल में सामने आ जाता है। लेकिन भारत सरकार सिर्फ एहतियात के तौर पर इतना करती है कि चीन से आने वाली उड़ानों के यात्रियों की हवाई अड्डों पर जांच करने का आदेश देती है। विपक्षी दल कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी कोरोना संकट की ओर ध्यान दिलाने के लिए अपना पहला ट्वीट 31 जनवरी 2020 को करते हैं, लेकिन उसे सत्ता प्रतिष्ठान और उससे जुड़े संगठन हंसी में उड़ा देते हैं। इसके बाद राहुल गांधी ने लगातार 23 मार्च तक कोरोना की भयावहता और उसकी तैयारियों को लेकर ट्वीट करके सरकार का ध्यान दिलाने की कोशिश की। लेकिन सरकार और सरकार परस्त लोगों ने राहुल की इन चेतावनियों को अपने 'पप्पू' नाद के शोर में दबा दिया। जनवरी में बजी खतरे की घंटी को सुनने की बजाय देश की ऊर्जा सरकार की शक्ति अहमदाबाद में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के स्वागत और 'नमस्ते ट्रंप' समारोह की तैयारियों में खर्च होती रही और फरवरी मार्च में मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकार गिराने का राजनीतिक षड़यंत्र जारी रहा। न किसी को कोविड संक्रमण की चिंता थी और न ही उस खतरे से निपटने की कोई ठोस कार्ययोजना बनी।

यहां तक कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने तो राहुल गांधी के ट्वीटों का जवाब देते हुए राहुल और गांधी परिवार पर देश में सनसनी फैलाने का आरोप लगाते हुए यह भी कहा किसी भी तरह की मेडिकल आपातस्थिति नहीं है। लेकिन जल्दी ही वो सच जिसे सत्ता के लालकालीन के नीचे छिपाया नहीं जा सकता था सामने आ गया। मध्य मार्च से हालत जब ज्यादा बिगड़ने शुरू हुए तब सत्ता प्रतिष्ठान की कुंभकर्णी नींद टूटी। आनन-फानन में अंतर्राष्ट्रीय उड़ानों पर तब पाबंदी लगाई गई जबकि हजारों लाखों लोग विभिन्न कोविड संक्रमित देशों से भारत के विभिन्न शहरों और इलाकों में इस संक्रमण के साथ पहुंच चुके थे। फिर 22 मार्च को एक दिन का जनता कर्फ्यू और 24 मार्च से देशभर में एक महीने का लॉकडाउन लागू किया गया। इस अचानक फैसले ने लाखों प्रवासी मजदूरों और अन्य लोगों को अपने अपने ठिकाने छोड़कर सड़कों रेल की पटरियों और खेतों के रास्ते हजारों किलोमीटर पैदल चलकर अपने गावों की ओर लौटने को मजबूर कर दिया। आजाद हिंदुस्तान में बंटवारे के बाद इतने बड़े पैमाने पर आबादी का स्थानांतरण पहली बार देखने को मिला। फिर लॉकडाउन की अवधि लगातार बढ़ती गई। सरकार इस बीच नए-नए कदम उठाती रही। कोविड संक्रमण की हालत भी बिगड़ती चली गई और 2020 का पूरा साल लॉकडाउन और अनलॉक की कवायद के बीच गुजर गया।

लेकिन इस बीच देश ने बहुत कुछ सीखा। हमने ये सीखा कि कैसे आपदा को अवसर में बदला जा सकता है जब कोरोना के संकट काल के बीच अचानक वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पहले कोविड राहत पैकेज के नाम पर कृषि क्षेत्र में तीन बड़े सुधारों का एलान करती हैं। फिर सरकार आनन-फानन में अध्यादेश लाकर इन्हें लागू करती है और फिर संसद का सत्र बुलाकर तीनों अध्यादेशों को विधेयक की शक्ल में पारित कराकर कानून बना दिया जाता है। उसके बाद जब लाखों किसान दिल्ली आकर बेमियादी धरना देते हैं तो उनकी कोई परवाह नहीं की जाती।

देश ने यह भी देखा कि कैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर पूरा देश कोराना योद्दाओं का मनोबल बढ़ाने के लिए शाम पांच बजे अपने घरों के बाहर, छतों पर, छज्जों पर खड़े होकर थाली और ताली बजाता है। फिर प्रधानमंत्री के आह्वान पर रात नौ बजे पूरा देश मोमबत्ती या मोबाईल फोन या टार्च की रोशनी करके कोरोना के खिलाफ चल रही जंग में अपने समर्थन का एलान करता है। सेना के तीनों अंगों ने भी स्वास्थ्य सेवाओं और चिकित्सा कर्मियों के योगदान की सराहना करते हुए बैंड बाजों युद्धपोतों पर रोशनी और आकाश से पुष्प वर्षा करके सलामी दी। एक तरह से देश ने कोरोना त्रासदी को एक बड़े आयोजन या उत्सव में बदलते देखा।

कोरोना काल में ही पांच अगस्त 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का भूमि पूजन भी किया। हालांकि द्वारिका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती, कल्कि पीठाधीश्वर आचार्य प्रमोद कृष्णम, ज्योतिषाचार्य आचार्य राजीव नारायण शर्मा समेत अनेक धर्माचार्यों और ज्योतिष विद्वानों ने देव शयनकाल में भूमि पूजन को उपयुक्त नही माना। चतुर्मास काल के कारण चारों शंकराचार्य भी भूमि पूजन में अनुपस्थित रहे या उन्हें बुलाया नही गया, इस पर विवाद है। अगस्त तक आते-आते कोरोना का कहर धीमा हुआ और देश में कामकाज पटरी पर आ गया। उद्योग पूरी तरह चालू हो गए। कार्यालयों में काम शुरू हो गया।

अक्टूबर तक तो लगा कि देश कोरोना मुक्त हो गया है। क्योंकि अक्टूबर में देश ने कोरोना काल में ही बिहार विधानसभा चुनाव और मध्य प्रदेश में 28 विधानसभा सीटों के उपचुनाव भी देखे जिनमें कोरोना की रोकथाम के सारे नियमों और प्रतिबंधों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई गईं। सत्ताधारी दल से लेकर विपक्ष तक और प्रधानमंत्री गृह मंत्री से लेकर विपक्षी नेताओं तक सबने इसमें एक दूसरे को मात दी। जनता भी आश्वस्त हो गई कि अब कोरोना विदाई ले रहा है और दम तोड़ रहा है। रेल यातायात, हवाई यातायात, सड़क मार्ग सब सामान्य हो गए। लोग एक दूसरे के यहां आने जाने लगे। मास्क उतर गए। सैनिटाइजर घरों में दिखावे के लिए रह गए। शादी ब्याह, म़ॉल, सिनेमा हॉल, पार्टियां सबकी रौनक लौटने लगी। लोग हाथ मिलाने लगे, गले लगने लगे और कोरोना मजाक का विषय हो गया।

रही सही कसर कोरोना के टीके ने पूरी कर दी। अमेरिकी फाइजर और रूसी स्पूतनिक व चीनी टीके के बाद भारत के कोविशील्ड और कोवैक्सीन ने दुनिया में भारत की धाक जमा दी। वैज्ञानिकों की सराहना के साथ साथ देश के राजनीतिक नेतृत्व की दूरदर्शिता, प्रबंधन और क्षमता का डंका बजने लगा। सत्ताधारी दल ने कोरोना की लगभग पराजय की घोषणा करते हुए इसके लिए सारा श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिया जिनके कुशल नेतृत्व में देश ने न सिर्फ कोरोना संक्रमण का प्रसार रोकने में सफलता पाई बल्कि कोरोना टीका बना कर टीकाकरण की शुरुआत भी कर दी। वैश्विक स्तर पर भारत और मोदी की छवि तब और निखर गई जब भारत सरकार ने टीका कूटनीति के तहत लगभग छह करोड़ टीका इकाईयां कई देशों को निर्यात कीं। लेकिन जब देश में टीके की कमी हो गई और टीकाकरण कमजोर पड़ने लगा तो विपक्ष ने मोदी सरकार की टीका कूटनीति पर सवाल उठाया तो सत्ता पक्ष ने अपने बचाव में भारत की सनातन संस्कृति के मूल मंत्र वसुधैव कुटुंबकम का हवाला देते हुए विपक्ष को ही कठघरे में खड़ा कर दिया।

खुशफहमी के इसी दौर में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की घोषणा भी हो गई। चुनाव कार्यक्रम भी आ गया और सारे दल चुनाव प्रचार में कूद पड़े। न चुनाव आयोग के दिशा निर्देशों की परवाह और न ही कोरोना संक्रमण का डर। जिसकी जितनी बड़ी हैसियत थी उसने उतने ही बड़े स्तर पर कोरोना नियमों और पाबंदियों की धज्जियां उड़ाईं। देश के जिन कर्णधारों पर जनता को रास्ता दिखाने और एक उदाहरण पेश करने की जिम्मेदारी थी, उन्होंने सबसे ज्यादा रैलियां और रोड शो किए जिनमें न मास्क दिखे और न ही भौतिक सामाजिक दूरी। रही सही कसर हरिद्वार कुंभ ने पूरी कर दी। पहली बात तो यह कि जो कुंभ हर 12 वर्ष के अंतराल के बाद होता है, इस बार 11 साल के अंतराल पर क्यों आयोजित हुआ इसका कोई ठोस आधार सामने नहीं आया। हालांकि कुछ ज्योतिषियों ने अपनी काल गणना के आधार पर इसका औचित्य ठहराने की कोशिश की है, लेकिन दूसरी तरफ जाने माने ज्यातिषाचार्य़ आचार्य राजीव नारायण शर्मा ने 11 साल में कुंभ आयोजित करने को शास्त्र विरुद्ध बताते हुए इसके कुप्रभावों की भविष्यवाणी सोशल मीडिया और कुछ समाचार साइटों पर पहले ही कर दी थी। अब वह मंजर सबके सामने है जब बीच में ही प्रधानमंत्री मोदी को कुंभ के शेष स्नान को प्रतीकात्मक बनाने की अपील करनी पड़ी और अखाड़ों ने वैसा ही किया। लेकिन कुंभ में हुए दो शाही स्नानों में शामिल लाखों लोगों में जितने भी कोरोना संक्रमण से ग्रस्त हुए हो जब वो अपने अपने घरों शहरों और गावों को लौटे तो दूसरों को संक्रमित नहीं किया इसकी क्या गारंटी है। जबकि पिछली बार जब दिल्ली में मरकज के करीब डेढ़ से दो हजार जमातियों को कोविड संक्रमित पाया गया तो पूरे देश में मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए उसे कोरोना बम की तरह प्रचारित और प्रसारित किया गया। और अब अगर लाखों श्रद्धालु कुंभ से वापस देश के विभिन्न हिस्सों में गए हैं और उनमें से एक प्रतिशत भी अगर कोरोना संक्रमित हुए तो उसे क्या कहा जाएगा।

कुंभ को प्रतीकात्मक बनाने की प्रधानमंत्री की अपील को मानते हुए साधुओं ने यह सवाल भी दागा कि क्या इसी तरह प. बंगाल में राजनीतिक दल अपनी चुनावी रैलियों और रोड शो को भी प्रतीकात्मक बनाएंगे। सत्ताधारी दल की तरफ से इस सवाल पर कहा गया कि बंगाल में भाजपा का चुनाव प्रचार और रैलियां पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के मुताबिक ही होंगी। लेकिन राहुल गांधी ने जरूर बंगाल में अपने सारे चुनावी कार्यक्रम रद्द करके अन्य दलों से भी एसा करने की अपील की। राहुल की इस घोषणा का सोशल मीडिया पर यह कह कर मजाक उड़ाया गया है कि कांग्रेस बंगाल में खेल में पहले से ही बाहर है। लेकिन जब ममता बनर्जी ने अपनी बड़ी चुनावी रैलियों को रद्द करने की घोषणा की तब भाजपा पर भी दबाव बना और आखिरकार पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने भी एलान किया कि भाजपा भी बंगाल में सिर्फ छोटी चुनाव सभाएं ही करेगी, जिनमें कोरोना प्रोटोकॉल का पूरी तरह पालन करते हुए पांच सौ से ज्यादा लोग नहीं होंगे। लेकिन राजनीतिक दलों ने ये फैसले इतनी देर से लिए कि बंगाल में कोरोना संक्रमण को फिर से पांव फैलाने का पूरा मौका मिल गया।

भले ही सरकार और प्रधानमंत्री प्रचार माध्यमों में कोरोना प्रतिबंधों में ढिलाई न बरतने की सलाह और सुझाव देते रहे लेकिन ढिलाई जनता से भी हुई और नेताओं से भी। कोरोना संक्रमण को नए रूप में देश में फैलने का अवसर मिल गया या कहा जाए कि अवसर दिया गया। जैसे पिछले साल अंतर्राष्ट्रीय उड़ानों को 20 मार्च तक चलने देने देकर कोरोना को बिना वीज़ा और पासपोर्ट के भारत में निर्बाध आने दिया गया था, उसी तरह इस बार कोरोना के नए रूप को फलने फूलने के लिए जमकर खाद पानी दिया गया। नतीजा सामने है कि पहले जहां देशभर में कोरोना संक्रमण के मामले प्रतिदिन कुछ सैकड़ों से शुरू होकर कुछ हजार तक पहुंचे थे, वहीं अब रोजाना यह मामले लाखों में पहुंच रहे हैं।

कोरोना के दूसरे हमले ने केंद्र और सभी राज्य सरकारों के उन दावों और इंतजामों की भी पोल खोल दी जो पिछले साल कोविड काल में सरकारी प्रचार तंत्र द्वारा किये जा रहे थे। किसी भी राज्य किसी भी शहर में अस्पतालों में बेड न मिलना, कोरोना की दवाई का अकाल, ऑक्सीजन का भीषण संकट बताता है कि चाहे उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्यप्रदेश, हरियाणा, असम, बिहार जैसे भाजपा और एनडीए शासित राज्य हों या महाराष्ट्र, दिल्ली, छत्तीसगढ़, राजस्थान, पंजाब, प. बंगाल जैसे गैर भाजपा शासित राज्य हों, हालात सब जगह लगभग एक जैसे हैं। इसका मतलब न तो केंद्र ने और न ही राज्यों ने अपने अपने क्षेत्राधिकार में चिकित्सा सुविधाओं में वृद्धि का कोई सार्थक प्रयास नहीं किया। सारा जोर मास्क और सैनिटाइजर का कारोबार बढ़ाने पर दिया गया न कि अस्पतालों में बेड बढ़ाने, टीकाकरण तेज करने और ज्यादा ज्यादा वयस्कों को टीकाकरण के दायरे में लाने, कोरोना की दवाईयों की उपलब्धता बढ़ाने और ज्यादा ऑक्सीजन प्लांट लगाने पर दिया गया।

ऐसा नहीं है कि कोरोना की यह दूसरी लहर सिर्फ भारत में आई। अमेरिका, ब्राजील, कनाडा और यूरोप के कई देश भी इसके शिकार हुए, लेकिन जितनी तबाही इन देशों में पिछले साल कोरोना संक्रमण की पहली लहर में हुई थी, उतनी इस बार नहीं दिखाई दी। क्योंकि इन देशों की सरकारों ने नारे भाषण और वाहवाही लूटने की जगह अपना पूरा ध्यान कोरोना की रोकथाम करने वाले आवश्यक चिकित्सा तंत्र और टीकाकरण पर लगाया। नतीजा ये देश तो संभल गए हैं, लेकिन भारत पूरी दुनिया में दया और हंसी का पात्र बन गया।
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कोरोना संकट से एक बड़ा सवाल यह भी खड़ा होता है कि आखिर हमारे राजनीतिक दल कब बुनियादी मुद्दों यानी स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा को राजनीति का केंद्र बिंदु बनाकर राजनीति करेंगे। और साथ ही यह सवाल सिर्फ राजनीतिक दलों और उनके नेताओं से ही नहीं बल्कि जनता से भी है कब तक लोग भावनात्मक मुददों पर बहते हुए अपने राजनीतिक फैसले लेते रहेंगे। कभी मंदिर मस्जिद तो कभी जातीय और क्षेत्रीय अस्मिता तो कभी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण तो कभी राष्ट्रवाद के नाम पर भावनाओं का ज्वार भड़का कर चुनाव लड़े जाते हैं और जीते जाते हैं। जातीय समीकरण, जिताऊ उम्मीदवार और मजबूत नेता के नाम पर लोग इस कदर बंटते हुए वोट बैंक बन गए हैं कि सियासी दलों को अब इसकी चिंता ही नहीं रही कि जनता को ज्यादा से ज्यादा तादाद में अस्पताल, दवाखाने, डाक्टर, दवाएं, स्कूल, कालेज, विश्वविद्यालय, इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज, सड़कें, पुल, और दूसरी बुनियादी सुविधाएं चाहिए। सियासी दलों को इसकी भी चिंता नहीं रहती है कि महिलाएं और उनका सम्मान सुरक्षित है या नहीं। नौजवानों को उनकी शिक्षा और योग्यता के मुताबिक रोजगार उपलब्ध है या नहीं। गुंडे-बदमाश और माफिया प्रशासन पर हावी हैं या प्रशासन उन पर। क्योंकि नेताओं और राजनीतिक दलों को पता है कि जब चुनाव आएगा तो कभी मंदिर बनाने या मस्जिद बचाने के नाम पर वोटों की फसल काट ली जाएगी। या जातीय स्वाभिमान और हिस्सेदारी का नारा देकर अपना सियासी उल्लू सीधा किया जा सकेगा। या फिर पड़ोसी मुल्क को निशाना बनाकर सेना को आगे करके राष्ट्रवाद का ज्वार पैदा करके चुनाव जीता जा सकेगा। क्योंकि लोग चुनाव के वक्त नागरिक या मतदाता के रूप में नहीं हिंदू-मुस्लिम, सवर्ण, दलित, पिछड़े, बहुसंख्यक अल्पसंख्यक बनकर वोट डालते हैं।

साढ़े चार साल तक भले ही किसान अपने अधिकारों के लिए सडकों पर उतरे, मजदूर हड़ताल करें, नौजवान प्रदर्शन करें, महिलाएं मोमबत्ती और मशाल जुलूस निकाले, व्यापारी बाजार बंद करें, ट्रांसपोर्टर सड़क जाम करें लेकिन जब चुनाव आएंगे तो वो अपने वर्गीय हितों के ऊपर अपनी सांप्रदायिक कट्टरता और जातीय सोच को तरजीह देंगे। इसलिए अगर कोरोना संक्रमण के हमले के वक्त अस्पतालों में मरीजों के लिए बेड और डाक्टर नहीं हैं, दवाखानों में दवाएं नहीं हैं, ऑक्सीजन की किल्लत है और जांच का इंतजाम नहीं है और श्मशानों व कब्रिस्तानों में लंबी लाइने हैं तो यह सवाल उठता है कि जब लोग इन बुनियादी सुविधाओं के लिए वोट ही नहीं देते तो राजनीतिक दलों की प्राथमिकता में ये बुनियादी सुविधाएं क्यों हों। जिस दिन से देश और प्रदेश के लोग स्वास्थ्य शिक्षा सुरक्षा और सम्मान से जीने के हक को अपने जातीय और सांप्रदायिक आग्रहों से ज्यादा और ऊपर तरजीह देने लगेंगे तब हमारी सरकारों और उन्हें चलाने वाले नेताओं को इनकी चिंता होगी। उनकी प्राथमिकताएं बदलेंगी और तब कोरोना या किसी भी ऐसी महामारी के वक्त अस्पतालों के बाहर लंबी लाइनें नहीं लगेंगी। दवाओं और आक्सीजन की किल्लत नहीं होगी। युवाओं को रोजगार के लिए दर-दर भटकना नहीं पड़ेगा। कोरोना की अव्यवस्था ने अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की मजबूत राजनीतिक सत्ता उखाड़ दी। क्या भारत में इस संकट के लिए जिम्मेदार व्यवस्था और उसके कर्णधारों को समय आने पर सबक सिखा पाएंगे या फिर किसी भावनात्मक मुद्दे से पैदा होने वाली आंधी में बहकर उन्हें और मजबूत कर देंगे। यह एक यक्ष प्रश्न है जो कोरोना काल के संकट में लोगों के दिलो दिमाग में उठना चाहिए।
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