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कुरुक्षेत्रः अमेरिका को तो उसकी संस्थाओं ने बचा लिया बाकी देश अपनी चिंता करें

सार

भीड़ के हिंसक और अराजक होने का दौर भारत में 1967 में प. बंगाल से शुरू हुए हथियारबंद नक्सलवादी आंदोलन से शुरू हुआ जब वर्ग शत्रु के सफाए के नाम पर हथियारबंद वामपंथी नक्सलवादियों ने जन अदालतें लगाकर कथित सामंतों और अत्याचारी वर्ग शत्रुओं को त्वरित न्याय के नाम पर उन्हें गावों में भीड़ के द्वारा दंडित करवाना शुरू किया...
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USA Capitol building - फोटो : PTI (File Photo)
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विस्तार
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छह जनवरी 2021 को संयुक्त राज्य अमेरिका में जो कुछ भी हुआ, वह न सिर्फ अमेरिका बल्कि भारत सहित पूरी दुनिया के लोकतांत्रिक देशों के लिए एक चुनौती और सबक दोनों है। चुनौती इसलिए कि पिछले करीब एक दशक से दुनिया में सोशल मीडिया के जरिए जो माहौल बनाया गया है वह अब नेताओँ और उनकी विचारधारा के समर्थकों को अराजक और हिंसक भीड़ में तब्दील करता जा रहा है और अगर इस प्रवृत्ति पर कारगर रोक नहीं लगाई गई तो जो अब अमेरिका में हुआ है वह कल कई और लोकतांत्रिक देशों में भी देखने को मिल सकता है।

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सबक इसलिए कि वाशिंगटन में अमेरिकी कांग्रेस के परिसर और उसके दोनों सदनों (हाउस ऑफ रिप्रेजेन्टेटिव और सीनेट) के भवनों के भीतर घुसकर ट्रंप समर्थक हिंसक भीड़ ने अमेरिकी लोकतंत्र पर जो कालिख पोती है, देश को उससे शर्मसार होने से आधुनिक विश्व के सबसे पुराने लोकतंत्र की मजबूत संस्थाओं ने तो बचा लिया। लेकिन क्या दुनिया के दूसरे देशों की संस्थाएं इतनी मजबूत और रीढ़युक्त हैं कि ऐसा कोई दुर्भाग्यपूर्ण मौका अपने यहां आने पर मजबूती से बिना किसी दबाव में आए वही करेंगी, जो संविधान और न्याय सम्मत हो।

अमेरिका की लोकतांत्रिक परंपराओं एवं मूल्यों से पूरी दुनिया लोकतंत्र की प्रेरणा लेती है। भारतीय संविधान निर्माताओं ने भी देश में ब्रिटिश संसदीय प्रणाली पर आधारित संसदीय लोकतंत्र के साथ-साथ अमेरिकी संविधान और संस्थाओं से भी काफी कुछ लिया है। मसलन अमेरिकी संघीय व्यवस्था, स्वतंत्र सर्वोच्च न्यायालय, विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के बीच अधिकारों, कर्तव्यों के विभाजन की सीमा रेखा, अमेरिकी सीनेट की ही तरह भारतीय संघ के राज्यों का प्रतिनिधि करने वाली राज्यसभा (उच्च सदन) और मौलिक अधिकारों की अवधारणा अमेरिकी व्यवस्था से ही हमने ली हैं। इसका लाभ भी भारत को मिलता रहा है और भारतीय लोकतंत्र दुनिया के लिए एक मिसाल बन गया है।

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भारतीय लोकतंत्र की मजबूती का असर उसके पड़ोसियों पर भी पड़ा और पड़ोसी नेपाल व बांग्लादेश में लोकतंत्र की जड़ें मजबूत हुई। साथ ही, कई बार सैनिक तानाशाही का शिकार रह चुके पाकिस्तान में भी न सिर्फ लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल हुई बल्कि आगे भी बढ़ी है। लेकिन दूसरी तरफ पिछले करीब एक दशक से इंटरनेट के जरिए सोशल मीडिया के प्रसार ने लोकतंत्र के सामने नई चुनौती भी खड़ी कर दी है। सोशल मीडिया एक ऐसा बेलगाम हथियार बन गया है, जिसके जरिए राजनीतिक दलों ने भावनात्मक मुद्दों और सवालों को बुनियादी मुद्दों से ज्यादा बड़ा और प्रभावी बना दिया है।

नेताओं के छवि निर्माण से लेकर सामाजिक तनाव, इतिहास के हिसाब चुकाने और गड़े मुर्दे उखाड़कर उन्हें ज्वलंत सवालों के ऊपर बैठाने में अलग-अलग देशों में उन तमाम ताकतों को कामयाबी मिली, जो लोकतंत्र को भीड़तंत्र में बदलना चाहते हैं। तमाम देशों के ताकतवर और लोकप्रिय नेताओं ने सोशल मीडिया का इस्तेमाल अपनी निजी अवतारनुमा छवि निर्माण के लिए जबरदस्त तरीके से किया और अपने समर्थकों को यह अंध विश्वास दिला दिया कि उनका नेता कभी गलत कर ही नहीं सकता है और जो उनका अवतारनुमा नेता कहता है वही अंतिम सत्य है। तर्क के ऊपर अंध विश्वास और सत्य के ऊपर असत्य हावी होता चला गया।

सोशल मीडिया के जरिए चलने वाले प्रचार अभियानों ने नेता को ही सरकार और देश का पर्याय बना दिया है। कई प्रचार कंपनियां इस धंधे में कूद पड़ीं और उन्होंने अपने व्यवसायिक और तकनीकी विशेषज्ञों के जरिए विभिन्न नेताओं और दलों का पूरा प्रचार अभियान संभाल लिया और विरोधी को परास्त करने के लिए इंटरनेट पर युद्ध जैसा माहौल बन गया है। अरबों खरबों रुपये का यह कारोबार लगातार बढ़ता जा रहा है। इस प्रचार युद्ध में इतिहास की गलत जानकारी, तथ्यों की गलत व्याख्या, संवैधानिक और लोकतांत्रिक मर्यादाओं का मखौल, देशप्रेम और राष्ट्रवाद की नई परिभाषाएं, आलोचना की जगह निंदा और भर्त्सना, गाली-गलौज को आम स्वीकृति सब जायज बना दिया गया है। और दुनिया के लोकतंत्र प्रेमियों के सामने यही सबसे बडी चुनौती है कि वो लोकतंत्र को भीड़तंत्र में बदलने से कैसे रोकें।

विचारधाराओं की लड़ाई मानव सभ्यता के प्रारंभ ही से अलग-अलग स्वरूपों में होती होती रही है। राजाओं और सुल्तानों की साम्राज्य विस्तार की महत्वाकांक्षा को भी अपने विचार के प्रसार का रूप दिया जाता रहा है और कालांतर में विभिन्न धार्मिक आग्रहों के बीच का संघर्ष भी एक तरह से विचारधारा का ही संघर्ष रहा है। यूरोप में औद्योगिक क्रांति के बाद विचारधाराओं की लड़ाई ने कई बार युद्ध का भी रूप लिया और फ्रांस की क्रांति से लेकर पेरिस कम्यून के प्रयोग से होते हुए रूस की बोल्शेविक क्रांति के बाद दुनिया वैचारिक संघर्ष का खुला अखाड़ा बन गई। दूसरा विश्वयुद्ध तो पूरी तरह हिटलर, मुसोलिनी, फ्रैंको जैसे तानाशाहों की अधिनायकवादी सोच और इंग्लैंड, फ्रांस, अमेरिका जैसे देशों की पूंजीवादी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के संघर्ष के नाम पर लड़ा गया।

यह अलग बात है कि इस महायुद्ध में शामिल देशों के आर्थिक और साम्राज्यवादी हित वैचारिक सोच पर भारी थे। नवोदित राष्ट्र सोवियत संघ जिसकी साम्यवादी विचारधारा न तो हिटलर की अगुआई वाले अधिनायकवादी खेमे को रास आ रही थी और न ही इंग्लैंड-अमेरिका के नेतृत्व वाले मित्र राष्ट्रों की लोकतांत्रिक टोली को पंसद थी। लेकिन इस युद्ध में मित्र राष्ट्रों की हार को जीत में बदलने का श्रेय सोवियत संघ और उसके नेता जोसेफ स्तालिन को ही जाता है और इसीलिए दूसरे महायुद्ध के बाद बनी विश्व व्यवस्था में दुनिया सीधे दो ध्रुवों में बंट गई, जिसमें एक ध्रुव का नेतृत्व अमेरिकी की अगुआई में पश्चिम के पूंजीवादी लोकतांत्रिक देशों के पास था तो दूसरे ध्रुव की कमान सोवियत संघ के पास थी, जिसमें पूर्वी यूरोप, एशिया और लैटिन अमेरिका के साम्यवादी देश शामिल थे।

विचारधारा की यह लड़ाई देशों के बीच शीत युद्ध के रूप में लड़ी गई, लेकिन इसमें भीड़ की कोई भूमिका नहीं थी। इससे इतर विभिन्न देशों में साम्राज्यवादी शासन, असमानता, अव्यवस्था और अलोकतांत्रिकता के खिलाफ जनता को गोलबंद करके जन आंदोलन जरूर दुनिया में हुए, लेकिन उसमें जन भागीदारी के बावजूद आंदोलनकारी कभी भी हिंसक भीड़ के रूप में नहीं बदले क्योंकि उन आंदोलनों के परिपक्व नेतृत्व ने कभी आंदोलनों को भीड़ हिंसा में तब्दील नहीं होने दिया। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में असहयोग आंदोलन के दौरान चौरी-चौरा की भीड़ हिंसा के बाद महात्मा गांधी द्वारा तत्काल आंदोलन वापस लेना इसका एक बड़ा उदाहरण है। आजादी के बाद भारत में हुए सबसे बड़े जन आंदोलन, जिसे जेपी आंदोलन या बिहार आंदोलन कहा जाता है, में भी लोगों की भागीदारी के बावजूद भीड़ हिंसा नहीं हुई।

गोधरा कांड (फाइल फोटो) - फोटो : Amar Ujala
भीड़ के हिंसक और अराजक होने का दौर भारत में 1967 में प. बंगाल से शुरू हुए हथियारबंद नक्सलवादी आंदोलन से शुरू हुआ जब वर्ग शत्रु के सफाए के नाम पर हथियारबंद वामपंथी नक्सलवादियों ने जन अदालतें लगाकर कथित सामंतों और अत्याचारी वर्ग शत्रुओं को त्वरित न्याय के नाम पर उन्हें गावों में भीड़ के द्वारा दंडित करवाना शुरू किया। लेकिन यह भीड़ हिंसा सिर्फ उन इलाकों तक सीमित रही, जो नक्सली संगठनों के प्रभाव में थे। भीड़ हिंसा का पहला और बड़ा विस्फोट भारत में 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली समेत देश के कई शहरों में हुआ, जब पुलिस के संरक्षण में उन्मादी भीड़ ने सड़कों पर और घरों से खींच कर निर्दोष सिखों को मारा और जिंदा जलाया।

इस भीड़ हिंसा के घाव पूरी तरह भर भी न पाए थे कि भीड़ हिंसा का दूसरा बड़ा विस्फोट छह दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद को जमींदोज करने और मीडिया कर्मियों के साथ हिंसा के रूप में सामने आया। भीड़ हिंसा का तीसरा बड़ा विस्फोट 2002 में पहले गोधरा में कार सेवकों से भरी दो रेल बोगियों में आग लगाकर निर्दोष कारसेवकों को जलाने और फिर इसकी हिंसक प्रतिक्रिया के रूप में अहमदाबाद और आसपास उन्मादी सांप्रदायिक भीड़ द्वारा निर्दोष मुसलमानों की हत्या के रूप में दिखाई दिया।

भीड़ हिंसा के इन तीनों मामलों में अलग-अलग दलों की सरकारों और उनके नेतृत्व वाले पुलिस प्रशासन का चरित्र एक ही रहा यानी भीड़ को उन्माद और हिंसा की खुली छूट देना और बाद में भीड़ हिंसा की इन घटनाओं का अपने-अपने हिसाब से राजनीतिक फायदा उठाना। 1984 की भीड़ हिंसा अगर तत्कालीन सत्ताधारी कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में रिकार्डतोड़ एतिहासिक बहुमत दिलाती है, तो छह दिसंबर 1992 में अयोध्या और 2002 की गुजरात की भीड़ हिंसा भारतीय जनता पार्टी के लिए चुनावी जीत का रास्ता तैयार करती है।

ध्यान देने वाली बात ये है कि भीड़ हिंसा की तीनों घटनाएं तब हुईं जब न इंटरनेट था और न ही सोशल मीडिया और न ही टीवी मीडिया इतना प्रसारित और मजबूत था। थे तो सिर्फ अखबार और मौखिक अफवाहों का एक ऐसा मजबूत मानवीय तंत्र, जो एक ही दिन पूरे देश में गणेश और अन्य देव मूर्तियों को दूध पिलाने के लिए लोगों को पागल करने की ताकत रखता था। इसके बाद याद कीजिए 2010 के बाद दुनिया में इंटरनेट के प्रसार और सोशल मीडिया के उदय से किस तरह मिस्र में तहरीर चौक से राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक के तीन दशक पुराने शासन का अंत हुआ और भारत में टीवी और सोशल मीडिया के जरिए अन्ना हजारे के नेतृत्व में एक ऐसा आंदोलन खड़ा कर दिया गया, जिसने तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार की चूलें हिला दीं।

गनीमत यह रही कि तहरीर चौक और अन्ना आंदोलन हिंसक और अराजक नहीं हुए, लेकिन उस दौरान जिस उत्तेजना और उन्माद का वातावरण बना था कि अगर मनमोहन सरकार चूक जाती तो भारतीय संसद के सामने भी कैपिटल हिल जैसे मंजर का खतरा पैदा हो जाता। अन्ना आंदोलन और रामदेव के धरने के दौरान मंच से जिस तरह उत्तेजक भाषण दिए गए थे उनसे कभी भी स्थिति बिगड़ सकती थी, अगर तत्कालीन सरकार और पुलिस वक्त रहते उचित कदम न उठाती।

अन्ना आंदोलन की कामयाबी ने लोगों के बीच प्रचार-प्रसार के लिए सोशल मीडिया की ताकत को भारत में स्थापित कर दिया और सबसे पहले भारतीय जनता पार्टी और गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसकी ताकत को पहचाना है। तब तक खुद को प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल कर चुके नरेंद्र मोदी ने पार्टी से इतर अपनी पूरी आई टी सेना तैयार की, जिसने 2013 से उनके पक्ष में सोशल मीडिया पर एसा जबरदस्त अभियान चलाया कि एक साल के भीतर मोदी देश के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता बन गए और 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने पहली बार भाजपा को अकेले दम पर बहुमत से ज्यादा 283 सीटें जितवाईं और प्रधानमंत्री बने।

सोशल मीडिया का प्रयोग करके यही कमाल अन्ना आंदोलन के गर्भ से उपजी नवगठित आम आदमी पार्टी ने दिल्ली विधानसभा चुनावों में किया और अरविंद केजरीवाल की अगुआई में सरकार बनाई। सोशल मीडिया का प्रयोग अपने नेता की छवि चमकाने के साथ-साथ अपने विरोधियों की छवि ध्वस्त करने के लिए भी जबरदस्त तरीके से हो रहा है। भारत में इस सोशल मीडिया युद्ध के सबसे बड़े शिकार राहुल गांधी हुए हैं जिन्हें सुनियोजित तरीके से 'पप्पू' बना दिया गया है।

लेकिन सोशल मीडिया की इस दुधारी तलवार ने 2013 में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में भीषण सांप्रदायिक दंगों और पिछले कुछ सालों में देश के अनेक हिस्सों में गौ रक्षा के नाम पर उन्मादी भीड़ की हिंसा के भी रूप दिखाए हैं। कुछ साल पहले उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में हुई भीड़ हिंसा में एक पुलिस निरीक्षक की हत्या हो गई थी। इसके पहले मथुरा में एक धार्मिक जमावड़े की उग्र हिंसक भीड़ ने पुलिस पर हमला करके एक पुलिस अधीक्षक को मार डाला था।

राजनीतिक दलों की आईटी शाखाओं की इंटरनेट फैक्ट्री में तैयार होने वाली भड़काऊ और झूठ की बुनियाद पर आधारित सामग्री, जिसमें वीडियो और लिखित टेक्सट मैसेजेज दोनों शामिल हैं, ने समाज को न सिर्फ दिग्भ्रमित किया है बल्कि लोगों के बीच नफरत और बदले की भावना की ऐसी विभाजन रेखा खींच दी है कि जहां भी कोई घटना होती है, अचानक लोग नागरिक से हिंसक और उन्मादी भीड़ में बदल जाते हैं। जहां सोशल मीडिया समाज के भीतर तेजी से जहर घोल रहा है, वहीं कथित मुख्यधारा का मीडिया भी इस आग में घी डाल रहा है। यह सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में हो रहा है।

सभी राजनीतिक दल और समूह इस जलती आग में अपनी-अपनी विचारधारा का घी डालकर इसे भड़का कर नागरिकों को हिंसक और उन्मादी भीड़ बनने की तरफ धकेल रहे हैं। विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक समूहों ने भीड़ हिंसा के आरोपितों को न सिर्फ संरक्षण दिया बल्कि उन्हें सार्वजनिक रूप से महिमा मंडित और सम्मानित भी किया है। अपने-अपने समर्थकों अमेरिका में ट्रंप समर्थक हों या दूसरे देशों में अपने-अपने नेताओं के समर्थक वो भीड़ में बदल चुके हैं। उन्हें अपने नेता की हर बात पत्थर की लकीर और अंतिम सत्य लगती है। तर्क और विरोध के स्वर उन्हें बर्दाश्त नहीं हैं।

उन्हें लगता है कि जैसे देश और समाज को सुधारने, बनाने और आगे बढ़ाने का पूरा ठेका उनके ही पास है और उनके नेता के नेतृत्व और उसकी सोच ही देश की मजबूती और विकास का एकमात्र रास्ता है। अपने-अपने नेताओं के अंध और कट्टर समर्थकों की भीड़ यह भी मानती है कि उनके नेता के उदय और उद्भव से पहले जो कुछ भी था सब गड़बड़ था। उनके नेता का अवतार ही सब कुछ बदलने और ठीक करने के लिए हुआ है। इसलिए न उन्हें नेता की आलोचना सहन है और न ही अपने विचारों की। यह बात किसी एक नेता विशेष के समर्थकों पर नहीं पिछले दस सालों में सोशल मीडिया के अधकचरे और झूठे ज्ञान से तैयार किए गए हर नेता के समर्थकों पर लागू होती है। यह बात दुनिया के तमाम देशों में इन दिनोदिन लागू होती है।
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अमेरिका जैसे मजबूत लोकतंत्र और स्वतंत्र संस्थाओं वाले देश में भी राष्ट्रपति ट्रंप के समर्थकों की जमात इसी तरह तैयार हुई और इसी सोच के चलते उसे अपने अवतार स्वरूप नेता की चुनावी हार बर्दाश्त नहीं हुई और समर्थकों की भीड़ टेंपल ऑफ डेमोक्रेसी यानी कैपिटल हिल्स पर चढ़ गई। आज हम अमेरिका पर हंस सकते हैं तरस खा सकते हैं और घटना की निंदा कर सकते हैं। लेकिन कल कौन सा देश भीड़ की ऐसी मानसिकता का शिकार होगा कहा नहीं जा सकता। लोकतंत्रवादियों की यही सबसे बड़ी चुनौती है।

अमेरिका की घटना के भी दो पहलू हैं। एक तो वह जिसकी चिंता और निंदा पूरी दुनिया में हो रही है कि किस तरह राष्ट्रपति चुनाव के जनादेश को झुठलाने और जबरन पलटने की हर कोशिश सत्तासीन राष्ट्रपति द्वारा की गई। चाहे वो प्रचार तंत्र के जरिए नतीजे आने से पहले ही नतीजों के खिलाफ आने पर उन्हें झुठलाने का माहौल बनाना, या फिर नतीजे खिलाफ आते देख जार्जिया के अटार्नी पर 11 हजार से ज्यादा वोटों के इंतजाम करने का दबाव डालने वाला फोन और आखिर में अमेरिकी कांग्रेस के संयुक्त सत्र में राष्ट्रपति चुनाव नतीजों की औपचारिक पुष्टि के दौरान समर्थकों को कांग्रेस भवन पर चढ़ाई करने के लिए उकसाना और समर्थकों की हिंसक भीड़ की चढाई।

लेकिन अमेरिका का ही दूसरा पहलू बेहद सकारात्मक है। वह है कि भले आधुनिक दुनिया के इस सबसे पुराने लोकतंत्र के एक अतिवादी राष्ट्रपति ने अपनी हरकतों से अमेरिकी लोकतंत्र की दीवारें गिराने की कोशिश की, लेकिन दीवारें हिलीं तो जरूर, लेकिन गिरी नहीं। क्योंकि अमेरिकी लोकतंत्र की बुनियाद माने जाने वाली वहां की संस्थाएं, जिनमें स्वतंत्र न्यायपालिका, मीडिया, विधायिका और प्रशासन तंत्र शामिल है, ने हर दबाव का मुकाबला करते हुए वही किया जो लोकतंत्र न्याय और संविधान सम्मत है। जब ट्रंप समर्थकों की उन्मादी भीड़ कैपिटल हिल्स पर चढ़ाई कर रही थी, तब रिपब्लिकन पार्टी के ही माईक पेंस जिन्हें ट्रंप ने ही राष्ट्रपति बनाया था, ने डेमोक्रेट जो बाइडन और कमला हारिस की जीत की पुष्टि की घोषणा की। चार रिपब्लिकन मंत्रियों ने विरोध में इस्तीफा दे दिया।

संविधान संशोधन-25 का हवाला  देकर ट्रंप को बर्खास्त करने की बात शुरू हो गई और प्रतिनिधि सभा की स्पीकर ने ट्रंप के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया चलाने की घोषणा की। इसके पहले ट्रंप के फोन का जवाब जार्जिया के अटार्नी ने नतीजों के मुताबिक बाइडन की जीत की घोषणा और अपने इस्तीफे से दिया। अमेरिकी मीडिया ने पूरे चार साल ट्रंप की तमाम मनमानियों और बेतुकी बातों के खिलाफ लगातार आवाज उठाई।

इस तरह अमेरिकी संस्थाओं और नागरिकों ने अपने लोकतंत्र को तो बचा लिया, लेकिन दुनिया के दूसरे देश और उनके नेता जो इन समय अमेरिका की घटनाओं की निंदा कर रहे हैं और वहां लोकतंत्र पर हुए हमले पर चिंता व्यक्त कर रहे हैं, उन्हें सोचना चाहिए कि क्या उनके देशों में लोकतांत्रिक संस्थाओं की बुनियाद इतनी मजबूत है कि अगर कभी ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति पैदा हो, तो बिना किसी दबाव के वह संस्थाएं संविधान न्याय और लोकतंत्र के मुताबिक अपने कर्तव्यों को अंजाम देकर अपने देशों के लोकतंत्र को बचा सकें। हर देश की सरकारों, नेताओं, राजनीतिक दलों और नागरिकों को अपने अपने लोकतंत्र को बचाने के लिए उसकी बुनियाद माने जाने वाली लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्ता और स्वतंत्रता को बचाए रखना होगा।
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