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बिगड़ते-बिगड़ते अमेरिका में इतने बिगड़ गए हालात

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अमेरिकी संसद भवन - फोटो : TWITTER/CHRISTAL HAYES
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वॉशिंगटन में कैपिटल हिल (अमेरिकी संसद भवन) पर डोनाल्ड ट्रंप समर्थकों के हमले से भले बाकी दुनिया भौचक रह गई हो, लेकिन अमेरिकी समाज और राजनीति की समझ रखने वाले लोगों को इस पर ज्यादा हैरत नहीं हुई है। उन्होंने इसे अमेरिका में लगातार बन रही स्थिति का परिणाम माना है। यहां तक कि दो पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने भी नब्ज पर सही जगह हाथ रखा है।

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पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इस घटना के लिए सीधे तौर पर रिपब्लिकन पार्टी और दक्षिणपंथी मीडिया इकोसिस्टम को दोषी ठहराया है। उन्होंने कहा कि इन लोगों की काल्पनिक कहानी अधिक से अधिक सच से दूर होती गई। ये कहानी वर्षों से बोए गए जहर से उपजी है। अब हम उसका नतीजा देख रहे हैं, जब हिंसा अपने चरम पर पहुंच गई है। पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने भी कहा है कि कैपिटल हिल पर कब्जे की कोशिश दुष्प्रचार को फैलाते हुए की गई जहरीली राजनीति का नतीजा है।

इस सिलसिले में विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि राष्ट्रपति ट्रंप तीन नवंबर को हुए राष्ट्रपति चुनाव के बाद से बिना किसी सबूत के इस प्रचार में जुटे रहे कि धांधली और धोखाधड़ी से उन्हें चुनाव में हराया गया। उनके समर्थकों ने इसको लेकर षडयंत्र की अनेक कहानियां समाज में फैलाईं।
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बुधवार रात (भारतीय समय के अनुसार) अमेरिकी कांग्रेस (संसद) ने राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे को प्रमाणित करने के लिए अपनी साझा बैठक शुरू की। इस मौके पर हजारों ट्रंप समर्थक वॉशिंगटन में रैली के लिए इकट्ठे हुए थे। उनमें से एक हजार से अधिक लोगों ने अचानक कैपिटल हिल पर धावा बोल दिया। वे संसद भवन के भीतर घुस गए और तोड़फोड़ करने लगे। वहां आंसू गैस का इस्तेमाल किया गया। फायरिंग होने की खबर भी मिली, जिसमें एक महिला की मौत हो गई।

संसद भवन के एक कर्मचारी ने बुद्धि-कौशल और फुर्ती का परिचय देते हुए चुनाव नतीजे के दस्तावेजों को दंगाइयों के हाथ लगने से बचा लिया। इससे अमेरिका ने राहत की सांस ली है। लेकिन ये सच भी सामने है कि अमेरिकी इतिहास में इसके पहले कभी ऐसी घटना नहीं हुई थी। इसके बावजूद ट्रंप और उनकी बेटी इवांका ट्रंप ने अपने सार्वजनिक बयानों में इस हिंसक भीड़ की तारीफ की और उसमें शामिल लोगों को देशभक्त बताया। ट्रंप के बयान को इतना भड़काऊ समझा गया कि ट्विटर और फेसबुक ने उनके जारी किए कंटेंट को अपने प्लेटफॉर्म से हटा दिया।

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अमेरिकी संसद भवन - फोटो : TWITTER/CHRISTAL HAYES
जानकारों ने कहा है कि ये घटनाएं अभूतपूर्व जरूर हैं, लेकिन बिल्कुल अप्रत्याशित नहीं हैं। अमेरिकी समाज में गुजरे वर्षों में ध्रुवीकरण लगातार तीखा होता गया है। अब देश में दो ऐसे खेमे बन गए हैं, जो एक- दूसरे से नफरत करते हैं। डोनाल्ड ट्रंप को हाल के हुए राष्ट्रपति चुनाव में लगभग साढ़े सात करोड़ लोगों ने वोट दिया। इनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है, जो मानते हैं कि ट्रंप से चुनाव को चुरा लिया गया। बुधवार को जारी हुए इकॉनमिस्ट/ यूगव जनमत सर्वेक्षण में रिपब्लिकन पार्टी को वोट देने वाले 66 फीसदी लोगों ने ऐसी राय जताई।

ऐसे लोग पिछले दो महीने से अलग-अलग अमेरिकी शहरों में सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन कर रहे हैं। बुधवार को वॉशिंगटन आई हजारों की भीड़ में बहुत से ऐसे लोग थे, जिन्होंने सैनिक गणवेश पहन रखा था। उनमें से एक व्यक्ति ने वेबसाइट द हिल से कहा कि, चुनाव से कोई लाभ नहीं हुआ। इसलिए अब डायरेक्ट एक्शन (सीधी कार्रवाई) की जरूरत है। इसी वेबसाइट से वर्जिनिया राज्य से एक नौजवान महिला ने कहा कि चुनाव में इस्तेमाल हुई वोटिंग मशीनों में धांधली की गई।

विश्लेषकों के मुताबिक ट्रंप समर्थक मीडिया ने ये माहौल बना रखा था कि सुप्रीम कोर्ट चुनाव नतीजे को पलट देगा। लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ, तब यह प्रचार किया गया कि कांग्रेस- खासकर उच्च सदन सीनेट में नतीजे को पलट दिया जाएगा। लेकिन कांग्रेस की बैठक से ठीक पहले रिपब्लिकन पार्टी के भी अनेक सदस्यों ने ऐसी मुहिम से खुद को अलग करने का एलान कर दिया। ट्रंप ने एक दिन पहले कहा था कि उप-राष्ट्रपति माइक पेन्स को चाहिए कि सीनेट के अध्यक्ष के रूप में अपने विशेष अधिकार का इस्तेमाल करते हुए चुनाव नतीजे को अस्वीकार कर दें। लेकिन बुधवार को पेन्स ने एक सार्वजनिक बयान में यह साफ कह दिया कि उन्हें ऐसा करने का अधिकार नहीं है। बताया जाता है कि इसके बाद ट्रंप समर्थक भीड़ बेसब्र हो गई और उसने कैपिटल हिल पर धावा बोल दिया।

अब ये मांग उठी है कि अमेरिकी संविधान के अनुच्छेद 25 का इस्तेमाल करके ट्रंप को तुरंत राष्ट्रपति पद से हटा दिया जाए। अखबार द वॉशिंगटन पोस्ट ने भी अपने एक विशेष संपादकीय में इसकी वकालत की है। अब ये आशंका बढ़ गई है कि अपने कार्यकाल के बचे 13 दिन में ट्रंप देश को किसी और भी बड़े संकट में डाल सकते हैं। ये आशंका पहले से रही है कि कमांडर इन चीफ के रूप में वे सेना को दखल देने का आदेश दे सकते हैं। देश के जीवित सभी पूर्व रक्षा मंत्रियों ने तीन दिन पहले एक बयान जारी कर कहा था कि सेना को ऐसे किसी आदेश का पालन नहीं करना चाहिए।

विश्लेषकों का कहना है कि ये तमाम बातें पहले कल्पना से बाहर थीं। लेकिन आज ये हकीकत बन गई हैं, तो इसके लिए हालात लंबे समय में बने हैं। इसके लिए प्रमुख रूप से भले ट्रंप दोषी हों, लेकिन इसका एकमात्र दोष उन पर नहीं है। ये अंदेशा भी जताया गया है कि वॉशिंगटन में बुधवार को जो हुआ, वह ऐसी आखिरी घटना नहीं है। बल्कि आने वाले दिनों में देश के अलग- अलग हिस्सों में ऐसे नजारों का सामना अमेरिका को करना पड़ सकता है। 
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