रचनात्मक रूप में श्रीकॄष्ण हर एक के लिए प्रेरणा हैं।
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मुश्किल घड़ी में साथी धैर्य, साहस और बुद्धि
कालिया नाग से गेंद वापस लाना हो, कंस का वध करना हो, पूतना को धूल चटाना हो, महाभारत के युद्ध में अर्जुन का सारथी बनना हो, कोई भी भूमिका हो श्रीकॄष्ण ने हमेशा बुद्धि, विनम्रता और साहस से काम लिया है। उनका यह रूप इस बात की सीख देता है कि विपत्ति आने पर हमें धैर्य के साथ सारे रास्ते खंगालना चाहिए, फिर बुद्धिमानी से रणनीति बनानी चाहिए और फिर साहस से उसका सामना करना चाहिये। चाहे फिर मुश्किल कितनी भी बड़ी या भयावह क्यों न हो वह आपके सामने परास्त होकर ही रहेगी।
सिद्धान्तों की बात और साहित्य कला के प्रणेता
महाभारत के युद्ध के पूर्व अर्जुन और दुर्योधन दोनों ही श्रीकॄष्ण के पास मदद मांगने गए थे। श्रीकॄष्ण ने सिद्धान्ततः दोनों की ही मदद की लेकिन चूंकि अर्जुन उनके पैरों के पास बैठे थे और उनपर पहले नजर पड़ी इसलिए उन्होने पहले मदद मांगने का अधिकार अर्जुन को दिया। इसी तरह उन्होंने यह प्रण लिया था कि युद्ध में वे स्वयं शस्त्र नहीं उठाएंगे, इस सिद्धांत का भी उन्होंने पालन किया। उन्होंने पूरी ईमानदारी से अपनी भूमिका निभाई बिना किसी पक्षपात के।
गीत-संगीत, नृत्य से लेकर गीता के ज्ञान तक श्रीकृष्ण ने कला और साहित्य को सर्वश्रेष्ठ रूप में मनुष्य के सामने प्रस्तुत किया है। रास रचाते कन्हैया हों या बांसुरी बजाकर समस्त प्राणी मात्र को रिझाते कान्हा या फिर युद्धक्षेत्र में अर्जुन को गीता ज्ञान देते श्रीकॄष्ण हों, रचनात्मक रूप में श्रीकृष्ण हर एक के लिए प्रेरणा हैं।
दरअसल, केवल उक्त गुण ही नहीं श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण जीवन संदर्भों के वर्णन में आपको ऐसे कई उदाहरण मिलेंगे जो सफल और सुखद जीवन जीने में साथ दे सकते हैं। सार्थकता तब है जब आप इन्हें समझकर जीवन में उतारें। वरना केवल पूजा करने के लिए धर्मग्रन्थ तो हर घर में रखे रहते हैं।
अब चाहे आप ईश्वर में मानते हों या न मानते हों। यदि आप श्रीकृष्ण को एक काल्पनिक चरित्र भी मानते हों तो भी वह किसी सुपरहीरो से कम नहीं। जो दूसरों की रक्षा और हित के लिए सदैव सबसे आगे होते हैं। तो इसी भावना के साथ श्रीकॄष्ण से प्रेरणा लीजिये। आखिर तो बात सद्प्रेरणा लेने की है।
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