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कोस मीनार: वो मील के पत्थर जिन्हें हम भूल गए..!

सार

दरअसल, ‘कोस’ अर्थात् गाय के रंभाने की आवाज़ सामान्य स्थिति में जितनी दूर तक सुनी जा सके उन्हें पहले ‘क्रोश’ दूरी कहा जाता था। समय के साथ ‘क्रोश’ से यह ‘कोस’ बन गया और प्रचलित भी हो गया।

इसी क्रम में विख्यात और प्रगतिशील बादशाह शेरशाह सूरी ने अपने राजकाल में सड़कों को नापने के लिए उन्हें नियमित अंतराल पर चिन्हित किया था, जिससे यह ज्ञात हो सके कि रास्ता कितना लंबा है एवं कितना तय किया गया।

इस हेतु उन्होंने वर्ष 1540 -1545 के बीच सड़कों के किनारे प्रत्येक कोस पर मीनारों का निर्माण करवाया। यहां यह बात जानना ज़रूरी है कि कोस शब्द का प्रयोग शेरशाह सूरी से काफी पहले से प्रचलन में था।
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सुनाम में दयनीय हालत में खडी आठवीं सदी की कोस मीनार। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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हमारे वर्तमान की जड़ें कहीं न कहीं हमारे इतिहास में ही छुपी हुई हैं। इतिहास न केवल हमारी धरोहर है बल्कि यह उस तानेबाने को भी स्पष्ट रूप से हमारे सामने रखती है जिसकी डोर पकड़ कर हम वर्तमान में पहुंचने में सफल हुए हैं। जैसे-जैसे हम समय के साथ-साथ आगे बढ़ते गए, तकनीकी रूप से प्रगतिशील हुए, वैसे-वैसे हम अपने इतिहास के उन धागों को भूलते गए जो हमारे आज की पृष्ठभूमि है।

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हमारे इतिहास में आज के विज्ञान के कई प्रारूप अथवा रहस्य छुपे हुए हैं। कई महत्वपूर्ण अनुसंधान इतिहास के आधार पर ही किए गए हैं लेकिन आधुनिक तकनीकी के विकास के साथ-साथ हमने अपना प्राचीन विज्ञान और आधार को लगभग भुला दिया है। प्राचीन काल में कम्प्यूटर, इंटरनेट जैसे कोई भी आधुनिक साधन नहीं हुआ करते थे किन्तु उस समय भी विज्ञान के आधार पर जीवन में प्रगतिशीलता थी।

कोस मीनार क्या है?  
आज जब हम मोटर गाड़ियों में लम्बी दूरी की यात्रा करते हैं तो गंतव्य स्थान की दिशा के अलावा मील के पत्थर हमारे लिए मुख्य सूचक का कार्य करते हैं जो हमें बताते हैं कि हम अपने गंतव्य स्थान से कितने दूर हैं। इस यात्रा के दौरान हम कभी यह सोच नहीं पाते हैं कि इन मील के पत्थरों का भी एक इतिहास है। ये कैसे विकसित हुए और किसने इसके बारे में पहले सोचा। कौन सा राजा इतनी दूरदृष्टि और वैज्ञानिक सोच रखता था? इसी विषय पर आज थोड़ा प्रकाश डालेंगे।

सदियों से मापने का कोई न कोई पर्याय अथवा मापक हुआ करता था। चाहें वस्तु का वजन हो, लम्बाई चौड़ाई हो या समय अथवा रास्तों की दूरियां को मापना हो। प्राचीन काल से ही राजा-महाराजा मापने के लिए भिन्न-भिन्न मापकों का प्रयोग करते थे जिनसे उन्हें और उनकी प्रजा को दैनंदिनी कार्यों में सरलता हो और राज्य के समस्त कार्य सुचारु रूप से होते रहें। उनके अपने टकसाल होते थे, अपने सिक्के होते थे अपनी वेधशालायें हुआ करती थीं। उस समय दूरी नापने का कोई निश्चित पैमाना नहीं हुआ करता था इसलिए कोस मापक से मार्ग नापे जाते थे। एक कोस लगभग 2.5-3 किलोमीटर के बराबर हुआ करता था। इसी संदर्भ में हम आपको ‘कोस’ शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई।

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अंबाला कोस मीनार, यहां की कई मीनारे देखरेख के अभाव में खत्म हो गई हैं। - फोटो : Image: Wikipedia.

कैसे हुई कोस शब्द की उत्पत्ति  
दरअसल, ‘कोस’ अर्थात् गाय के रंभाने की आवाज़ सामान्य स्थिति में जितनी दूर तक सुनी जा सके उन्हें पहले ‘क्रोश’ दूरी कहा जाता था। समय के साथ ‘क्रोश’ से यह ‘कोस’ बन गया और प्रचलित भी हो गया। इसी क्रम में विख्यात और प्रगतिशील बादशाह शेरशाह सूरी ने अपने राजकाल में सड़कों को नापने के लिए उन्हें नियमित अंतराल पर चिन्हित किया था, जिससे यह ज्ञात हो सके कि रास्ता कितना लंबा है एवं कितना तय किया गया। इस हेतु उन्होंने वर्ष 1540 -1545 के बीच सड़कों के किनारे प्रत्येक कोस पर मीनारों का निर्माण करवाया। यहां यह बात जानना ज़रूरी है कि कोस शब्द का प्रयोग शेर शाह सूरी से काफी पहले से प्रचलन में था।

कोस शब्द दूरी नापने का एक पैमाना था। इन पांच वर्षों (1540-1545) में उन्होंने दिल्ली, सोनीपत, पानीपत, कुरुक्षेत्र, अंबाला, लुधियाना, जालंधर, अमृतसर के साथ-साथ कलकत्ता-पेशावर राजमार्ग एवं दिल्ली-आगरा राजमार्ग पर प्रत्येक कोस पर मीनारें बनवाई जिन्हें ‘कोस मीनार’ कहा जाता है। यह कोस मीनारें रास्ते का सूचक-यंत्र हुआ करती थीं। इनके द्वारा यात्राएं सुगम और सुव्यवस्थित हुआ करती थीं। इन्हीं कोस मीनारों द्वारा सैन्य-दल एवं डाक लाने वाले डाकिये सही स्थान पर पहुँच पाते थे।

कोस मीनारों की विशिष्टता थी कि इन कोस मीनारों के आसपास यात्रियों के रुकने के लिए सराय और पानी के कुओं की व्यवस्था हुआ करती थी। कोस मीनारों की ऊंचाई 30 फीट के लगभग हुआ करती थी। इनका निर्माण ईंटों एवं चूने के पत्थरों से किया जाता था। इन मीनारों पर खड़े होकर सैनिक आवागमन पर दृष्टि रखते थे और आने-जाने वाले यात्रियों पर भी दूर से ही नजर रखते थे।

एक तरह से यह मीनारें सुरक्षा की दृष्टि में भी सहायक थीं। इन मीनारों के निर्माण कार्य से कई लोगों को रोजी-रोटी भी प्राप्त हुई। यह मीनारों खूबसूरत कलाकृतियों का उदाहरण थीं जिन्हें बनाने में सैकड़ों शिल्पकारों को रोजगार प्राप्त हुआ और उनके हुनर को प्रोत्साहन भी मिला।

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जैसे-जैसे समय गुज़रता गया और समय के साथ-साथ यह मीनारें भी नष्ट होने लगी और गिरने लगी। हमारे इतिहास की वह धरोहरें जो वैज्ञानिक आधार पर बनाई गई थी, वहीं धरोहरें काल के गर्भ में समाने लगी। एक समय आया जब कोस मीनारों का अस्तित्व ही संकट में पड़ गया।

आज़ादी के कई वर्षों बाद सरकार द्वारा सुध लेने के उपरांत पुरातत्व विभाग ने इन बची हुई जर्जर मीनारों की सुध ली और उन्हें प्राचीन स्मारक घोषित किया गया। इसे कह सकते हैं ‘देर आए, दुरुस्त आए’ जिसके कारण अब इनका राष्ट्रीय महत्व बढ़ गया है।

प्राचीन स्मारक एवं पुरातत्व स्थल स्थाईत्व 1958 संशोधित अधिनियम 2010 अधिनियम की धारा 20 बी के तहत सेक्शन 3 एवं 4 में पुरातत्व विभाग की ओर से कोस मीनारों को राष्ट्रीय स्मारक घोषित

कर उनकी सुरक्षा एवं रख-रखाव का जिम्मा लिया गया। इसके अंतर्गत इन मीनारों के 200 मीटर के दायरे को विनियमित एवं प्रतिबंधित घोषित कर दिया गया हैं। इसके साथ ही नियम 20 ए के तहत उस क्षेत्र के 100 मीटर की परिधि में कोई भी निर्माण कार्य प्रतिबंधित किया गया है।

हालांकि अब शेरशाह सूरी द्वारा निर्मित कोस मीनारें पथ-प्रदर्शक नहीं है किन्तु वह मार्ग नापने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम थी। पुरातत्व विभाग के अनुसार हमारे भारतवर्ष में इस समय हरियाणा राज्य में 49 कोस मीनारें शेष हैं, जिसमें से 17 फरीदाबाद में, 7 सोनीपत में, 5 पानीपत में, 10 करनाल में एवं कुरुक्षेत्र में 9 एवं रोहतक में 1 मीनार शेष हैं। अंबाला में स्थित सभी मीनारें देखरेख के अभाव में नष्ट हो गई है।

केवल कपड़ा मार्केट में एक ही मीनार शेष है जिसकी सुरक्षा की सुध पुरातत्व विभाग ने ली है। किन्तु कई मीनारों के आसपास लोगों ने अतिक्रमण कर लिया हैं, दुकानें बना ली हैं। यहां तक कि मीनारों के चबूतरों पर कब्जा जमा लिया हैं। जब तक पुरातत्व विभाग ने होश संभाला तब तक मीनारों को बहुत क्षति पहुंच चुकी थी। इनमें अंबाला शहर में स्थित कपड़ा मार्केट में स्थित कोस मीनार प्राचीनतम मीनारों में से एक है।

समय गुज़रा तो धीरे-धीरे यही कोस मीनारें मील के पत्थरों में परिवर्तित होती गई किन्तु यह न तो कोस मीनारों की तरह खूबसूरत थे और न ही यह यात्रियों के लिए कोई सुविधा मुहैया करवाते हैं, केवल रास्ते की दूरी दिखाने का कार्य यह मील के पत्थर कर रहे हैं। बची हुई कोस मीनारें हमारे पूर्वजों और बुजुर्गों की निशानियां हैं, ये कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगी। हम अपने इतिहास और पूर्वजों को सहेज कर नहीं रखेंगे तो हमारी आनेवाली पीढ़ी को हमारे इतिहास का ज्ञान कैसे होगा।

कोस मीनार के पीछे की विज्ञानता अपने आप में ही सर्वश्रेष्ठ है। अंग्रेजों ने अपने शासनकाल में सड़कों पर मील के पत्थर लगा दिए। हालांकि यह मील के पत्थर भी दूरी नापने हेतु महत्वपूर्ण है किन्तु ये केवल कोस मीनारों का ही एक छोटा प्रारूप है। मील के पत्थरों का अतीत तो कोस मीनार ही थी। वैज्ञानिक आधार पर बनायीं हुई कोस मीनारें ही आज के मील के पत्थर हैं पर यहाँ कोस मीनारों जितना विस्तार और आराम कहां?

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।


 

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