किसी भी पत्रकार के जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं घटती हैं जो उसके लिए पाठशाला बन जाती है। 2013 की उत्तराखंड त्रासदी कुछ ऐसी ही पाठशाला साबित हुई। इस एक पाठशाला ने उत्तराखंड के तमाम पत्रकारों की जिंदगी बदल कर रख दी। खबरों को देखने, समझने और उसे प्रस्तुत करने का हर तरह से नया नजरिया मिला।
पहाड़ों का दर्द
भयानक आपदा से बचकर आए हर एक शख्स के साथ दस-दस कहानियां थीं। पहाड़ों का दर्द भी था और सरकार की नाकामियां भी थीं। संवाददाताओं और फोटो पत्रकारों को दिल से नमन। उन्होंने उस वक्त जो रिपोर्टिंग की वह पत्रकारिता के लिए मिसाल बनी। हालांकि कुछ ऐसी खबरों ने भी जगह बना ली, जिसने पत्रकारिता को गहराई तक शर्मिंदा किया। आज केदारनाथ त्रासदी के दस साल पर विशेष की दूसरी किस्त में कुछ ऐसी ही साहसिक रिपोर्टिंग और शर्मशार करने वाली खबरों की चर्चा।
18 जून की शाम के बाद से राजधानी देहरादून के तमाम न्यूज रूम में त्रासदी के अलावा दूसरी खबरों की बात भी नहीं हो रही थी। हर तरफ से छन-छन कर आ रही सूचनाओं का समंदर था, जिसमें से खबर निकालना चुनौती से कम नहीं था। तमाम अखबारों के संवाददाताओं की टीम भी 19 जून की सुबह पहाड़ों की ओर रवाना हो चुकी थी।
इन संवाददाताओं के साथ विकट समस्याएं थीं। पहाड़ों में पहुंचने के सभी रास्ते बंद थे। फोन और बिजली के लाइन ठप थे। अपनी गाड़ियों से रवाना हुए कुछ संवाददाता बीच रास्ते में फंस चुके थे। देहरादून के जॉली ग्रांट हवाई अड्डे से भारतीय सेना का रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू हो चुका था।
सबकुछ तबाह हो चुका था
सहस्त्रधारा हैलीपैड पर प्राइवेट एविएशन के हेलिकॉप्टर रेस्क्यू कर रहे थे। जुगाड़ और पैरवी करके जैसे-तैसे कुछ पत्रकार हेलिकॉप्टर से फाटा और गौचर तक पहुंचने में कामयाब भी हो गए थे। पर वहां से आगे जाने का न तो रास्ता था और न साहस। सबकुछ तबाह हो चुका था। सबसे अधिक चुनौती इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सामने थी। उनके पास फुटेज के नाम पर ऋषिकेश में गंगा का रौद्र रूप था। इसी रौद्र रूप में स्वर्गाश्रम के भगवान शिव की बहती प्रतिमा की मोबाइल फुटेज थी। वहीं से लाइव रिपोर्टिंग शुरू थी।
अमर उजाला, दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान जैसे बड़े अखबारों के कस्बाई संवाददाता पहाड़ों में मौजूद थे। पर उनके पास भी देहरादून तक खबरों को पहुंचाने का संसाधन सीमित हो चुका था। फिर भी उन्होंने जो किया उसने पत्रकारिता के लिए एक मिसाल कायम की। मुझे अच्छी तरह याद है अमर उजाला के अगस्त्यमुनि सेंटर के संवाददाता की कहानी। उसका नाम था दिनेश जमलोकी। आपदा ने उसका घर, खेत सबकुछ तबाह कर दिया था।
जैसे-तैसे वह अपने परिवार को बचा सका था। किसी का घर तबाह हो जाए, खाने को मोहताज हो, बेघर हो इससे बड़ी दुख की घड़ी क्या हो सकती है। पर सलाम पत्रकारिता के उस जज्बे को। दिनेश ने पहले अपने परिवार को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया। फिर लगातार पंद्रह दिन तक बिना थके, बिना रुके रिपोर्टिंग की। ऐसी-ऐसी जीवंत रिपोर्ट भेजी जिसने रोंगटे खड़े कर दिए। पहाड़ के दुख दर्द को उन संवाददाताओं ने जिस तरह देखा और महसूस किया उसे पूरी दुनिया तक पहुंचाया। कई विदेशी अखबारों में कस्बाई संवाददाताओं की लिखी रिपोर्ट और तस्वीरों ने जगह बनाई।
करीब तीन दिन बाद जब बारिश थमी तब मीडिया की टीम धीरे-धीरे पहाड़ के ऊपरी क्षेत्रों तक पहुंचने में कामयाब रही। जैसे-जैसे मीडिया पहाड़ों में ऊपर की ओर जा रही थी, वैसे-वैसे खबरों के तेवर बदलते जा रहे थे। खबरों की होड़ के बीच इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का हाल सबसे ज्यादा खराब था। चुंकि इन तीन-चार दिनों के बीच अखबारों के माध्यम से यह स्थापित हो चुका था कि आस्था के सबसे बड़े केंद्र केदारनाथ में ही सर्वाधिक नुकसान हुआ है।