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केदारनाथ त्रासदी 2013: पत्थरों के नीचे दबे थे शव, डीएनए सैंपल थी चुनौती

सार

इसी बीच कुछ दिनों बाद जब हालात सामान्य हुए और दोबारा केदारनाथ मंदिर में पूजा अर्चना शुरू करवाई गई तो उत्तराखंड सरकार ने इसे पूरे तामझाम के साथ मीडिया में प्रचारित करने का प्रयास किया।
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शवों के अंतिम संस्कार के दौरान मंत्रोच्चार करते उत्तराखंड के आईपीएस अधिकारी मणिकांत मिश्रा। - फोटो : कुणाल वर्मा
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विस्तार
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केदारघाटी में जगह-जगह शव मिल रहे थे। पुलिस टीम के सामने एक और बड़ी चुनौती थी। शवों के अंतिम संस्कार के पहले शवों का डीएनए सैंपल लेना। अगर सैंपल नहीं लिए जाते तो मृतकों की पहचान नहीं हो पाती। लाखों परिजन देहरादून, हरिद्वार और ऋषिकेश में कैंप कर रहे थे।

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वे इस आस में थे कि कम से कम उनके परिजनों के मृत होने की पुख्ता जानकारी सामने आ जाए। मृतकों के परिजनों को सरकार द्वारा मुआवजा भी दिया जाना था, ऐसे में शवों की सही पहचान के लिए डीएनए सैंपल के अलावा दूसरा विकल्प नहीं था।

देहरादून से एक टीम इसी काम के लिए केदारघाटी में कैंप कर रही थी ताकि अपने से बिछड़ चुके परिजनों को कम से कम यह तो संतोष दिलाया जा सके कि उनके अपने सच में उनसे बहुत दूर जा चुके हैं। पूरे रीति रिवाज से उनका अंतिम संस्कार भी किया जा चुका है।
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इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से दर्शनशास्त्र और इतिहास के साथ-साथ संस्कृत में शिक्षा प्राप्त तत्कालीन एडिशनल एसपी मणिकांत मिश्रा ने तो केदारघाटी में मिले शवों के अंतिम संस्कार से पहले मंत्रों का जाप करने जैसा कार्य भी किया।

दाह संस्कार के दौरान किए जाने वाले मंत्रों का उच्चारण कर मणिकांत मिश्रा ने अपने सहयोगियों के दिलों में अनोखी जगह बना ली। मणिकांत मिश्रा के इस कार्य के बारे में उनके ही एक सहयोगी ने बाद में देहरादून में बताया था। हालांकि, उत्तराखंड पुलिस की इस तरह के कार्यों की चर्चा कभी मीडिया की हेडलाइन नहीं बन सकी और न ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए यह टीआरपी थी। पर उत्तराखंड पुलिस के इस तरह के सैकड़ों प्रयास आज भी गुमनाम हैं।

बुलाया गाय था मीडिया को

इसी बीच कुछ दिनों बाद जब हालात सामान्य हुए और दोबारा केदारनाथ मंदिर में पूजा अर्चना शुरू करवाई गई तो उत्तराखंड सरकार ने इसे पूरे तामझाम के साथ मीडिया में प्रचारित करने का प्रयास किया। राजधानी देहरादून से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की टीम को हेलिकॉप्टर से केदार मंदिर तक पहुंचाया गया।

पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कैमरों ने मंदिर में पूजा अर्चना की जगह उन तस्वीरों को दिखाना शुरू किया, जिसे देखकर पूरे भारत में सरकार के खिलाफ रोष की लहर दौड़ गई। मीडिया के कैमरों ने दिखाया कि अब भी जगह-जगह शव पड़े हैं। यह आरोप प्रत्यारोप का दौर भी शुरू हो चुका था कि उत्तराखंड पुलिस सही तरीके से शवों का दाह संस्कार नहीं कर रही है। पर सच्चाई जानने का किसी ने प्रयास नहीं किया था।

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ये थी सच्चाई

सच्चाई यह थी कि कई शव हजारों टन पत्थरों के नीचे दबे थे। बोल्डर्स इतने बड़े-बड़े थे कि उन्हें मानवीय हाथों से हटाना असंभव था। इसके लिए जेसीबी मशीनों की जरूरत थी। इन भारी मशीनों को हेलिकॉप्टर से इतनी तंग घाटी में उतारना उस वक्त संभव नहीं था। टीवी पर शवों की खबर चलते ही उत्तराखंड सरकार के हाथ पांव फूल गए। जिस नियत से उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक चैनल्स को पूरे ताम झाम के साथ घाटी में उतारा था वह दांव उल्टा पड़ चुका था।

हालांकि, इसका असर यह हुआ कि दोबारा से पुलिस टीम को घाटी की ओर रवाना कर दिया गया। यह बात उत्तराखंड सरकार भी जानती थी और उत्तराखंड पुलिस भी कि इस तरह बिना संसाधन के घाटी में जाना समय की बर्बादी है। पर पूरे देश की भावनाएं जुड़ी थी, उत्तराखंड पुलिस की टीम एक बार फिर घाटी में थी।

कुछ समय बाद जब हालात सामान्य हुए और बड़ी-बड़ी जेसीबी मशीनों को घाटी में उतारा गया तो एक बार फिर से पत्थरों के नीचे दबे शवों का पहले डीएनए सैंपल लिया गया और बाद में उनका अंतिम संस्कार हुआ।

आज भी घाटी में कंकालों का मिलना जारी है। लंबे समय तक यह जारी भी रहेगा, क्योंकि जिंदगी की चाहत में लोग ऐसी ऊंचाइयों तक पहुंच गए थे जहां सामान्य परिस्थितियों में कोई जाने की सोच भी नहीं सकता है। पानी की प्रचंडता से बचने की जद्दोजहद के बीच वे उन जंगलों तक पहुंच गए थे जहां से लौटना संभव नहीं था। कई लोगों ने भूख और प्यास से दम तोड़ दिया।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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