ये थी सच्चाई
सच्चाई यह थी कि कई शव हजारों टन पत्थरों के नीचे दबे थे। बोल्डर्स इतने बड़े-बड़े थे कि उन्हें मानवीय हाथों से हटाना असंभव था। इसके लिए जेसीबी मशीनों की जरूरत थी। इन भारी मशीनों को हेलिकॉप्टर से इतनी तंग घाटी में उतारना उस वक्त संभव नहीं था। टीवी पर शवों की खबर चलते ही उत्तराखंड सरकार के हाथ पांव फूल गए। जिस नियत से उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक चैनल्स को पूरे ताम झाम के साथ घाटी में उतारा था वह दांव उल्टा पड़ चुका था।
हालांकि, इसका असर यह हुआ कि दोबारा से पुलिस टीम को घाटी की ओर रवाना कर दिया गया। यह बात उत्तराखंड सरकार भी जानती थी और उत्तराखंड पुलिस भी कि इस तरह बिना संसाधन के घाटी में जाना समय की बर्बादी है। पर पूरे देश की भावनाएं जुड़ी थी, उत्तराखंड पुलिस की टीम एक बार फिर घाटी में थी।
कुछ समय बाद जब हालात सामान्य हुए और बड़ी-बड़ी जेसीबी मशीनों को घाटी में उतारा गया तो एक बार फिर से पत्थरों के नीचे दबे शवों का पहले डीएनए सैंपल लिया गया और बाद में उनका अंतिम संस्कार हुआ।
आज भी घाटी में कंकालों का मिलना जारी है। लंबे समय तक यह जारी भी रहेगा, क्योंकि जिंदगी की चाहत में लोग ऐसी ऊंचाइयों तक पहुंच गए थे जहां सामान्य परिस्थितियों में कोई जाने की सोच भी नहीं सकता है। पानी की प्रचंडता से बचने की जद्दोजहद के बीच वे उन जंगलों तक पहुंच गए थे जहां से लौटना संभव नहीं था। कई लोगों ने भूख और प्यास से दम तोड़ दिया।
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