चर्चा थी उस तस्वीर की
ऋषिकेश और हरिद्वार में उफनाती गंगा ने पहाड़ों की कहानी को थोड़ा बहुत कहने का प्रयास जरूर किया था। पर उस एक तस्वीर ने सबकुछ बदल कर रख दिया। देहरादून से प्रकाशित सभी अखबारों के न्यूज रूम में 18 जून की शाम उसी तस्वीर की चर्चा थी।
खबरों की प्लानिंग से लेकर, प्रस्तुतिकरण तक सभी कुछ बदल गया। आनन फानन में रात में ही सभी अखबारों में टीम का गठन कर दिया गया जो सुबह उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों के लिए रवाना हो जाएंगे। अलग आपदा डेस्क बना दी गई। 19 जून को तस्वीर और तबाही की खबरों के प्रकाशन के बाद उत्तराखंड सहित पूरे भारत की सांसे थम गई थी।
उस एक तस्वीर ने सबकुछ बदल कर रख दिया। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि 18 जून की शाम तस्वीरों के मिलने के चंद घंटे बाद 19 जून की सुबह भारतीय सेना को बचाव अभियान में लगा दिया गया। भारतीय सेना की सेंट्रल कमांड ने 19 जून को सुबह-सुबह ऑपरेशन शुरू कर दिया।
पहले इस अभियान का नाम ऑपरेशन गंगा प्रहार दिया गया। दो दिन बाद ही इसका नाम बदलकर ऑपरेशन सूर्य होप कर दिया गया। लेफ्टिनेंट जनरल अनिल चैत उस वक्त सेंट्रल कमांड के जीओसी थे, उनके नेतृत्व में ही ऑपरेशन सूर्य होप के जरिए भारतीय सेना ने इतिहास का सबसे बड़ा बचाव अभियान चलाया। इसी दिन भारतीय वायु सेना भी अपना बचाव अभियान लॉन्च किया। वायुसेना के रेस्क्यू ऑपरेशन का नाम दिया गया ऑपरेशन राहत।
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