अनुमान लगाया जा सकता है कि बिना मास्टर प्लान के ये पहाड़ी नगर किस प्रकार अपने ही बोझ तले दबे जा रहे हैं।
- फोटो : जयसिंह रावत
71 प्रतिशत प्रवासी गांव छोड़ नजदीकी नगरों में आ बसे
राज्य पलायन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखण्ड में अब तक 28.72 प्रतिशत प्रवासियों ने राज्य से बाहर, 35.69 प्रतिशत ने एक जिले से दूसरे जिले में, 15.46 प्रतिशत ने जिला मुख्यालय में और 19.46 प्रतिशत ने नजदीक के कस्बों में पलायन किया है। इस तरह देखा जाए तो 71.28 लोगों ने राज्य के अन्दर ही पलायन किया है।
इनमें से कुछ ने राजधानी देहरादून में किया तो 34.92 प्रतिशत लोगों ने एक ही जिले में या तो जिला मुख्यालय या फिर ब्लॉक और तहसील मुख्यालय या फिर व्यवसाय के लिए अनुकूल यात्रा मार्ग पर बसे श्रीनगर-कर्णप्रयाग और जोशीमठ जैसे नगरों में पलायन किया। नैनीताल और उत्तरकाशी जिले के लगभग 40-40 प्रतिशत लोगों ने गांव छोड़ कर नजदीकी कस्बों या नगरों में नया ठिकाना बनाया।
इसी प्रकार चमोली में 19.72, रुद्रप्रयाग में 19.34, पौड़ी 19.61 और टिहरी जिले में 17.73 प्रतिशत लोगों ने गांव छोड़ कर नजदीकी कस्बों में घर बनाए। पिथौरागढ़ जैसे सीमान्त जिले में 33.07 प्रतिशत और बागेश्वर में 22 प्रतिशत लोग गांव छोड़ कर जिला मुख्यालय में बस गए। राज्य में कोई ऐसा जिला नहीं है जहां लोग गांव छोड़ कर नजदीकी जिला या ब्लॉक मुख्यालय में आ कर न बसे हों। पलायन की इस प्रवृत्ति के चलते लगभग सभी पहाड़ी नगरों की कैरीइंग कैपेसिटी समाप्त हो चुकी है। जिस कारण प्रदेश की लाखों की आबादी खतरे की जद में है।
जोशीमठ की तरह ज्यादातर गांव भूस्खलनों पर बसे हैं
जोशीमठ की ही तरह उत्तराखण्ड के अधिकांश गांव और नगर पुराने भूस्खलनों पर बसे हुए हैं। कालान्तर में ऊपर पहाड़ियो से खिसक कर आए भूस्खलनों ने पहाड़ी ढालों को समतल भी बनाया और ऊपर से ये उपजाऊ मिट्टी भी लाए जिससे इन भूस्खलनों पर पहले सम्पन्न गांव और बाद में इनमें से ही कई विख्यात नगर भी उग आए। लेकिन उन स्थानों की वहनीय क्षमता देखे परखे बिना जनसंख्या का दबाव बढ़ता गया और ये नगर जोशीमठ की तरह अपने ही बोझ तले दबते ही चले गए।
बढ़ती आबादी ने समाप्त कर दी नगरों की धारण क्षमता
आदि गुरू शंकराचार्य ने सदियों पहले जब जोशीमठ में भारत की चैथी सर्वोच्च पीठ ज्योतिपीठ स्थापित की थी उस समय वहां अधिकतम् सौ दो सौ की आबादी रही होगी। सन् 1901 में जोशीमठ की जनसंख्या कुल 650 के आसपास थी। सन् 60 के दशक में बदरीनाथ तक मोटर रोड बनी तो चारधाम यात्रा और पर्यटन आदि से रोजगार संभावनाएं बढ़ने से 1971 में वहां की जनसंख्या बढ़ कर 5,852 वर्ष 1981 में 8,616, वर्ष 1991 में 11488 और 2001 में 13204 हो गई।
इस नगर की 1981 से लेकर 1991 तक दशकीय जनसंख्या वृद्धि दर 37 प्रतिशत और 2001 तक 37.7 प्रतिशत हो गई। इस नगर की जनसंख्या 2011 में 16709 थी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा गृहमंत्री अमित शाह को दिए गए आंकड़ों के अनुसार वहां की आबादी अब 25 हजार तक पहुंच गई है। वहां केवल नगरपालिका क्षेत्र में 2011 में 3,898 मकान पंजीकृत थे जो कि आज 4,500 तक पहुंच गए। इनमें सेना और आइटीबीपी के विशाल भवन शामिल नहीं हैं। गए।
अब अनुमान लगाया जा सकता है कि बिना मास्टर प्लान के ये पहाड़ी नगर किस प्रकार अपने ही बोझ तले दबे जा रहे हैं। यही कहानी नैनीताल, मसूरी, गोपेश्वर, उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, बागेश्वर, चम्पावत और पिथौरागढ़ नगरों की भी है। राज्य सरकार जोशमठ आपदा के बाद अब कुल 65 नगरों की कैरीइंग कपैसिटी का आंकलन कराने के बाद इनका मास्टर प्लान बनाने की सोच रही है।
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