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ऑक्सफैम रिपोर्ट: देश में आर्थिक विषमता पर खड़े होते गंभीर सवाल

सार

देश में अमीर बढ़ें, इसमें कोई बुराई नहीं है, लेकिन गरीबी भी उसी अनुपात में घटे तो कोई बात बने। यूं सरकार गरीब कल्याण की भी कई योजनाएं चला रही है, लेकिन उनकी सार्थकता तब है, जब अमीर और गरीब का फासला कम से कम हो। 
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देश में बढ़ती आर्थिक असमानता - फोटो : istock
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विस्तार
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प्रख्यात अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के अनुसार यह नैतिक सवाल हमेशा पूछना चाहिए कि क्या हमें अमीर होने का हक है? हमें इस अत्यधिक गरीबी और असमानता भरे विश्व में रहते हुए संतुष्ट होने का अधिकार है? ये वो सवाल हैं, जो मानव जीवन में गैरबराबरी को केन्द्र में देखने के लिए प्रेरित करते हैं।

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यह सचमुच विसंगतिपूर्ण है कि भारत के केवल 21 सबसे बड़े अरबपतियों के पास देश के 70 करोड़ लोगों की सम्पत्ति से भी ज्यादा दौलत है, यानी मोटे तौर देश की आधी दौलत महज 21 अरबपतियों के पास है। यह खुलासा एक अंतरराष्ट्रीय एनजीओ ऑक्सफैम इंडिया की ताजा रिपोर्ट में हुआ है।
 

‘ऑक्सफैम’ भारत में आर्थिक और सामाजिक असमानता को कम करने के लिए क्षेत्र में 70 सालों से काम कर रही है और समय-समय पर देश की माली और सामाजिक स्थिति पर अध्ययन रिपोर्ट जारी करती है। ऑक्सफैम का पूरा नाम ऑक्सफैम कमिटी फाॅर फेमिन रिलीफ (अकाल राहत के लिए ऑक्सफोर्ड समिति) है। इसकी शुरुआत द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान तब हुई, जब 1941 में ग्रीस पर धुरी राष्ट्रों का कब्जा होने के बाद मित्र देशों ने जवाब में ग्रीस का हुक्का पानी बंद कर दिया। नतीजतन ग्रीस में भयंकर अकाल पड़ गया।

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नाजियों की लूट और भयंकर अकाल ने ग्रीस में 3 साल में 3 लाख लोगों की जानें ले लीं। तब ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड में कुछ शिक्षाविदों और समाजविदों ने ग्रीस की खाद्यान्न मदद फिर शुरू करने के लिए एक एनजीओ की स्थापना की। यह संस्था कई देशों में काम करती है। इसने भारत में अपने काम की शुरुआत 1951 में बिहार में अकाल के अध्ययन से शुरू की थी।


अरबपतियों की संख्या बढ़ी

ऑक्सफैम की रिपोर्ट  'सर्वाइवल ऑफ द रिचेस्ट: द इंडिया स्टोरी' के मुताबिक, भारत में जहां वर्ष 2020 में अरबपतियों की संख्या 102 थी, वहीं 2022 में यह आंकड़ा 166 पर पहुंच गया है। यानी दो साल में 64 अरबपति बढ़ गए। यह रिपोर्ट स्विट्जरलैंड के दावोस में हो रही वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (डब्लूईएफ) में पेश की की गई।

ऑक्सफैम की इस रिपोर्ट पर भारत सरकार ने अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन विपक्षी कांग्रेस, मोदी सरकार पर हमलावर हो गई है, क्योंकि यह रिपोर्ट कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा मोदी सरकार पर बार बार लगाए जा रहे आरोप, कि यह सरकार सिर्फ अमीरों के हित में काम करती है, को पुष्ट करती है। हालांकि पिछले साल आई वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में गरीबी धीरे-धीरे घट रही है।  

बहरहाल ऑक्सफैम की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 2020 में कोरोना महामारी शुरू होने के बाद से नवंबर 2021 तक जहां अधिकतर भारतीयों को नौकरी संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ा और अपनी बचत को बचाने के लिए जूझना पड़ा, वहीं पिछले साल नवंबर तक भारतीय अरबपतियों की संपत्ति में 121 फीसदी का इजाफा देखा गया।
 

रिपोर्ट के अनुसार  कोरोना महामारी के इस दौर में भी भारत के अरबपतियों की दौलत में प्रतिदिन 3 हजार 608 करोड़ रुपये का इजाफा हुआ है।  रिपोर्ट यह भी कहती है कि वर्ष  2021 में भारत के 5 फीसदी लोगों का देश की कुल संपत्ति में से 62 फीसदी हिस्से पर कब्जा था। वहीं, देश की निचली 50 फीसदी आबादी देश की सिर्फ 3 फीसदी संपत्ति पर काबिज थी।

 
रिपोर्ट के मुताबिक भारत के 100 सबसे अमीर लोगों की संपत्ति 660 अरब डॉलर (करीब 54 लाख 12 हजार करोड़ रुपये) को पार जा चुकी है। इससे भारत का पूरा बजट 18 महीने तक चलाया जा सकता है। (भारत सरकार का पिछला बजट 39 लाख 44 हजार 909 करोड़ का था)।

विश्लेषण के मुताबिक, अगर भारतीय अरबपतियों की कुल संपत्ति पर सिर्फ 2 फीसदी टैक्स ही लगाया जाए तो इससे अगले 3 साल तक कुपोषण के शिकार बच्चों के लिए सभी जरूरतों को पूरा किया जा सकता है।

पिछले 10 सालों में भारत में पैदा हुई संपत्ति के गैर-बराबर बंटवारे के मुद्दे को भी रिपोर्ट में उठाया गया है। इसके अनुसार वर्ष 2012 से 2021 के बीच भारत में जितनी भी संपत्ति अस्तित्व में आई, उसका 40 फीसदी देश के सबसे अमीर 1 फीसदी के हाथ में गया। वहीं, 50 फीसदी जनता के हाथ में महज तीन फीसदी संपत्ति ही आई है। 

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2020 में अरबपतियों की संख्या 102 थी, यह 2022 में बढ़कर 166 हो गई है। - फोटो : Istock
‘ऑक्सफैम’ ही नहीं, रियल एस्टेट कंपनी नाइटफ्रेंक की ‘वेल्थ रिपोर्ट 2023 एटीट्यूडसर्वे : इंडिया फाइंडिंग्स’ के मुताबिक वर्ष 2022 में 35 फीसदी भारतीय धनाढ्यों की सम्पत्ति 10 फीसदी तक बढ़ी है। यही ट्रेंड 2023 में भी रहने की संभावना है। इसकी वजह यह बताई जा रही है कि बीते साल दुनियाभर के देशों की अर्थव्यवस्था में गिरावट देखी गई, लेकिन भारत के बेहतर आर्थिक प्रदर्शन ने वैश्विक आर्थिक संकट को भी अपने ढंग से मात दी है।

रिपोर्ट के अनुसार भारत में एक अमीर के पास औसतन पांच मकान हैं, जबकि वैश्विक औसत 4.2 है। ये अमीर आमतौर पर इक्विटी, कमर्शियल प्राॅपर्टीज, बांड और सोने में ज्यादा निवेश कर रहे हैं। 

बढ़ती आर्थिक विषमता खड़े करती है सवाल

वैसे भारत जैसे विकासशील देश में रईसों की संख्या बढ़ना इसलिए बहुत खुश करने वाला नहीं है, क्योंकि आर्थिक विषमता देश में घटने की बजाए बढ़ती ही जा रही है। चंद अमीरों के घरों में भले चकाचौंध करने वाला उजाला हो, लेकिन गरीब, जिनकी संख्या कुल आबादी का 16.4 फीसदी हिस्सा गरीब ही है। यानी 23 करोड़ लोग अभी भी गरीबी रेखा से नीचे जी रहे हैं। इनमें भी 4.2 प्रतिशत वो गरीब हैं, जिनके पास न तो रहने को आशियाना है और न ही दो वक्त का खाना है।

जबकि वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक भारत की जीडीपी वृद्धि दर 6.9 फीसदी रही है, जो किअच्छी मानी जाती है। इसके पहले संयुक्त राष्ट्र संघ भारत की इस बात को लेकर सराहना कर चुका है कि भारत में गरीबी धीरे-धीरे घट रही है। संयुक्त राष्ट्र संघ की पिछली रिपोर्ट में कहा गया था कि पिछले 15 सालों में भारत में 41.5 करोड़ लोग गरीबी के दायरे से बाहर निकले हैं। अगर इस रिपोर्ट को सही मानें तो ये लोग गरीब के दायरे से निकलकर अब निम्न मध्यम वर्ग श्रेणी में आ गए हैं। 


ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति चिंताजनक

बेशक सरकार की आर्थिक नीतियों के कारण शहरी क्षेत्रों में गरीबी में कमी आई है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी बढ़ी ही है। वैश्विक भूख सूचकांक की वर्ष 2022 की रिपोर्ट में भारत 121 देशों की सूची में 107वें नंबर पर है, जबकि हम दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था होने का दावा कर रहे हैं और 5 ट्रिलियन  डॉलर आर्थिकी होने का सपना देख रहे हैं। 

यह सचमुच विरोधाभासी स्थिति है कि एक तरफ देश में रईसों की दौलत दिन-दूनी बढ़ती जा रही है, वहीं गरीबों के लिए जीवनयापन दुष्कर होता जा रहा है। एक तरफ भारत में स्टार्टअप्स बढ़ते जा रहे हैं, वहीं बेकारी और गरीबी के कारण देश में आत्महत्याएं बढ़ती जा रही हैं।
राज्यसभा में केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने एक सवाल के लिखित जवाब में बताया था कि देश में वर्ष 2018-2020 के बीच 9140 लोगों ने बेकारी और 16 हजार 91 लोगों ने कंगाली के कारण खुदकुशी की। यहां सवाल यह है कि अगर रईसों के पास दौलत बढ़ रही है तो यह जा कहां रही है? आज भी गरीब को अपनी आय का बड़ा हिस्सा केवल खाने, रहने और स्वास्थ्य पर खर्च करना पड़ रहा है। यह विरोधाभास टैक्स भुगतान में भी है। 

ऑक्सफैम रिपोर्ट के अनुसार 64 फीसदी जीएसटी 50 फीसदी गरीब भर रहे हैं, जबकि टैक्स का केवल 10 फीसदी हिस्सा रईसों की जेब से आ रहा है। कई लोगों का मानना है कि आंकड़े पूरा सच नहीं होते। संभव है कि भारत सरकार भी ऑक्सफैम की रिपोर्ट खारिज कर दे या उसे अनदेखा करे, लेकिन यह रिपोर्ट देश में जारी राजनीतिक तनातनी में एक हथियार बन सकती है। खासकर इसलिए कि केन्द्र सरकार ने 2020-21 में देश के कारपोरेट घरानों को 1 लाख करोड़ से ज्यादा की टैक्स छूट दी थी। यह कर छूट मनरेगा के बजट से भी ज्यादा बताई जाती है।

वैसे देश में अमीर बढ़ें, इसमें कोई बुराई नहीं है, लेकिन गरीबी भी उसी अनुपात में घटे तो कोई बात बने। यूं सरकार गरीब कल्याण की भी कई योजनाएं चला रही है, लेकिन उनकी सार्थकता तब है, जब अमीर और गरीब का फासला कम से कम हो। 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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