2020 में अरबपतियों की संख्या 102 थी, यह 2022 में बढ़कर 166 हो गई है।
- फोटो : Istock
‘ऑक्सफैम’ ही नहीं, रियल एस्टेट कंपनी नाइटफ्रेंक की ‘वेल्थ रिपोर्ट 2023 एटीट्यूडसर्वे : इंडिया फाइंडिंग्स’ के मुताबिक वर्ष 2022 में 35 फीसदी भारतीय धनाढ्यों की सम्पत्ति 10 फीसदी तक बढ़ी है। यही ट्रेंड 2023 में भी रहने की संभावना है। इसकी वजह यह बताई जा रही है कि बीते साल दुनियाभर के देशों की अर्थव्यवस्था में गिरावट देखी गई, लेकिन भारत के बेहतर आर्थिक प्रदर्शन ने वैश्विक आर्थिक संकट को भी अपने ढंग से मात दी है।
रिपोर्ट के अनुसार भारत में एक अमीर के पास औसतन पांच मकान हैं, जबकि वैश्विक औसत 4.2 है। ये अमीर आमतौर पर इक्विटी, कमर्शियल प्राॅपर्टीज, बांड और सोने में ज्यादा निवेश कर रहे हैं।
बढ़ती आर्थिक विषमता खड़े करती है सवाल
वैसे भारत जैसे विकासशील देश में रईसों की संख्या बढ़ना इसलिए बहुत खुश करने वाला नहीं है, क्योंकि आर्थिक विषमता देश में घटने की बजाए बढ़ती ही जा रही है। चंद अमीरों के घरों में भले चकाचौंध करने वाला उजाला हो, लेकिन गरीब, जिनकी संख्या कुल आबादी का 16.4 फीसदी हिस्सा गरीब ही है। यानी 23 करोड़ लोग अभी भी गरीबी रेखा से नीचे जी रहे हैं। इनमें भी 4.2 प्रतिशत वो गरीब हैं, जिनके पास न तो रहने को आशियाना है और न ही दो वक्त का खाना है।
जबकि वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक भारत की जीडीपी वृद्धि दर 6.9 फीसदी रही है, जो किअच्छी मानी जाती है। इसके पहले संयुक्त राष्ट्र संघ भारत की इस बात को लेकर सराहना कर चुका है कि भारत में गरीबी धीरे-धीरे घट रही है। संयुक्त राष्ट्र संघ की पिछली रिपोर्ट में कहा गया था कि पिछले 15 सालों में भारत में 41.5 करोड़ लोग गरीबी के दायरे से बाहर निकले हैं। अगर इस रिपोर्ट को सही मानें तो ये लोग गरीब के दायरे से निकलकर अब निम्न मध्यम वर्ग श्रेणी में आ गए हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति चिंताजनक
बेशक सरकार की आर्थिक नीतियों के कारण शहरी क्षेत्रों में गरीबी में कमी आई है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी बढ़ी ही है। वैश्विक भूख सूचकांक की वर्ष 2022 की रिपोर्ट में भारत 121 देशों की सूची में 107वें नंबर पर है, जबकि हम दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था होने का दावा कर रहे हैं और 5 ट्रिलियन डॉलर आर्थिकी होने का सपना देख रहे हैं।
यह सचमुच विरोधाभासी स्थिति है कि एक तरफ देश में रईसों की दौलत दिन-दूनी बढ़ती जा रही है, वहीं गरीबों के लिए जीवनयापन दुष्कर होता जा रहा है। एक तरफ भारत में स्टार्टअप्स बढ़ते जा रहे हैं, वहीं बेकारी और गरीबी के कारण देश में आत्महत्याएं बढ़ती जा रही हैं।
राज्यसभा में केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने एक सवाल के लिखित जवाब में बताया था कि देश में वर्ष 2018-2020 के बीच 9140 लोगों ने बेकारी और 16 हजार 91 लोगों ने कंगाली के कारण खुदकुशी की। यहां सवाल यह है कि अगर रईसों के पास दौलत बढ़ रही है तो यह जा कहां रही है? आज भी गरीब को अपनी आय का बड़ा हिस्सा केवल खाने, रहने और स्वास्थ्य पर खर्च करना पड़ रहा है। यह विरोधाभास टैक्स भुगतान में भी है।
ऑक्सफैम रिपोर्ट के अनुसार 64 फीसदी जीएसटी 50 फीसदी गरीब भर रहे हैं, जबकि टैक्स का केवल 10 फीसदी हिस्सा रईसों की जेब से आ रहा है। कई लोगों का मानना है कि आंकड़े पूरा सच नहीं होते। संभव है कि भारत सरकार भी ऑक्सफैम की रिपोर्ट खारिज कर दे या उसे अनदेखा करे, लेकिन यह रिपोर्ट देश में जारी राजनीतिक तनातनी में एक हथियार बन सकती है। खासकर इसलिए कि केन्द्र सरकार ने 2020-21 में देश के कारपोरेट घरानों को 1 लाख करोड़ से ज्यादा की टैक्स छूट दी थी। यह कर छूट मनरेगा के बजट से भी ज्यादा बताई जाती है।
वैसे देश में अमीर बढ़ें, इसमें कोई बुराई नहीं है, लेकिन गरीबी भी उसी अनुपात में घटे तो कोई बात बने। यूं सरकार गरीब कल्याण की भी कई योजनाएं चला रही है, लेकिन उनकी सार्थकता तब है, जब अमीर और गरीब का फासला कम से कम हो।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।