जोशीमठ भू-धंसाव, जनजीवन का संकट
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अंधाधुंध विकास के नाम पर प्राकृतिक संरचनाओं से छेड़छाड़
दरकती जमीन पर एक जिम्मेदार रिपोर्ट ने पहले ही बता दिया था कि जोशीमठ के ढलान अस्थिर हो चुके हैं। साल 2013 में भी हाइड्रोपॉवर परियोजना से जुड़ी सुरंगों पर उंगलियां उठी थीं तो कुछ समय के लिए परियोजना रोकी गई। वहां की नगरपालिका को दरकते आशियाने देख पहले ही अंदेशा था। उसके हालिया सर्वे में करीब 3 हजार आबादी और साढ़े 500 से ज्यादा मकान असुरक्षित मिले थे। ये सबको पता था।
वहीं जोशीमठ रणनीतिक, धार्मिक और पर्यटन महत्व का अंतिम सीमावर्ती शहर है जो भूकंपीय क्षेत्र-5 की श्रेणी में है। दुर्भाग्यवश कभी बड़ा भूकंप आया तो पूरे इलाके में भारी जन और धन हानि के साथ संपत्ति का जो नुकसान होगा वो किसी के रोके नहीं रुकेगा।
नए साल के दूसरे-तीसरे दिन से ही धरती चीरकर मलवे सहित निकलता पानी और धंसती जमीन बिना भूकंप के बड़ी चेतावनी है। विकास और बेतरतीब बस्तियों को बनाने, बढ़ाने और संवारने का सिलसिला चेतावनियों के बाद भी क्यों नहीं रुका? उत्तराखण्ड पहले ही कई भयावह तबाही देख चुका है। भविष्य में जोशीमठ की क्या स्थिति होगी कोई नहीं जानता?
ये संरक्षित किए जाने वाले इलाकों में अंधाधुंध विकास के नाम पर प्राकृतिक संरचनाओं से छेड़छाड़ का नतीजा है। दुखद पहलू यह है कि क्या देश और क्या दुनिया, सबके सब जानकर भी अनजान रह कर बदस्तूर प्रकृति को ही चुनौती दे अपने विकास की गाथा लिखने में मशगूल रहते हैं।
काफी कुछ हमारे हाथ से निकल गया है लेकिन वक्त है कि इसे सुधारा और संभाला जाए। पूरी ईमानदारी से सोचा जाएगा तभी तो बात बनेगी वरना रस्म अदायगी से कुछ हासिल होने वाला नहीं। चाहे जोशीमठ की दरकन और रिसाव हो या बीती आपदाएं, दिखावे की बैठकें और असल अनदेखी से मुंह चुराने से वह दिन भी आ सकता है जब एक झटके में प्रकृति अपने स्वरूप को खोने की सहनशीलता खो दे और कहीं नए प्रलय को अंजाम न दे दे?
मानवता, भावी पीढ़ी, जीव-जन्तुओं, वनस्पतियों के साथ प्रकृति के हित में ईमानदार कोशिश जरूरी है। हां, जोशीमठ में दरकते आशियाने और सिसकते इंसानों की चीख पुकार ने द्रवित कर दिया है। पहाड़ की नाराजगी दिखने के बावजूद जिम्मेदार चुप बैठे रहे। नतीजा सामने है, काश ऐसी पुनरावृत्ति दोबारा न होती।
लापरवाही से विकास की गाथा और सभ्यता का इतिहास कब प्रलय बन फिर ऊसी धरती में दफन हो जाएगा पता भी नहीं चलेगा। नई दुनिया को दोबारा बनने में कितने करोड़ों वर्ष लगेंगे क्या पता? अच्छा होता कि इस हकीकत को जानकर भी अनजान न बनें और प्रकृति को चुनौती देना छोड़ सामंजस्य बिठाने की दिशा में तेजी से बढ़ें।
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