फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

मोबाइल पर एप डाउनलोड करते वक्त कितने अलर्ट हैं आप? मंडरा रहा है ये खतरा

विज्ञापन
इंटरनेट सुरक्षा को लेकर कितने सतर्क हैं हम - फोटो : Shutterstock
विज्ञापन

पिछले दिनों भारतीय सोशल मीडिया पर विभिन्न मनोरंजक टिप्पणियों, राजनीतिक व सेलिब्रिटी ट्रॉलिंग और विवादित बयानों-घटनाओं के साथ दो खबरें व्यापक तौर पर पढ़ी-सुनी और देखी गईं। इनमें से एक "चंद्रयान-2" के सफल प्रक्षेपण की खुशनुमा खबर थी तो दूसरी "फेसएप" की लोकप्रियता। यह दोनों परिघटनाएं ऊपरी तौर पर एक दूसरे से जुड़ी हुई नहीं दिखती हैं, लेकिन असल में इनके बीच गहरा अंतर्संबंध है। 

विज्ञापन


तो क्या खतरे में डाल रहे हैं हम अपनी सुरक्षा 
यह भारतीय तकनीक जगत की दो प्रतिनिधि ईकाइयों का एक भरा-पूरा चित्र बनाती हैं। एक तरफ तकनीक के इस्तेमाल के जरिये हम ब्रम्हांड के अनसुलझे रहस्यों की परतें खोलने की कोशिश कर रहे हैं, तो दूसरी ओर थोड़े से हास्य और खुशी के पलों के लिए अपनी इंटरनेट सुरक्षा को खतरे में डाल रहे हैं। यह इसलिए भी चिंताजनक है कि ज्यादातर इंटरनेट यूजर या सोशल मीडिया के आदी लोग इंटरनेट सुरक्षा को अपनी प्राथमिकताओं में 10वें, 20वें या उसके भी बाद स्थान देते हैं।

दरअसल, हमारी सामाजिक जिंदगी का तकरीबन 80 प्रतिशत हिस्सा इंटरनेट से जुड़ चुका है, उसके बाद भी इसकी सुरक्षा के प्रति हमारा सचेत न होना, बहुत हैरत में इसलिए भी नहीं डालता है कि हमारी सामाजिक व्यवस्था में खतरों के पूर्वाकलन की कोई बेहतर परंपरा है भी नहीं।
विज्ञापन

 

सोशल मीडिया पर भारतीय अक्सर जल्दबाजी में नजर आते हैं। - फोटो : डेमो
बहरहाल, उदाहरण के तौर पर देखें तो आमतौर पर भारतीय सोशल मीडिया यूजर्स अपने मोबाइल में इंस्टॉल करने वाली एप की टर्म एंड कंडीशन को पढ़ते ही नहीं हैं। यही नहीं कई एप के इस्तेमाल की जल्दबाजी में सभी ऑप्शन पर बिना पढ़े ही ओके या नेक्स्ट बटन पर क्लिक करते चले जाते हैं।

इसमें एक बड़ा मसला एप कंपनियों की धांधली का भी है। एक सामान्य से गेम की एप भी आपके मोबाइल के कॉन्टेक्ट, मैसेज और फोटो देखने का अधिकार आपसे मांग लेता है, और हम-आप खुशी-खुशी उसे दे भी देते हैं। यह कोई रहस्य नहीं है कि यह जानकारी एप कंपनियों के लिए बाजार में स्थापित होने में मदद करती हैं।

बढ़ रही है इंटरनेट पर धोखाधड़ी की घटनाएं 
असल में, इंटरनेट और सोशल मीडिया तेजी से हमारी जिंदगी का बेहद जरूरी और बड़ा हिस्सा बन चुके हैं। यह बेहद तेजी से हमारी आदतों और प्राथमिकताओं को बदलते हुए उन्हें नियंत्रित कर रहे हैं। दुखद पहलू यह है कि तकनीक के इस आगमन और इसके सकारात्मक-नकारात्मक पहलुओं को समझने या इसके स्वागत की तैयारी करने का वक्त भारतीय समाज के पास लगभग नहीं रहा है। इससे हालात तेजी से असंतुलित हो रहे हैं। 

इसी का नतीजा है कि इंटरनेट फ्राड से लेकर विभिन्न एप के जरिये डेटा चुराने तक की घटनाएं आम होती जा रही हैं। साइबर फिरौती और बुलिंग के खतरे का आकार भी लगातार बढ़ता जा रहा है। दिक्कत यह है कि इंटरनेट सुरक्षा किसी एक अकेले व्यक्ति या समूह के बूते से बाहर की बात है।

इंटरनेट और खासकर सोशल मीडिया की दुनिया इतनी बिखरी और व्यापक है कि इसमें किसी भी कमजोर कड़ी को निशाना बनाकर पूरे हिस्से में हलचल मचाई जा सकती है। जाहिर है कि यह कमजोर कड़ी कम उम्र के बच्चे, सोशल मीडिया के नवांगतुक और तकनीकी जानकारी से अनभिज्ञ यूजर्स ही हैं। इसका सीधा सा अर्थ है कि सोशल मीडिया पर आपकी फ्रेंड लिस्ट या फिर किसी चैट एप पर आपके परिचित के जरिये आपको निशाना बनाने की आशंका कभी भी सच हो सकती है। 
विज्ञापन

इंटरनेट और तकनीक की सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार की भी है। - फोटो : pexels.com
तकनीक के तेजी बहाव में फिलवक्त इसका इस्तेमाल सतही मनोरंजन और अफवाहों को इधर-उधर करने में ज्यादा हो रहा है। ईमेल, ब्लॉग, वीडियो फोरम, चैट एप से लेकर सोशल कनेक्टिविटी एप तक का इस्तेमाल बेहद सीमित दायरे में सकारात्मक बदलाव के लिए हो रहा है। अधिकांश हिस्सा बड़ी वायरल सूचनाओं के जरिये नियंत्रित है और इसका फौरी तौर पर कोई हल दिखाई नहीं देता है। 

कितनी सतर्क है सरकार 
ऐसे हालात में जरूरी हो जाता है कि तकनीक की जानकारी और सुरक्षा के प्रति लोगों को लगातार सचेत किया जाए। इसके लिए एक दीर्घकालीन, सुसंगत और सरल कार्ययोजना की दरकार है। सरकारी और कुछ समूहों की ओर से ऐसे प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन वे तब तक नाकाफी हैं। तकनीक के सभी जानकारों का भी यह दायित्व बनता है कि वे अपने दायरे में आने वाले सभी यूजर्स की सुरक्षा के लिए व्यक्तिगत प्रयास करें।

साथ ही सरकार को तेजी से बाजार में आ रहे गेम्स, सोशल चैट, यूटिलिटी, खबरिया और अन्य तरह के एप के लिए भी ठोस नियमन करना चाहिए, ताकि वे मोबाइल और कंम्प्यूटर के जरिये यूजर्स की निजी जानकारियों तक पहुंच बनाएं तो उसके लिए जवाबदेह भी हों। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब 3.10 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की हो चुकी अंतरराष्ट्रीय साइबर क्राइम इंडस्ट्री देश के हर नागरिक की जेब के साथ उसकी सामाजिक सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा बन जाएगा। 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें