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विश्व महिला दिवस: नई सदी की नई राजनीति, नायक होगीं महिलाएं?

सार

 21वीं सदी के शुरुआती दशक से ही ऐसे रुझान भारतीय चुनाव परिणामों से आते दिख रहे हैं कि भारतीय महिलाएं राजनीतिक चेतना से लैस हो रही हैं। सत्ता सदनों में उनकी सहभगिता धीमी ही सही पर बढ़ रही है।
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राजनीति के क्षेत्र में महिलाएं (सांकेतिक) - फोटो : istock
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विस्तार
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महिला और पुरुष की समानता का संघर्ष आधुनिकता के दौर की प्रतिस्पर्धी दुनिया का एक योजनाबद्ध अभियान है। आधुनिकता जिन क्रांतिकारी कार्यक्रमों के साथ अवतरित हुई और व्यवस्था परिवर्तन के नारों के साथ जिस नवजागरण का महानाद किया गया, उसमें भी महिलाएं महिमामंडन का ही शिकार होकर रह गईं। उस क्रांति में ही खास भ्रांति थी। स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा तो था पर बहनापा कहां गया? सबका साथ-सबका विकास के मूल्यों को स्थापित करने में ही आधुनिकता चूक गई। लैंगिक भेद पर भद्र विश्व पर्दा डालकर लोकतांत्रिक मूल्यों के महा-आख्यान में मग्न हो गया।

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महिलाएं भी इसी आश में कंधे से कंधा मिलाकर एक नई खूबसूरत दुनिया के ख्याल में खो गईं। धीरे-धीरे उनकी जमां पूंजी भी जाती रही। महिलाओं ने भी पहचान और प्रतिस्पर्धा का उसी राह का अनुसरण किया जो नवजागरण से प्रस्फुटित राजनीति के मुख्य अभिनेता पुरुष वर्ग द्वारा बनाई गई। उसी का परिणाम है कि आज तक भी पूरी दुनिया में महिला राजनीति का कोई मुकाम नहीं बन पाया।

तथाकथित विकसित कहे जाने वाले मुल्कों में भी महिलाओं की उपस्थिति भले बदली हो पर स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं हुआ, क्योंकि नवजागरण कही जाने वाली बदलाव की नई धारा में भी महिलाओं का अपना कोई राजनैतिक विमर्श खड़ा नहीं हो पाया। उनके लिए कोई राजनीतिक स्पेस बन ही नहीं पाया।

सत्ता में सहभागिता

नारीवादियों का यह नारा “दुनिया के आधे आकाश पर हमारा अधिकार है” नक्कार खाने में तूती ही साबित हुआ। सत्ता में सहभागिता के साथ जो राजनैतिक भागीदारी महिलाओं को मिलनी थी, उसके लिए आवश्यक दशाएं ही भद्र-लोक ने नहीं बनने दीं। जिस आधुनिक राजनैतिक संस्कृति में महिला राजनीति उद्भाषित हुई वह उसी पुरुष वर्चस्व वाले विमर्श से सनी हुई है, जो अवसरवादी, भेदभाव और पुरुष मानसिकता के मूल्यों को मजबूत करती है।

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महिला राजनीतिक विमर्श की अपनी कोई पहचान नहीं बन पाई है। उन्हें भी सत्ता सदनों में उसी पौरुषीय तांड़व का साहरा लेना पड़ता है। परिणामतः धीरे-धीरें महिलाएं उसी राजनीतिक संस्कृति में अपनी जगह तलाशती दिख रही हैं, उन्ही पुरुष वर्चस्ववादी मूल्यों का अभ्यास करती दिख रही हैं, जो अभी तक लोकतांत्रिक मूल्यों का काफी ह्रास कर चुका है। जहां येन-केन-प्रकारेण वाला नंगा कैरियरवाद राजनीति कहलाता है।

जहां न नेता का जन जुड़ाव प्राथमिकता है और न ही विचार की मजबूती की प्रतिबद्धता। राजनीतिक संघर्ष अभिनय की शैली की तरह आत्मसात करना और सदाचरण को भ्रष्टाचार के शरणागत करना पुरुष-वर्चस्व की राजनैतिक संस्कृति की मुख्य स्थापनाएं है। क्या महिलाएं इससे इतर कोई राजनीतिक संस्कृति खड़ी करने का उद्यम रच पाएंगीं?

महिला राजनैतिक विमर्श की आवश्यकता

नवजागरण से उभरे नारीवादी विमर्श को अपने ढंग का सत्ता-विमर्श खड़ा करना था। महिला राजनैतिक विमर्श को नई विमाएं देनी थी। सत्ता विमर्श की नई भाषा में नए राजनैतिक मूल्यों का मानवीय आख्यान करना था। नारीवाद की असली ताकत और पहचान इसमें निहित थी। यह हुआ होता तो अभी तक भागीदारी और हिस्सेदारी पर ही महिला आंदोलन की गाड़ी नहीं अटकी होती।

दुनिया नवजागरण से नवउदारवाद की ओर बढ़ चली है। बहस-मुबाहिसों के मुद्दे मिनट-दर-मिनट बदल रहे हैं। राज्य नाम की संस्था स्वयं कमजोर हो चली है। राजनीति खुद नए साथ खोज रही है। सत्ता उसका साथ छोड़ रही है। पॉवर पॉलिटिक्स अब पूंजी पॉलिटिक्स की तरफ जाती दिख रही है। ऐसे में जब राजनीति धनबल को अख्तियार कर लेगी तो क्या महिला राजनीति के लिए कोई खास गुंजाईश बनती दिख रही है?

जहां पहले ही आर्थिक संसाधनों से महिलाओं की वंचना सारी दुनिया में एक जैसी हैं। इस पूरे उलझे हुए परिदृश्य में भारतीय महिलाएं अपने लिए राजनैतिक स्पेस कैसे बनाएं? कैसे समसामयिक चुनौतियों का सामना करें? सत्ता में हिस्सेदारी कैसे बढ़े? बहुत पेंचीदे सवाल हैं इन यक्ष प्रश्नों का जवाब तलाशना आज की फौरी जरूरत है।

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महिला दिवस 2022 - फोटो : Self

राजनीति में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ाने के प्रयास जरूरी

राजनीति में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए उनके प्रतिनिधित्व की व्यवस्था एक प्रभावी कदम साबित हो सकता है। क्योंकि पार्टियां महिलाओं को अपेक्षित संख्या में टिकट ही नहीं दे रही हैं। पार्टियां ऐसी महिलाओं की जानबूझकर अनदेखा करती हैं जो जमीनी स्तर पर समाज में अपने काम के बूते अपनी पहचान और प्रभाव रखती हैं। बावजूद इसके कि पंचायत स्तर पर महिलाएं राजनीतिक हिस्सेदारी से सकारात्मक परिणाम बड़े स्तर पर दर्ज कर रही हैं।

अध्ययन यह बताते है कि स्थानीय स्तर पर राजनीतिक क्रियाकलापों में व्यापक सुधार आए हैं। इसलिए ऊपर के स्तरों पर भी महिलाओं को उचित अनुपात में भागीदारी के अवसर प्रदान करना एक कल्याणकारी राज्य की प्राथमिकता हो। इस दिशा में महिलाओं के लिए सत्ता में भागीदारी की व्यवस्था सराहनीय और सामयिक महत्व की पहल होगी। सरकार को महिलाओं के लिए अपनी क्षमताओं का खुलकर सृजनात्मक उपयोग कर सकारात्मक वातावरण बनाने में सार्थक हस्तक्षेप कर आगे बढ़ना चाहिए, साथ ही महिलाएं परिपक्व राजनीतिक समझ के साथ राजनीति के परम्परागत सत्ता समीकरणों को बदलकर समाज में नई राजनीतिक संस्कृति का विस्तार करें।

 21वीं सदी के शुरुआती दशक से ही ऐसे रुझान भारतीय चुनाव परिणामों से आते दिख रहे हैं कि भारतीय महिलाएं राजनीतिक चेतना से लैस हो रही हैं। सत्ता सदनों में उनकी सहभगिता धीमी ही सही पर बढ़ रही है। महिलाओं में बढ़ती राजनीतिक समझ का सर्वाधिक उज्जवल पक्ष यह है कि आजाद भारत में चुनाव-दर-चुनाव उनकी मतदान में सहभागिता भी बढ़ रही है। उनके राजनैतिक और चुनावी व्यवहार में नए परिवर्तन दर्ज हुए हैं।

नई राजनैतिक संस्कृति की ओर अग्रसर

महिला प्रतिनिधियों में अपने मुददों और चुनौतियों से निपटने की ललक पैदा हुई है। महिला मांगों को सही ढंग से उठाने की दूर-दृष्टि पैदा हुई है। पिछले आम चुनावों के मध्य महिलाओं ने अपने एक राजनीतिक दल की नींव रखी जो एक बड़ा संकेत है। “राष्ट्रीय महिला पार्टी” की संस्थापक श्वेता शेटटी पेशे से डॉक्टर हैं। उनका मानना है कि राजनीति में महिलाओं की घटती रुचि के पर्याप्त कारण हैं, जिसमें पुरुषवादी मानसिकता मुख्य है। पिछले आम चुनाव में मतदाता सूची से दो करोड़ से अधिक महिलाओं के नाम नदारत थे। यदि राजनीति पर महिलाओं की पकड़ मजबूत होती तो हम एक अलग ढंग की राजनीतिक संस्कृति में जिम्मेदार राजनैतिक व्यवहार के साथ लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत कर रहे होते।

यह सब नई राजनैतिक संस्कृति में ही संभव हो सकेगा। इस दिशा में महिलाओं की राजनैतिक सहभागिता एक बड़ी आश है। इसके लिए जरूरी है कि अलग-अलग पृष्ठभूमि से महिलाएं राजनीति में आएं, जिससे राष्ट्रीय राजनीति में नई संवेदनाएं विकसित हों। लोकतंत्र के प्रति नारीवादी मूल्यों में मजबूत विश्वास पैदा हो। तब नई सदी की नई राजनीति की नायक महिलाएं होगी।

राजनीति को अब आक्रामकता और अपनी हिंसक शैली की परम्परागत राह को छोड़ना ही होगा। उसे अब स्त्रैण स्रोतों की निर्बाध सौर उर्जा को अपनाकर लोकतांत्रिक दुनिया को दिखना होगा कि कैसे एक खूबसूरत संसार सत्ता से रचा जा सकता है? जहां समानता, शांति, समृद्धि, संवेदनाएं और संतुलित विकास नई राजनीतिक संस्कृति से उपजेगी। यह नई संस्कृति हाशिए पर पड़े लोगों को सत्ता में स्पेस दे सकेगी और समाज के प्रति सही मायनों में संवेदित व्यवहार कर सकेगी। परिणामतः एक नई राजनैतिक संस्कृति विकसित होगी जो आज की महती आवश्यकता है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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