अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2022
- फोटो : प्रो नीलिमा गुप्ता
शारीरिक नहीं सामाजिक समानता चाहती हैं महिलाएं
हमारे समाज में पूछे जाने वालों प्रश्नों में कि महिलाएं क्या चाहती हैं? कुछ जवाब आज का यह लेख है। महिलाएं समानता का अधिकार चाहती हैं, शारीरिक नहीं सामाजिक समानता। परिवार व समाज के भीतर कपड़ों से अधिक अभिव्यक्ति की।
अक्सर तमाम स्त्री मुद्दों में बहसों के दौरान देह की आजादी का नारा दिया जाता है और हमारा सुधीजन समाज उसे ‘सेक्स ओब्जेकट’, ‘इजी टू अवलेबल’ के तौर पर देखने लगता है। उसकी मानसिक विकास की सुई देह की स्वतंत्रता व मुखर होकर बोलने की क्षमता का आश्य इन्हीं संदर्भो में लेता है।
वह भूल जाता है कि देह से इतर भी व्यक्ति का मन होता है। महिलाओं का सर्वाधिक विरोध ही उन्हें देह के दायरे तक सीमित करके देखने की मानसिकता से है। यह विरोध आज का नहीं है बल्कि आदिकालीन समय से चला रहा है। जो शक्ति थी वह आज समाज में ‘गाली’ के रूप में प्रयोग की जा रही है। हमारे समाज में स्त्री की जैविक संरचना पर ही बहुत सी गलियां बनी है, अक्सर जिनका प्रयोग हमारे सुधीसमाज में किया जाता है।
महिला विरोधी भाषा व्यवहार
वर्तमान समय में गाली व्यवहारिक बोलचाल की भाषा का हिस्सा बन गई है। छोटे बच्चों से लेकर वयस्कों तक में भाषा व्यवहार गाली से आरंभ होता है और उसी पर समाप्त भी। हमारा सिनेमा भी इस भाषिक व्यवहार से दूर नहीं है। आज गाली के साथ भाषा का व्यवहार ‘कूल’ माना जाता है बिना यह सोचे समझे कि जिस भाषा को हम ‘ग्लोरिफाई’ कर रहे हैं या ‘कूल’ मानकर उसका प्रयोग कर रहे हैं वह महिला विरोधी गालियां है।
इन गलियों में सर्वाधिक स्त्री व उसके जननांगों को गाली का केंद्र बनाया गया है। क्योंकि किसी भी समाज में स्त्री को ही परिवार व समाज की कमजोर कड़ी माना जाता रहा है और यही कड़ी गाली के रूप में समाज में प्रयुक्त होती है।
स्वयं स्त्रियां भी स्त्रियों को स्त्री विरोधी गाली देती देखी जाती हैं और स्वयं को पुरुष के बरक्स प्रबल भाषिक व्यवहार का हिस्सा बनाती हैं जो कि सही नहीं है। ऐसे में फिर उसी सवाल पर चर्चा करूंगी कि जो अक्सर पूछा जाता है कि महिलाएं क्या चाहती हैं?
महिलाएं बराबरी का साथ व सहयोग चाहती हैं। वह स्त्री विरोधी गालियों से मुक्ति चाहती हैं। वह परिवार, समाज में बिना किसी शोषण की मानसिकता के जीना चाहती है। अपनों से ही यौन शोषण से सुरक्षा के नाम पर घर के भीतर बंधना नहीं चाहती हैं, बल्कि इस शोषण की मानसिकता से मुक्ति चाहती हैं।
वह सामाजिक बदलाव चाहती हैं, जहां मां-पिता दोनों बेटे-बेटी के प्रति समान शिक्षा का व्यवहार करें, बेटी-बहू के प्रति समान व्यवहार किया जाए। हमारे कुछ संकल्प ही हमारे अपनों को खुशी देते हैं। ऐसे में निर्णय हमारा है कि हम अपनों को ओर समाज को क्या देना चाहते हैं?
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