महिला दिवस 2022, बढ़ानी होगी महिलाओं की भागीदारी
- फोटो : Self
महिला आरक्षण विधेयक
पहली बार वर्ष 1974 में संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व का मुद्दा भारत में महिलाओं की स्थिति के आकलन संबंधी समिति की रिपोर्ट में उठाया गया था। बाद में 1996 में महिला आरक्षण विधेयक को पहली बार एच.डी. देवगौड़ा सरकार ने 81वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में संसद में पेश किया, किंतु विरोध के बाद इसे संयुक्त संसदीय समिति के हवाले कर दिया गया था। फिर 1998,1999,2002,2003 में असफल प्रयास किया गया।
मनमोहन सरकार ने 108वां संविधान संशोधन विधेयक राज्यसभा में पेश किया जो काफी मुश्किल से 2010 में ऊपरी सदन से पारित कर लोकसभा में भेजा गया। सरकार के पास लोकसभा में बहुमत होने के बाद भी पास कराना असंभव हो गया। वोटिंग पैटर्न के आधार पर महिला-पुरुष से अधिक वोट करती है, प्रवास (माइग्रेशन) के कारण ग्रामीण इलाके में तो बहुत अधिक अंतर है, इस मायने में महिला सबसे बड़ी वोट बैंक है।
समाज के किसी वर्ग के विकास में सबसे महत्वपूर्ण तत्व है नीति एवं संसाधन। बजट एक ऐसा माध्यम है जो किसी भी सरकार के नीति एवं संसाधन के आवंटन का रोडमैप होता है। लैंगिक समानता के लिए कानूनी प्रावधानों के अलावा किसी देश के बजट में महिला सशक्तीकरण तथा शिशु कल्याण के लिए किए जाने वाले आवंटन को जेंडर बजटिंग कहा जाता है।
दरअसल, जेंडर बजटिंग शब्द विगत दो-तीन दशकों में वैश्विक पटल पर अधिक प्रयोग किया गया है।इसे सर्वप्रथम आस्ट्रेलिया द्वारा शुरू कर अब तक विश्व के 62 देशों में लागू किया जा चुका है।
वर्ष 2005 से भारत ने औपचारिक रूप से बजट में जेंडर उत्तरदायी बजटिंग की शुरुआत की। जेंडर बजटिंग महिलाओं के आर्थिक, सामाजिक सशक्तीकरण के लिए सबसे महत्वपूर्ण जन नीति है। इस वर्ष के बजट में महिला केंद्रित योजनाओं के लिए कुल ₹1,71,006.47 करोड़ आवंटित किया गया हैं जो कुल व्यय का 4.3% हैं एवं जबकि 2021 में 4.4% था। इस राशि को बढ़ाना होगा, तभी दूरगामी प्रभाव पड़ेगा।
सामाजिक विकास के लिए जरूरी है महिला सशक्तिकरण
महिला सशक्तीकरण के बिना किसी भी देश के मानव विकास एवं राष्ट निर्माण का सपना पूरा नहीं हो सकता। भारत में लैंगिक समानता का आर्थिक लाभ होगा, अगर महिलाओं के साथ भेदभाव न किया जाए, समान अवसर दिया जाएं। भारत एक दशक में विकास की नई ऊंचाई छुएगा।
आईएमएफ के एक अनुमान के अनुसार देश की श्रमशक्ति में महिलाओं की समान भागीदारी से ही भारत की जीडीपी में 27 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है।
महिला सशक्तीकरण का सपना तभी साकार हो सकता है जब महिलाओं को राजनीतिक, सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक क्षेत्रों में बराबर की सहभागिता महिला सशक्तीकरण के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा है। समाज के विकास में मातृ-शक्ति का विशेष योगदान है। महिलाओं को अपनी शक्ति पहचाननी होगी अपने फैसले लेने का हक ना मिलना सबसे बड़ी बाधा है।
महिलाओं का अपने निर्णय के मामले में आत्मनिर्भर होना अति आवश्यक है। भारतीय संविधान ने भारतीय महिलाओं को समान अधिकार (अनुच्छेद 14), राज्य द्वारा कोई भेदभाव नही करने (अनुच्छेद 15(1)), अवसर की समानता (अनुच्छेद 16), समान कार्य के लिए समान वेतन (अनुच्छेद 39(घ)) साथ में अनुच्छेद 15(3) के अंतर्गत महिलाओं एवं बच्चों के पक्ष में राज्य द्वारा विशेष प्रावधान बनाए जाने की अनुमति देता है।
सरकार एवं समाज के सभी वर्ग को कुत्सित एवं रूढ़िवादी मानसिकता से ऊपर उठ महिला को जन्म से मृत्यु तक सभी स्थानों पर केवल बराबरी का हक़ देना होगा, तभी मानव विकास की यात्रा सही मायने में पूर्ण मानी जाएगी।