अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2022
- फोटो : Amar Ujala
महिलाओं ने जहां-जहां अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है वहां-वहां लैंगिक असमानता अपने आप कमजोर हुई है। विज्ञान, तकनीकी, चिकित्सा, खेलकूद, मीडिया और मनोरंजन उद्योग में महिलाओं ने जिस तरह अपने आन को स्थापित किया वह लैंगिक असमानता जैसी स्थायी बिमारियों का एकमात्र हल है।
ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं का बड़ा योगदान
ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि से लेकर मछली पालन, पशुपालन, चाय उद्योग में महिलाओं ने अद्वितीय योगदान दिया है। आंकड़े बताते हैं-
कृषि क्षेत्र में महिलाओं का योगदान 80 प्रतिशत तक दर्ज होता है। फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन का अध्ययन बताता है कि हिमालय क्षेत्र में प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष पुरुष का कार्य करने का औरत रहता है 1212 घंटे और महिलाओं का औसत 3485 घंटे है।
वहीं महिलाएं कृषि के साथ-साथ दूसरे कृषि सहायक कार्यों पशुपालन और मत्स्य आदि और घरेलू कार्यों में जो श्रम करती है, वह अलग है। देश की गरीबी को कम करने में जो एकमात्र बड़ा योगदान है वह भारतीय महिलाओं का है। मनरेगा के आंकड़े भी यही कहानी बयान करते हैं। पुरुषों से कहीं ज्यादा काम महिलाएं कर रही हैं।
महिलाओं की श्रम-शक्ति का 90 प्रतिशत हिस्सा मजदूरी और कृषि कार्यों में खप जाता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की ओर से नौ राज्यों में शोध किया गया जिससे पता चला कि फसल उत्पादन में महिलाओं की हिस्सेदारी 75 प्रतिशत रहती है। बागवानी में 80 प्रतिशत तक और इन सबके निष्पादन कार्यों का 51 प्रतिशत महिलाओं द्वारा सम्पन्न किया जाता है।
पशुपालन में 60 प्रतिशत तो मछली पालन में 95 प्रतिशत तक महिला श्रम लगता है। कृषि में हिमाचल प्रदेश सबसे ज्यादा महिलाओं पर निर्भर करता है। महिलाओं को एक अनुकूल वातावरण बने और उनके लिए सहयोगात्मक व्यवस्था सृजित की जाए, जिसमें विज्ञान और तकनीक उनकी सहयोगी बने तो देश के विकास में महिला शक्ति नए कीर्तिमान स्थापित करेगी।
अभी कई चुनौतियां
भारतीय संविधान के 74वें संशोधन के साथ महिलाओं को जो भागीदारी राजनीतिक संस्थाओं में मिली उससे बड़े बदलाव समाज में आए। शिक्षा और आर्थिक मजबूती ने निसंदेह महिलाओं को पहचान दी है। किन्तु बिना राजनीतिक पहचान के इसमें स्थायित्व नहीं आएगा। अश्विनी शास्त्री की पुस्तक “भारतीय राजनीति की 50 शिखर महिलाएं” भारतीय महिलाओं के जीवन संघर्ष के साथ ही राजनीति में उनके महान योगदान को बताती है।
यह पुस्तक बताती है कि विधायी निकायों में पुरुषों और महिलाओं के संतुलित प्रतिनिधित्व से जटिल सामाजिक-आर्थिक समस्याओं को प्रभावी तरीके से हल किया जा सकता है। अब दुनिया को यह समझ आने लगा है कि किसी देश की स्थिति वहां की महिलाओं की सामाजिक स्थिति से बनती है।
संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों के क्रम में जो सतत विकास लक्ष्य-5 उल्लेखित किया है वह इसीलिए कि बिना महिलाओं की सहभागिता के दुनिया विकास नहीं कर सकती है।
यदि कोई भी राष्ट्र सही दिशा में संतुलित और सतत् विकास चाहता है तो लैंगिक असमानता को दूर करना ही होगा। दुनिया के देशों में महिलाओं की स्थिति ही भविष्य के विश्व की उन्नति और समृद्धि तय करेगी। भारतीय महिलाओं ने अपनी दुनिया अपने संघर्षों के बल पर बनाई है।
नई सदी की नई भारतीय नारी ने जिस नई सोच, नई नैतिकता, नए मूल्यों, नए प्रतिमानों, कीर्तिमानों और नए क्षैतिजों के साथ नये भारत का सपना देखा है वह एक सशक्त, समरस, शांति और न्यायपूर्ण भारत होगा जिसकी उम्मीद विश्व समाज को हमसे है।
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