यह पितृसत्तात्मक समाज की रूढ़िवादी सोच पर तमाचा था जिसकी मान्यता है कि पुरुष ही घर का मालिक होता है फिर कमाई करता हो या न हो। इसी प्रकार जब उनकी बहन उन्हें शुभकामना देते हुए कहती है ‘एक दिन बहुत बड़ी आदमी बनना’ तब वो कहती हैं ‘मैं बहुत बड़ी औरत बनुंगी’।
फिल्म का यह संवाद हिंदी भाषा के पक्षपात को दर्शाता है कि कैसे भाषा ने यह कल्पना ही नहीं की कि महिलाएं भी कभी कामयाब हो सकती हैं। उनकी उपलब्धियों व योगदान को परिभाषित करने लायक विशेषण तक नहीं गढ़े गए।
मीडिया व फिल्मों ने जिस रूप में महिलाओं को चित्रित किया उससे इतर पुरुषों को प्रदर्शित करने की दृष्टि रखी। जब भी कभी हम किसी विख्यात पुरुष की जीवन पर बनी फिल्म को देखते हैं तो पाते हैं कि फिल्मों में उनके जीवन की उपलब्धियों व योगदान को प्राथमिकता दी जाती है।
इस सिलसिले में यदि हम मंटो फिल्म की बात करें तो हम देखेंगे कि मंटो एक साहित्यकार थे। फिल्म में उनकी कहानियों व उस समय में उनकी कहानियों के कारण उन्हें जिन मुश्किलों का समना करना पड़ता है फिल्म की पटकथा उसी के इर्द-गिर्द घूमती है और साथ ही थोड़ा बहुत उनके परिवारिक जीवन को भी दिखा दिया जाता है।
अब यहां प्रश्न यह उठता है कि क्या महिलाओं को संबंधों के परे नहीं देखा जा सकता, क्या उसे भी सिर्फ उसकी उपलब्धियों व योगदान के आधार पर नहीं समझा जा सकता। क्यों महिला के बारे में फिल्म बनाते समय निर्देशक की दृष्टि बदल जाती है, क्यों उसे लग जाता है कि समाज को उसकी उपलब्धियों से नहीं बल्कि उसके संबंधों से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है। शायद यही कारण है कि शकुंतला देवी जैसी फिल्म के माध्यम से भी मां के किरदार को ही महिमा मंडित किया गया है।
एक महिला जिसके लिए गणना करना सिर्फ शौक नहीं बल्कि जुनून है और वह उसमें माहिर भी है किन्तु महिला होने के कारण उसे अपनी बेटी या अपने काम में किसी एक को चुनना पड़ता है। जैसा कि समाज में भी व्याप्त है कि महिला की प्राथमिकता उसका परिवार है और महिलाओं के पारिवारिक भूमिकाओं को इस प्रकार से महिमा मंडित किया जाता है कि यदि महिला तथाकथित भूमिकाएं उस रूप में नहीं निभा पाए तो वह स्वयं ही आत्मग्लानी से ग्रसित हो जाती है।
शकुंतला फिल्म में भी शकुंतला पूरे फिल्म में बेहतर मां के तमगे के लिए संघर्ष करती रहती है जिसमें उसकी अन्य उपलब्धियां नजर अंदाज होती रहती हैं। पितृसत्तात्मक विचारधारा ने पुरुषों के लिए समाज और महिलाओं के लिए परिवार को प्राथमिकता दी। जिसके कारण पुरुषों के लिए सामाजिक योगदान के बरक्स पारिवारिक जिम्मेदारियों को नगण्य माना गया। पुरुषों से उम्मीद की गई कि समाज कल्याण के लिए परिवार को त्याग देना उनके लिए सामान्य बात हो।
पुरुष कभी समाज के कल्याण के लिए परिवार को त्याग देता है तो कभी अपने व्यसनों के कारण और समाज ने इस मानसिकता को स्वीकृति के साथ बढ़ावा भी दिया है। चूकिं परिवार में बुजुर्गों की सेवा, बच्चों को पालने व घर को व्यवस्थित रखने के लिए कोई तो चाहिए, तो बड़ी ही चालाकी से पितृसत्ता ने महिलाओं के घरेलु काम व भूमिकाओं का महिमा मंडन किया जिससे महिलाएं बिना शिकायत स्वयं मुफ्त में गुलाम बनना स्वीकार कर लें।
आज जहां सिनेमा को सौ साल से भी ज्यादा हो चुके हैं और दुनिया में जेंडर बराबरी का मुद्द अपने उफान पर है ऐसे में महिला प्रधान फिल्मों को चित्रित करते हुए जब उन्हीं रूढ़िवादी मानसिकता का परिचय दिया जाता है तो दुख होता है। सिनेमा को लेकर यह प्रश्न भी उठता है कि जो सिनेमा इतने बड़े तबके को संबोधित कर रहा है वह कैसे अपने लाभ के लिए जेंडर संवेदशीलता का ढोंग करते हुए सामाजिक मान्यताओं को ही पुनर्स्थापित करने का प्रयास कर रहा है।
लेखिका, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा में स्त्री अध्ययन विभाग मेंं अतिथि अध्यापक हैंं।
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