न ही वो सुनहरी सुबह से खुश होती है।
रोज टीस मारती है उसकी आत्मा,
जब भी वो बिस्तर पर होती है।
जानती है बिक चुकी है वो,
प्रेम, परिवार, त्याग जैसे बड़े शब्दों की खातिर।
इसलिए कभी भी,
उसकी 'न' उसकी 'न' नहीं होती है।
वो तो 60 की उम्र में भी,
फकत जिस्म होने का कर्ज चुकाती है।
दफन है वो खुद की देह के भीतर,
रोज मरती है, फिर भी जीती जाती है।
कई लोगों के लिए यह निजी जिंदगी से जुड़ा सिर्फ बेडरूम टॉक का विषय है। कुछ लोग इसे वर्जित फल मानकर खारिज कर देंगे तो कुछ लोग इसे अकेले में देखने-सुनने-पढ़ने वाला विषय (जी हां, ऐसी मानसिकता वाले भी बड़ी संख्या में हैं) मानेंगे। तो जनाब दिल्ली हाईकोर्ट में इन दिनों एक बहुत ही जायज और पीड़ादायक विषय चर्चा में है। ये है मैरिटल रेप का विषय। जो घाव अब तक घर के भीतर, सात तालों में बंद किसी तरह छुपाया जा रहा था, अब उसकी सड़ांध दरवाजे पार करके सड़क पर आ गई है। लेकिन उम्मीद यह है कि शायद यह घाव अब सही मरहम पा सकेगा।
दरअसल यह विषय है-
मैरिटल रेप यानी विवाह पश्चात पत्नी की अनुमति या रजामंदी के बिना उसके साथ बनाए गए शारीरिक संबंध का।
अव्वल तो हमारे देश की महिलाओं के लिए यह विषय ही सात आसमान पार का आसमानी-सुल्तानी विषय है। याद है न कुछ समय पहले हुए नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे क्रमांक 5 के पहले चरण का परिणाम? एक बार और उसे ताजा कर लेते हैं। इस सर्वे में दर्जनभर से ज्यादा महत्वपूर्ण शहरों और कस्बों की 40 प्रतिशत महिलाओं ने यह माना था कि अगर वे अपने पति को संबंध बनाने के लिए मना करती हैं तो पति द्वारा की गई उनकी पिटाई जायज है।
खासबात यह है कि इनमें पढ़ी-लिखी नौकरी करने वाली महिलाएं भी शामिल थीं। वहीं इसके पूर्व हुए इसी सर्वे में केवल एक राज्य के 65 प्रतिशत से अधिक पुरुषों ने यह कहा था कि पत्नी के साथ जबरन सेक्स करना तो पति का अधिकार है। अब भला ये भी कोई सजा दिलाने का मामला हुआ क्या?
भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 375 के अंतर्गत बिना सहमति के किसी भी महिला से शारीरिक संबंध बनाना रेप या बलात्कार की श्रेणी में आता है लेकिन हां, यदि कोई अपनी 15 वर्ष से अधिक की पत्नी के साथ ऐसा करता है तो वो इस श्रेणी में नहीं आता। धारा 375 के अपवाद 2 को लेकर ही दिल्ली हाईकोर्ट में बहस जारी है।
यूं यह बहस पिछले कुछ सालों से जारी है लेकिन कई स्थितियां हैं जो इसके निर्णय या निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले पार करनी होंगी। बहरहाल यह एक पुरानी व्यवस्था और पुराना कानून है जिसमें फिलहाल बदलाव की गुंजाइश हो सकती है।