फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

क्रिकेट की दीवानगी: जब परदेस में बन गई भारतीय युवाओं की टीम

सार

यह कहानी है यश जायसवाल कि जो कि पांच साल पहले भारत से लातविया उच्च शिक्षा के लिए आए थे। पढ़ने के साथ यश क्रिकेट खेल में भी गहरी रुचि रखते हैं लेकिन जब वो लातविया आए तो क्रिकेट लगभग उनसे छूट गया था। एक दिन कॉलेज के पार्किंग जोन में कुछ एशियाई दोस्तों के साथ क्रिकेट की शुरुआत करने के बाद उन्होंने फिर पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा। 

विज्ञापन
भारतीय युवाओं के बीच क्रिकेट की दिवानगी किसी से छिपी हुई नहीं है। गली मोहल्ले से लेकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक के क्रिकेट का क्रेज है। - फोटो : प्रियंवदा सहाय
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

भारतीय युवाओं के बीच क्रिकेट की दिवानगी किसी से छिपी हुई नहीं है। गली मोहल्ले से लेकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक के क्रिकेट का क्रेज है। लेकिन क्रिकेट क्रेजी किसी भारतीय युवा को जब ऐसे देश पढ़ने के लिए आना पड़े जहां इस खेल के बारे में शायद ही कोई जानता हो तो क्या हो।

 

यह कहानी है यश जायसवाल कि जो कि पांच साल पहले भारत से लातविया उच्च शिक्षा के लिए आए थे। पढ़ने के साथ यश क्रिकेट खेल में भी गहरी रुचि रखते हैं लेकिन जब वो लातविया आए तो क्रिकेट लगभग उनसे छूट गया था। एक दिन कॉलेज के पार्किंग जोन में कुछ एशियाई दोस्तों के साथ क्रिकेट की शुरुआत करने के बाद उन्होंने फिर पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा। 

विज्ञापन

यश के प्रयासों की बदौलत लातविया में रहने वाले प्रवासी भारतीयों की रुचि एक बार फिर से क्रिकेट में बढ़ने लगी है। तूरीबा टेक्निकल यूनिवर्सिटी, रिगा (लातविया) के छात्र यश जायसवाल से जब मैंने बात की तो उन्होंने बताया कि आज भी क्रिकेट खेलने के लिए यहां पर्याप्त समान मुश्किल से ही मिल पाता है।

हाल फिलहाल तक हम प्रैक्टिस के लिए टेनिस बॉल से खेला करते थे। क्रिकेट बल्ला, बॉल या पूरा किट हमें यूके या भारत से मंगाना पड़ता है। लातविया में अभी भी क्रिकेट बॉल दुकानों में उपलब्ध नहीं है। लेकिन क्रिकेट की लोकप्रियता जरूर बढ़ रही है।
विज्ञापन


पहले पहल जब मुझे मन नहीं लगता था तो कुछ भारतीय और श्रीलंकाई छात्रों के साथ हमने पार्किंग में खेलना शुरू किया। बाद में हम टूर्नामेंट खेलने लगे। देखते ही देखते यूनिवर्सिटी के दूसरे छात्र भी इसमें रूचि लेने लगे और इस तरह टीम बनी। 

विज्ञापन

यश बताते हैं कि यहां लातेवियन क्रिकेट फेडरेशन पहले से ही पंजीकृत है। लेकिन खिलाड़ियों की कमी कहिए या इस ओर लोगों ने दिलचस्पी नहीं दिखाई, जिसकी वजह से यह रफ्तार नहीं पकड़ पाई। - फोटो : Istock
यश बताते हैं कि यहां लातेवियन क्रिकेट फेडरेशन पहले से ही पंजीकृत है। लेकिन खिलाड़ियों की कमी कहिए या इस ओर लोगों ने दिलचस्पी नहीं दिखाई, जिसकी वजह से यह रफ्तार नहीं पकड़ पाई। लेकिन अब यहां उन्हें यूनिवर्सिटी ( तूरिबा यूनिवर्सिटी) में खेलने और अच्छा प्रदर्शन करने का मौका मिल रहा है। इससे फेडरेशन और टीम के अन्य खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ा है।
 

दिलचस्प यह है कि यहां कि टीम में शायद ही कोई खिलाड़ी लातविया का है। टीम में 70 फीसदी भारतीय, 20 फीसदी श्रीलंकाई, 10 फीसदी पाकिस्तानी शामिल हैं। वे कहते हैं कि यूरोप में फुटबॉल की लोकप्रियता सर्वाधिक है। बाल्टिक देशों में क्रिकेट खेल के बारे में लोग जानते हैं लेकिन तमाम खेलों के बीच क्रिकेट की प्राथमिकता नहीं है। हालांकि स्थानीय लोग प्रैक्टिस मैच देखने और टीम में शामिल होने की इच्छा भी अब जता रहे हैं। जो कि एक सकारात्मक संकेत है। 

 
वे बताते हैं कि यहां की टीम ने इस्टोनिया और स्वीडन की टीम के साथ भी टूर्नामेंट खेलना शुरू कर दिया है। इन देशों में क्रिकेट का प्रचार-प्रसार ज्यादा तेजी से हो रहा है। उन्होंने कहा कि अब उनके पास क्रिकेट ग्राउंड की व्यवस्था भी है जो कि काफी मशक्कत के बाद उन्हें मिल पाई है।

अब हमने खेल में अच्छा प्रदर्शन कर इंटरनेशनल क्रिकेट टीम(आईसीसी) से मान्यता प्राप्त करने का लक्ष्य रखा है। अगर ऐसा होता है तो बेहतर सुविधाएं बहाल होने के साथ-साथ खेल के खर्च का बोझ भी कम हो सकेगा। 

हमें दूसरे देशों के साथ बाहर जाकर खेलने का मौका मिल सकेगा। वहीं लातविया राष्ट्रीय टीम बनने के बाद एक दिन वर्ल्ड कप खेलने अवसर भी यहां के खिलाड़ियों को मिल सकता है। फिलहाल लातविया में रिगा टेक्निकल यूनिवर्सिटी, तूरिबा यूनिवर्सिटी और ईस्मा यूनिवर्सिटी की टीम मिलकर क्रिकेट को बढ़ावा देने में जुटी हुई है।

लातविया में क़रीब 2500 भारतीय रहते हैं। इनमें करीब 400 भारतीय छात्र शामिल हैं जो यहां उच्च शिक्षा ले रहे हैं। अनुमानित तौर पर यहां बिज़नेस मैनेजमेंट के छात्रों की संख्या सबसे ज़्यादा है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें