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World No-Tobacco Day: सिर्फ स्वास्थ्य ही नहीं, जल-थल और पर्यावरण के लिए भी जहर है हर एक सिगरेट

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तंबाकू उत्पाद, मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए जहर से कम नहीं है। - फोटो : istock
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31 मई 'विश्व तंबाकू निषेध दिवस' है। तंबाकू उत्पादों के सेवन से शरीर को कितना नुकसान होता है, किस-किस तरह की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है, ये बातें 7 साल के बच्चे से लेकर 70 साल के बुजुर्ग तक सभी को बहुत अच्छी तरह से पता है। अब आप सोच रहे होंगे, यहां 70 की जगह 100 साल भी तो लिखा जा सकता था? जरूर लिखा जा सकता था, पर पिछले दो दशक के आंकड़े उठाकर देख लें तो साफ हो जाता है कि तंबाकू उत्पादों के बढ़े हुए सेवन ने कई तरह की गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के जोखिम को बढ़ा दिया है, लिहाजा लोगों को आयु कम हो गई है, मोटे तौर पर औसत आयु 60-70 तक सिमट कर रह गई है। तंबाकू उत्पादों से होने वाले नुकसान के इस लेख की शुरुआत इसी विषय को केंद्र बनाकर करते हैं।

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इस सच्चाई से भी बिल्कुल इनकार नहीं किया जा सकता है कि तंबाकू के सेवन से होने वाले गंभीर खतरों से हम सभी अवगत होते हैं, फिर भी यह लत, हमारी जान से सौदा करती आ रही है। सामान्यतौर पर तंबाकू निषेध दिवस जैसे खास दिन पर इसके शारीरिक दुष्प्रभाव और रोकथाम के उपायों को लेकर चर्चा करके मामले को फिर एक बरस के लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।

तंबाकू उत्पादों के कारण शरीर को होने वाले नुकसान पर अक्सर बात होती रही है पर यह दीर्घकालिक रूप हमारे पर्यावरण को कितना गंभीर नुकसान पहुंचा रहा है, क्या आपका इस ओर ध्यान गया? चलिए इस बार तंबाकू उत्पादों से पर्यावरण में कैसे जहर घुल रहा है, इस विषय को समझने की कोशिश करते हैं।
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तंबाकू उत्पादों का पर्यावरण पर असर

इस साल विश्व तंबाकू निषेध दिवस का थीम पर्यावरण पर केंद्रित है। 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस भी है और तंबाकू निषेध दिवस 2022 का थीम ''पर्यावरण बचाएं'' (Protect the environment) है। कई शोध इस खतरे को लेकर अलर्ट करते रहे हैं कि तंबाकू, मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए किसी जहर से कम नहीं है। तंबाकू उत्पादों के वेस्ट (गुटखे के रैपर, कागज, सिगरेट का शेष हिस्सा) पारिस्थितिक तंत्र के लिए चुनौती बढ़ा रहे हैं। हर साल तंबाकू के सेवन के कारण होने वाले प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोगों से 8 मिलियन (80 लाख) से अधिक लोगों की मौत हो रही है। वहीं तंबाकू उद्योग का कचरा, तंबाकू उत्पादों को बनाने और पैकेजिंग में पर्यावरण का भयंकर नाश किया जा रहा है। मतलब तंबाकू उत्पाद आपको बीमार तो बना ही रहे हैं, आने वाली पीढ़ियों के लिए भी चुनौती खड़ी हो रही है।

इस गुणा-गणित को समझने के लिए हमें देश के तंबाकू उद्योग के बारे में जानना होगा। आइए उस तरफ रुख करते हैं।

भारत का तंबाकू उद्योग

भारत विश्व में तंबाकू का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। साल 1995 में यहां कुल 450 मिलियन किलोग्राम (करीब साढ़े चार लाख टन) तंबाकू का उत्पादन होता था, साल दर साल इसमें बढ़ोतरी देखी गई है। अप्रैल 2021 से फरवरी 2022 के बीच, भारत ने 838.80 मिलियन डॉलर कीमत के तंबाकू उत्पादों का निर्यात किया। इस उद्योग की वृद्धि और तंबाकू उत्पादों की बढ़ती मांग का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि फरवरी 2021 की तुलना में 2022 में 12.78% वृद्धि के साथ भारत ने 78 मिलियन डॉलर कीमत के तंबाकू उत्पादों का निर्यात किया।

अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर तंबाकू उत्पादों से पर्यावरण को होने वाले नुकसान और इसके व्यापार का क्या संबंध है? है न, असल खेल तो यही है। जितनी तेजी से बढ़ती मांग, उतना ही पर्यावरण को क्षति। कैसे? आइए यह भी समझते हैं।


तंबाकू उत्पादों से पर्यावरण को कैसे नुकसान?

तंबाकू उत्पादों को तैयार करने में उस पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंच रहा है, जिसकी हालत पहले से ही खराब है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के आंकड़े बताते हैं-

''वैश्विक स्तर पर सिगरेट को तैयार करने के लिए 60 करोड़ से अधिक पेड़ काटे जाते हैं और 22 बिलियन ( 2200 करोड़) लीटर से अधिक मात्रा में पानी खर्च होता है। इसके अलावा केवल उत्पादों के निर्माण में ही 8.40 करोड़ टन की मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता है। पेड़ों की कटाई, पानी और कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन, तीनों पर्यावरण के लिए चुनौतियां पैदा कर रहे हैं। अफसोस इस तरफ ध्यान किसी का नहीं है।''


इन आंकड़ों के आधार कहा जा सकता है कि तम्बाकू उगाना, उत्पादों का निर्माण और उपयोग करना हमारे पानी, मिट्टी, समुद्र तटों और वायुमंडल में जहर घोल रहा है। इसके बाद- ''हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया'' वाले एटीट्यूड में जो सिगरेट का धुंआ पर्यावरण में जा रहा है, वह हमारे जीवन के साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए फिक्र बढ़ाने वाला है।

एक अध्ययन से पता चलता है-

10 वर्षों तक प्रदूषण वाले इलाकों में रहने से फेफड़ों के जितना नुकसान होता है, उतना ही नुकसान 30 साल तक रोजाना सिगरेट पीने से होता है।  अब आप खुद ही सोचिए, सिगरेट किस तरह से हमारी सेहत के लिए 'आगे कुंआ पीछे खाई वाली' स्थिति बनाते जा रहा है?


 
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हर साल 100 अरब से अधिक सिगरेट बड्स कचरे के रूप में इकट्ठा हो रहे हैं। - फोटो : istock
तंबाकू उत्पादों से बढ़ता कचरा

अब तक हमने तंबाकू उत्पादों के निर्माण और इसके उपयोग से होने वाले पर्यावरणीय और सेहत से संबंधित जोखिमों के बारे में जाना। खतरा यहीं तक सीमित नहीं है, इन उत्पादों का कचरा मृदा और जल को भी गंभीर नुकसान पहुंचा रहा है।

आंकड़े बताते हैं -
 
भारत के लैंडफिल में हर साल 100 अरब से अधिक सिगरेट बड्स कचरे के रूप में इकट्ठा हो रहे हैं। गौर करने वाली बात यह है कि  सिगरेट का फिल्टर 'सेल्युलोज एसीटेट' नामक एक प्रकार के नॉन बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक से बनाता है जिसे पूरी तरह से विघटित होने में लगभग 10 साल से अधिक का समय लग सकता है। वहीं तंबाकू उत्पादों के रैपर के कचरे तो कई दशकों तक जस के तस बने रहते हैं।

ये समुद्री तटों पर एकत्रित होकर जलजीवों के लिए तो हानिकारक साबित हो ही रहे हैं साथ ही जो रैपर मिट्टी के नीचे दब जाते हैं, वह उस भूमि की उपज को साल-दर-साल कम करते जाते हैं।

तंबाकू की खेती
 
तंबाकू की खेती और इसके दुष्प्रभावों के बारे में भी कई अध्ययनों में जिक्र मिलता है। भारत में तंबाकू उत्पादन के लिहाज से देखें तो आंध्र प्रदेश (45%), कर्नाटक (26%), गुजरात (14%), उत्तर प्रदेश (5%), तमिलनाडु (2%), बिहार (2%) और पश्चिम बंगाल (1%) इसके बड़े उत्पादक राज्य हैं।

तंबाकू की खेती के बारे में जानने के लिए हमने आंध्र प्रदेश के एक उत्पादक से संपर्क किया (यहां नाम देना उचित नहीं है)। खैर, किसान बंधु बताते हैं, तम्बाकू बहुत मेहनत से उपजने वाले फसलों में से एक है, जिसकी देखरेख के लिए कई प्रकार के कीटनाशक और भारी मात्रा में रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता होती है। सोचिए इससे जमीन और पर्यावरण को कितना नुकसान होता होगा?

डेटा एकत्रित करते हुए हमें पता चला कि संयुक्त राज्य अमेरिका में तंबाकू उत्पादन के लिए  हर साल 27 मिलियन पाउंड कीटनाशकों का छिड़काव किया जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि आमतौर पर इस प्रकार के कीटनाशक और उर्वरक, भूजल को प्रदूषित करने के साथ ओजोन परत के लिए भी नुकसानदायक हैं। इतना ही नहीं इसके दुष्प्रभाव के कारण बड़ी संख्या में मधुमक्खियां भी मारी जाती है, जिससे परागण प्रक्रिया बाधित होती है साथ ही इसके संपर्क में रहने वाले लोगों में  कैंसर और अन्य गंभीर स्वास्थ्य जोखिम का खतरा भी कई गुना बढ़ जाता है। 

जिस उत्पादक से हमने बात की वह बताते हैं- ''तंबाकू की फसल में मेहनत तो है ही पर दाम हर साल गिरते जा रहे हैं। पिछले तीन वर्षों से तंबाकू की औसत कीमत में गिरावट देखी जा रही है। साल 2018-19 के दौरान जहां कीमत 136 रु. हुआ करती थी वह 2020-21 के दौरान घटकर 119.87 तक रह गई है। 

इन आंकड़ों से अब तक तो आप समझ ही गए होंगे कि उंगली भर दिखने और मिनटों में जलकर खत्म हो जाने वाला सिगरेट आने वाली पीढ़ियों के लिए कितना बड़ा खतरा है? 

तो सवाल है कि आखिर अब किया क्या जाए? कैसे पर्यावरण के इस संकट को कम किया जाए?


तंबाकू उद्योग से होने वाले पर्यावरणीय क्षति को कैसे कम करें?
 
सबसे पहले शुरुआत हमें-आपको ही करनी है, शुरुआत हमारे तंबाकू उत्पादों को छोड़ने से होगी। हर एक सिगरेट, बनने से लेकर धुएं में उड़ने तक, प्राकृतिक संसाधनों के लिए खतरा है, वह संसाधन जिस पर हमारा अस्तित्व निर्भर करता है।
 
प्रत्येक सिगरेट से करीब 1.39 ग्राम मानव निर्मित ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन होता है। अगर आप एक दिन में 10 सिगरेट पीते हैं तो आप पर्यावरण में सालाना 11 पाउंड कार्बन डाई ऑक्साइड छोड़ रहे हैं। यह कितना नुकसानदायक है, हम सभी अच्छी तरह से जानते हैं। अगर हम सिगरेट छोड़ने का प्रण ले लें तो सोचिए पर्यावरण संरक्षण के लिए हमारा कितना कीमती योगदान हो सकता है।

दूसरा- पहले से ही कम कीमत मिलने से परेशान तंबाकू उत्पादकों के लिए सरकार और नीति निर्माताओं को वैकल्पिक खेती की व्यवस्था कर उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए, जिससे किसानों को कम लागत में अधिक मुनाफा हो सके और पर्यावरण के इस संकट को काबू किया जा सके। 

तीसरा- नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) जैसे संस्थाओं को तंबाकू उत्पादों के कचरे के सही प्रबंधन को लेकर सख्ती दिखाने की आवश्यकता है। तंबाकू उद्योगों की पर्यावरण संरक्षण में भागीदारी सुनिश्चित करने की जरूरत है।


आखिरी लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात, पर्यावरण संकट के खतरे को सिर्फ कागजों में सिमट कर देखने के बजाय,  इसकी गंभीरता को समझते हुए काम करने और पर्यावरण को बचाने पर ध्यान देने की आवश्यकता है। कहीं ऐसा न हो कि हमारी आज की चीजों को नजरअंदाज करने की आदत, आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व के लिए ही खतरा बन जाए। आप भी विचार कीजिएगा। 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw।co।in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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