हर साल 100 अरब से अधिक सिगरेट बड्स कचरे के रूप में इकट्ठा हो रहे हैं।
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तंबाकू उत्पादों से बढ़ता कचरा
अब तक हमने तंबाकू उत्पादों के निर्माण और इसके उपयोग से होने वाले पर्यावरणीय और सेहत से संबंधित जोखिमों के बारे में जाना। खतरा यहीं तक सीमित नहीं है, इन उत्पादों का कचरा मृदा और जल को भी गंभीर नुकसान पहुंचा रहा है।
आंकड़े बताते हैं -
भारत के लैंडफिल में हर साल 100 अरब से अधिक सिगरेट बड्स कचरे के रूप में इकट्ठा हो रहे हैं। गौर करने वाली बात यह है कि सिगरेट का फिल्टर 'सेल्युलोज एसीटेट' नामक एक प्रकार के नॉन बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक से बनाता है जिसे पूरी तरह से विघटित होने में लगभग 10 साल से अधिक का समय लग सकता है। वहीं तंबाकू उत्पादों के रैपर के कचरे तो कई दशकों तक जस के तस बने रहते हैं।
ये समुद्री तटों पर एकत्रित होकर जलजीवों के लिए तो हानिकारक साबित हो ही रहे हैं साथ ही जो रैपर मिट्टी के नीचे दब जाते हैं, वह उस भूमि की उपज को साल-दर-साल कम करते जाते हैं।
तंबाकू की खेती
तंबाकू की खेती और इसके दुष्प्रभावों के बारे में भी कई अध्ययनों में जिक्र मिलता है। भारत में तंबाकू उत्पादन के लिहाज से देखें तो आंध्र प्रदेश (45%), कर्नाटक (26%), गुजरात (14%), उत्तर प्रदेश (5%), तमिलनाडु (2%), बिहार (2%) और पश्चिम बंगाल (1%) इसके बड़े उत्पादक राज्य हैं।
तंबाकू की खेती के बारे में जानने के लिए हमने आंध्र प्रदेश के एक उत्पादक से संपर्क किया (यहां नाम देना उचित नहीं है)। खैर, किसान बंधु बताते हैं, तम्बाकू बहुत मेहनत से उपजने वाले फसलों में से एक है, जिसकी देखरेख के लिए कई प्रकार के कीटनाशक और भारी मात्रा में रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता होती है। सोचिए इससे जमीन और पर्यावरण को कितना नुकसान होता होगा?
डेटा एकत्रित करते हुए हमें पता चला कि संयुक्त राज्य अमेरिका में तंबाकू उत्पादन के लिए हर साल 27 मिलियन पाउंड कीटनाशकों का छिड़काव किया जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि आमतौर पर इस प्रकार के कीटनाशक और उर्वरक, भूजल को प्रदूषित करने के साथ ओजोन परत के लिए भी नुकसानदायक हैं। इतना ही नहीं इसके दुष्प्रभाव के कारण बड़ी संख्या में मधुमक्खियां भी मारी जाती है, जिससे परागण प्रक्रिया बाधित होती है साथ ही इसके संपर्क में रहने वाले लोगों में कैंसर और अन्य गंभीर स्वास्थ्य जोखिम का खतरा भी कई गुना बढ़ जाता है।
जिस उत्पादक से हमने बात की वह बताते हैं- ''तंबाकू की फसल में मेहनत तो है ही पर दाम हर साल गिरते जा रहे हैं। पिछले तीन वर्षों से तंबाकू की औसत कीमत में गिरावट देखी जा रही है। साल 2018-19 के दौरान जहां कीमत 136 रु. हुआ करती थी वह 2020-21 के दौरान घटकर 119.87 तक रह गई है।
इन आंकड़ों से अब तक तो आप समझ ही गए होंगे कि उंगली भर दिखने और मिनटों में जलकर खत्म हो जाने वाला सिगरेट आने वाली पीढ़ियों के लिए कितना बड़ा खतरा है?
तो सवाल है कि आखिर अब किया क्या जाए? कैसे पर्यावरण के इस संकट को कम किया जाए?
तंबाकू उद्योग से होने वाले पर्यावरणीय क्षति को कैसे कम करें?
सबसे पहले शुरुआत हमें-आपको ही करनी है, शुरुआत हमारे तंबाकू उत्पादों को छोड़ने से होगी। हर एक सिगरेट, बनने से लेकर धुएं में उड़ने तक, प्राकृतिक संसाधनों के लिए खतरा है, वह संसाधन जिस पर हमारा अस्तित्व निर्भर करता है।
प्रत्येक सिगरेट से करीब 1.39 ग्राम मानव निर्मित ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन होता है। अगर आप एक दिन में 10 सिगरेट पीते हैं तो आप पर्यावरण में सालाना 11 पाउंड कार्बन डाई ऑक्साइड छोड़ रहे हैं। यह कितना नुकसानदायक है, हम सभी अच्छी तरह से जानते हैं। अगर हम सिगरेट छोड़ने का प्रण ले लें तो सोचिए पर्यावरण संरक्षण के लिए हमारा कितना कीमती योगदान हो सकता है।
दूसरा- पहले से ही कम कीमत मिलने से परेशान तंबाकू उत्पादकों के लिए सरकार और नीति निर्माताओं को वैकल्पिक खेती की व्यवस्था कर उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए, जिससे किसानों को कम लागत में अधिक मुनाफा हो सके और पर्यावरण के इस संकट को काबू किया जा सके।
तीसरा- नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) जैसे संस्थाओं को तंबाकू उत्पादों के कचरे के सही प्रबंधन को लेकर सख्ती दिखाने की आवश्यकता है। तंबाकू उद्योगों की पर्यावरण संरक्षण में भागीदारी सुनिश्चित करने की जरूरत है।
आखिरी लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात, पर्यावरण संकट के खतरे को सिर्फ कागजों में सिमट कर देखने के बजाय, इसकी गंभीरता को समझते हुए काम करने और पर्यावरण को बचाने पर ध्यान देने की आवश्यकता है। कहीं ऐसा न हो कि हमारी आज की चीजों को नजरअंदाज करने की आदत, आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व के लिए ही खतरा बन जाए। आप भी विचार कीजिएगा।
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