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भारत और वैदिक विज्ञान: कहानी गुरुत्वाकर्षण की खोज करने वाले भारतीय वैज्ञानिक भास्कराचार्य द्वितीय की

सार

भास्कराचार्य ने ज्योतिष, खगोल व गणित का ज्ञान अपने मनीषी पिता से प्राप्त किया था। स्पष्टतः उनसे पहले से ये ज्ञान चला आ रहा था।

निश्चित तौर पर हमारे पास आज जो बचा है वो आधा अधूरा ज्ञान है, लेकिन ये भी तय है कि बिना विशाल इमारत के ये खंडहर भी हमें न मिलते।

इन्हें गिराकर दफनाने के प्रयास सदियों से हो रहे हैं लेकिन फिर भी गौरवशाली इतिहास के अंश हमारे बीच है।
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निर्विवाद रूप से भारत पूरे विश्व में गणित का जनक है। - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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आज जब दुनिया भर में शिक्षा में समानता की बात होती है। एक हजार साल पहले भारत भूमि पर एक बेटी अपने पिता से प्रश्न पूछती है कि अंतरिक्ष में ये ग्रह किस शक्ति से टंगे हुए हैं? ये गिरते क्यों नहीं हैं? 

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एक हजार साल पहले ये प्रश्न आना कि अंतरिक्ष में ग्रह टंगे हुए हैं, यही दुनिया को आश्चर्यजनक लग सकता है। एक पुत्री का अपने पिता से पूछना ज्यादा महत्वपूर्ण है, यानी बेटी पढ़ाओ की एक शानदार परंपरा हजार साल पहले ही। इसके बाद पिता का जवाब और महत्व का है। उन्होंने जो जवाब दिया उसे इस घटना के 600 साल बाद गुरुत्वाकर्षण के नियम के रूप में दुनिया ने जाना वो भी न्यूटन के नाम से। 

ये कहानी नहीं बल्कि भास्कराचार्य द्वितीय और उनकी बेटी लीलावती के बीच का संवाद है। आज भी उनके ये श्लोक और साहित्य सुरक्षित है। वर्तमान दौर के भी कई गणितज्ञों ने उनके इस कार्य को अपने शोध पत्रों में रखा। कैसे हजार साल पहले ही भारत में गुरुत्वाकर्षण के सिध्दांत पर चर्चा होती थी कि कहानी आज आपके सामने रख रहे हैं।

निश्चित तौर पर भास्कराचार्य से पहले भी ये परंपरा मौजूद थी। उनसे पहले भास्कर या भास्कराचार्य प्रथम जो 600 ई. में पैदा हुए थे ने आर्यभट्ट के सिध्दांतों पर भाषा टीका लिखा था। भास्कराचार्य द्वितीय जो 1100 के लगभग हुए को इसीलिए ज्यादा प्रतिष्ठा मिली क्योंकि उन्होंने बीतते समय के साथ हुए कई अन्य शोधों को भी अपने कार्य में शामिल किया। वर्तमान गणित के कई सूत्र वो हजार साल पहले ही अपने ग्रंथ सिध्दांत शिरोमणि में लिख चुके थे।  

 

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प्राचीन ग्रंथ इस बात की पुष्टि करते हैं कि हमारा विज्ञान भी समृध्द था। - फोटो : सोशल मीडिया

हमारा ज्ञान-विज्ञान जो बेहद समृद्ध था 
ऐसा माना जाता है कि भारत में अध्यात्म ही चरमोत्कर्ष पर था, लेकिन वेदों के अतिरिक्त मौजूद कई प्राचीन ग्रंथ इस बात की पुष्टि करते हैं कि हमारा विज्ञान भी समृध्द था। जिस तरह अलग-अलग भौगोलिक स्थिति में रहन-सहन और खान-पान बदल जाता है उसी तरह हर एक क्षेत्र की शिक्षा प्रणाली भी भिन्न होती है।

प्राचीन शिक्षा प्रणाली और पुरातन साहित्य को संजोने के प्रयास भारतीय शिक्षा पद्धति को पुनर्स्थापित करने के लिए आवश्यक हैं। निर्विवाद रूप से भारत पूरे विश्व में गणित का जनक है। बदलते वक्त के साथ हमारा गणित काल गणना और ज्योतिष तक सिमट कर रह गया लेकिन ये इसका बहुत ही सीमित रूप है।

विस्तृत रूप से समझने के लिए आज हम बात कर रहे हैं, भास्कराचार्य द्वितीय की। जिन्हें हम ऋषि मुनि कह कर संबोधित करते हैं दरअसल, ये अपने अपने विषयों में पारंगत वैज्ञानिक थे। हमारे पठन पाठन की प्रणाली भी इतनी उत्कृष्ट थी कि आज तक उस गौरवशाली इतिहास के अंश बचे हुए हैं।

हम पद्यात्मक या लयात्मक तरीके से कठिन से कठिन सूत्रों को याद करते थे। ऐसे ही सूत्रों में कई रहस्य छिपे हुए हैं जिनमें एक बड़ा रहस्य है गुरुत्वाकर्षण का नियम।  

भास्कराचार्य जी का जो कार्य अब हमें मिलता है उस बाद के शोधकर्ताओं ने ‘सिद्धांतशिरोमणि’ के नाम से सुरक्षित किया है। ये चार भागों से मिलकर बना हुआ विशाल ग्रन्थ है। ये चार हिस्से हैं। 

(1) लीलावती 
(2) बीजगणित 
(3) गोलाध्याय और 
(4) ग्रहगणिताध्याय  

लीलावती और बीजगणित स्वतंत्र ग्रंथ हैं और अंतिम दो अब भी सिध्दांत शिरोमणी के नाम से जाने जाते हैं। भास्कराचार्य ने तीसरे भाग गोलाध्याय में लिखा है - 
 
"मरुच्लो भूरचला स्वभावतो यतो, 
विचित्रावतवस्तु शक्त्य:।। 
आकृष्टिशक्तिश्च मही तया यत्, 
खस्थं,गुरुस्वाभिमुखं स्वशक्तत्या। 
आकृष्यते तत्पततीव भाति, 
समेसमन्तात् क्व पतत्वियं खे।। भुवनकोश-गोलाध्याय, सिध्दांतशिरोमणि 

पृथ्वी में आकर्षण शक्ति होती है। ये आकर्षण शक्ति (गुरुत्वाकर्षण) भारी पदार्थों को अपनी ओर संतुलित रूप से आकर्षित करती है और इस कारण वह जमीन पर गिरते हैं, जब आकाश में समान ताकत चारों ओर से लगे, तो कोई कैसे गिरे? अर्थात् आकाश में ग्रह निरावलम्ब रहते हैं क्योंकि विविध ग्रहों की गुरुत्व शक्तियां संतुलन बनाए रखती हैं। 

 

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गुरुत्वाकर्षण के बारे में पहली बार गणितीय सूत्र देने की कोशिश आइजक न्यूटन की ओर से की गई थी। - फोटो : अमर उजाला

भारत की विरासत और विज्ञान 
ये मात्र एक उदाहरण है ऐसे कई सूत्र और प्रमेय इन एकेडिमक किताबों में लिखी हुई हैं। विगत कई वर्षों से भारतीय इतिहास से लगातार छेड़-छाड़ की गई। भारत दुनिया के अन्य देशों के लिए हमेशा से संपन्नता का प्रतीक था। यही वजह है कि भारत पर लगातार हमले हुए। विज्ञान के बिना संपन्नता संभव नही है।

गणित विज्ञान का मूल है यही वजह है कि भारतीय वैज्ञानिकों ने हजारों साल पहले ही खगोलीय गणनाओं को ठीक-ठीक रख दिया था। वर्तमान ज्योतिष इसका बचा हुआ अंश है लेकिन इससे भी अंदाजा लगाया जा सकता है कि ग्रहों को लेकर भारत में गणना के तौर तरीके कितने परिष्कृत थे।  

भास्कराचार्य का जन्म 1114 ई में दक्षिण भारत के एक गांव में हुआ था। केरल के मलाबार हिस्से में गणित की एक वृहद परंपरा थी जिस पर कई अंग्रेज शोधार्थियों ने भी काम किया है और अपनी पुस्तकें लिखी हैं।

भास्कराचार्य ने ज्योतिष, खगोल व गणित का ज्ञान अपने मनीषी पिता से प्राप्त किया था। स्पष्टतः उनसे पहले से ये ज्ञान चला आ रहा था। निश्चित तौर पर हमारे पास आज जो बचा है वो आधा अधूरा ज्ञान है लेकिन ये भी तय है कि बिना विशाल इमारत के ये खंडहर भी हमें न मिलते। इन्हें गिराकर दफनाने के प्रयास सदियों से हो रहे हैं लेकिन फिर भी गौरवशाली इतिहास के अंश हमारे बीच हैं। 

भास्कराचार्य की पुस्तकों में हमें उस वक्त के पढ़ाने के रोचक तरीकों के बारे में भी जानकारी मिलती है। भास्कराचार्य के ग्रंथ ‘सिद्धांतशिरोमणि’ में सबसे अधिक प्रसिद्ध तथा चर्चित भाग है लीलावती। 
 
लीलावती को भास्कराचार्य की पुत्री भी माना जाता है, कुछ लोगों का मानना है ये काल्पनिक नाम भी हो सकता है। खैर जो भी हो ये तय है कि उपनिषदों की गुरू शिष्य प्रश्नोत्तर परंपरा के आधार पर ही ये ग्रंथ लिखे गए। यहां लीलावती के प्रश्न है और बाद में उन्हें समाधान करने के लिए या हल करने के लिए जो प्रश्न दिए जाते थे उसके भी रोचक उदाहरण मिलते हैं।  

किस तरह हमारे परंपरागत महाकाव्यों को प्रश्नों के लिए रखा जाता था उसका उदाहरण लीलावती में मौजूद ये प्रश्न है।  

पार्थः कर्णवधाय मार्गणगणं क्रुद्धो रणे सन्दधे 
तस्यार्धेन निवार्य तच्छरगणं मूलैश्चतुभिर्हयान् | 

शल्यं षड्भिरथेषुभिस्त्रिभिरपि च्छत्रं ध्वजं कार्मुकम् 
चिच्छेदास्य शिरः शरेण कति ते यानर्जुनः सन्दधे ॥ ७६ ॥ 

दृष्ट-भागमूलोन, श्लोक-4 

अर्थ- क्रोध से भरे अर्जुन ने रण में कर्ण को मारने के लिए बाणों का समूह लिया। उसमें से आधे बाणों से कर्ण को मार डाला। उस बाणगण के चतुर्गणित मूल से घोड़ों को मार डाला। छह बाणों से सारथी शल्य को यमराज का अतिथि बनाया। तीन बाणों से छत्र, ध्वजा और धनुष तोड़ा। पीछे एक बाण से कर्ण के सिर काट डाला। तो कहो रण में अर्जुन ने कुल कितने बाण लिए थे? 

ये उदाहरण प्रश्नों के प्रकार समझाने के लिए रखा। ऐसे प्रश्नों को हल करने के सूत्र भी इन पुस्तकों में दिए गए हैं। मैं वर्तमान समय के कुछ गणितज्ञों को जानता हूं जो आज भी इस पुरातन साहित्य में दिलचस्पी लेते हैं लेकिन फिर भी हम आधुनिक शोध पत्रों में इनका जिक्र नहीं पाते। पाश्चात्य शिक्षा पध्दति कागजी कार्रवाई पर चलती है। इसीलिए जिसने पहले कागज रखा वही मालिक बन गया। ये ठीक वैसा ही कि आज अमेरिका या कोई अन्य देश योग, तुलसी या हल्दी का पेटेंट अपने नाम करा ले।

अंत में इस इतिहास को आपके समक्ष रखने का उद्देश्य। दरअसल जैसा मैंने शुरुआत में कहा हमारे पढ़ने और पढ़ाने के तरीके हमारी संस्कृति के अनुरूप होना चाहिए। हम अधूरे विदेशी हैं और इस चक्कर में अधूरे ही देसी बनकर रह गए। हम कभी भी विदेशी नहीं होंगे क्योंकि हमारी संस्कृति हमारी भौगोलिक स्थिति और उससे उपजी परंपराओं से चलती है।

हमें अपने इस गौरवशाली साहित्य की पुनर्स्थापना के साथ उस शिक्षा पध्दति की भी पुनर्स्थापना करनी होगी। इतिहास के बिखरे अंशों को जोड़ना उसकी तरफ एक कदम है।   


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।


 

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